सुमन धनशाला, कोटद्वार बात उन दिनों की है, जब हम किराये के मकान में रहते थे। शुरू से ही मेरी ऐसी आदत रही है कि मैं अपने घर की सुरक्षा का पूरा ख्याल रखती हूं। हमारे पडोस में एक परिवार रहता था। उन लोगों की आदत थी कि गर्मियों के मौसम में वे रात को अपने आंगन का दरवाजा खुला छोड देते थे। मेरी पडोसन अकसर मुझसे कहती थीं कि इतनी गर्मी में आप लोग दरवाजा क्यों बंद कर देते हैं, पता नहीं आपको कैसे नींद आती है? दरअसल वह खुद को बहुत ज्य़ादा होशियार और दूसरों को बेवकूफ समझती थीं। एक रोज आधी रात को हमें 'बचाओ, बचाओ... की आवाज सुनाई पडी तो हम चौंक कर उठ गए। बाहर जाकर देखने के बाद मालूम हुआ कि उनके घर में चोर घुस आए थे और वे काफी सामान चुरा कर ले गए। उस घटना के बाद से मेरी उस पडोसन ने न केवल मुझे टोकना बंद कर दिया बल्कि वह खुद भी अपने घर का दरवाजा बंद रखने लगी। सुना-अनसुना कर दिया विमला सिंह, नागपुर हमारा परिवार जाति बंधन को नहीं स्वीकारता। इसीलिए जब मेरी बेटी ने अंतर्जातीय प्रेम विवाह करने का निर्णय लिया तो परिवार के सभी सदस्य और रिश्तेदार बहुत खुश हुए क्योंकि मेरी बेटी को उसकी पसंद के अनुकूल परफेक्ट मैच मिल गया था। उसकी ससुराल के लोग भी बहुत भले हैं। उन दोनों की जोडी इतनी अच्छी है कि विवाह के दिन सब लोग उनकी प्रशंसा कर रहे थे लेकिन हमारे एक पडोसी को दूसरों के घरों में ताक-झांक करने की आदत है। वे सबके घरेलू मामलों में अकसर टीका-टिप्पणी करते रहते हैं। उन्होंने मुझसे पूछा, 'इकलौती बेटी है, आप लोग तो शादी में खूब दान-दहेज दे रहे होंगे? यह सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा, फिर भी मैंने अपने गुस्से पर नियंत्रण रखते हुए उनसे कहा कि लडके के परिवार में दहेज के लेन-देन का रिवाज नहीं है। अगर ऐसा होता तो मेरी बेटी खुद ही शादी से इंकार कर देती। यह सुनकर मेरी पडोसन ने कहा, 'अरे! मांगने की क्या जरूरत है, उन्हें तो मालूम ही है कि आपकी इकलौती बेटी है। आपके बाद तो सारी संपत्ति बेटी को ही मिलेगी। विवाह के हंसी-खुशी भरे माहौल में उनकी ऐसी नकारात्मक बातें सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया पर मैं समझ नहीं पा रही थी कि अपनी उस पडोसन से क्या कहूं? फिर मैंने सोचा कि ऐसे कमअक्ल लोगों से बहस कर करना बेकार है क्योंकि ये अपनी आदतों से बाज नहीं आते। भलाई इसी में है कि हम इनकी व्यर्थ बातों को सुन कर भी अनसुना कर दें। मन से जुडे मुहावरे मेरा एक पुराना सलवार-सूट देखने में बदरंग हो गया था पर उसका दुपट्टा बहुत सुंदर था। इसलिए मैंने उसे संभाल कर रख लिया। उसकी मैचिंग का कपडा खरीद कर जब मैं उसे दर्जी के पास ले गई तो वह बहुत ज्य़ादा सिलाई मांग रहा था। फिर भी मैंने सूट सिलने को दे दिया लेकिन उसने स्टिचिंग में कुछ ऐसी गलती कर दी थी कि कुर्ते की सही फिटिंग नहीं आ रही थी। उसने मुझसे कहा कि मैं दोबारा ठीक कर दूंगा पर ऑल्टरेशन कराने के बाद भी उसकी फिटिंग सही नहीं हो पाई। जब मैंने सारा हिसाब लगाया तो मालूम हुआ सिर्फ तीन सौ रुपये के दुपट्टे के चक्कर में मैं लगभग दो हजार खर्च कर चुकी थी और बार-बार दर्जी की दुकान पर जाने में जो परेशानी हुई वो अलग। इसे ही कहते हैं नौ की लकडी नब्बे का खर्चा। इसीलिए अब मैं पुरानी चीजों का मोह नहीं करती। बेशकीमती बातें कोई भी प्रयास छोटा नहीं होता, हजारों मील लंबी यात्रा भी एक कदम से शुरू होती है। - कंफ्यूशियस