कहानीकार के बारे में : पिछले कई वर्षों से लेखन में सक्रिय सुषमा मुनींद्र के अब तक दो उपन्यास और 10 कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। म.प्र. साहित्य अकादमी सहित कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त। संप्रति : सतना (मप्र) में रहकर लेखन।

इतिहास कभी-कभी सचमुच खुद को दोहराता है या कुछ संयोग होते हैं कि हमें ऐसा लगने लगता है। विनायक और गिरधारी लाल शाजापुर की सिविल लाइंस में ठीक अगल-बगल अलॉट हुए सरकारी क्वॉर्टर में रहते थे। संयोग ही है कि सेवानिवृत्त होकर वे एक बार फिर रीवा सुधार न्यास की बहुत बडी कॉलोनी में रह रहे हैं। विनायक की पत्नी रोहिणी थ्री बीएचके नहीं खरीदना चाहती थीं। कहती थीं, 'कॉलोनी शहर से बाहर है। अस्पताल, बार, थिएटर, सब कुछ यहां से दूर पडेगा पर तुम्हें तो होम डिस्ट्रिक्ट में बसने की जिद है।

विनायक विनम्रता से कहते, 'रिटायरमेंट में अभी 10 साल बाकी हैं। तब तक तो शहर फैल जाएगा। वाकई इतने समय में शहर यहां तक आ चुका था। घर सजाते हुए रोहिणी ने नहीं सोचा था कि एक सुबह ऐसी होगी, जिसे इतिहास का दोहराया जाना कहते हैं। सुबह की सैर से लौटे विनायक ने चौंका दिया, 'रोहिणी, देखो न हमें खबर भी नहीं होती कि हमारे पडोस में क्या चल रहा है? 'कोई दुर्घटना हो गई क्या? 'पता है...अपने बडे साहब (गिरधारी लाल) इसी कॉलोनी में मंदिर के पास रहते हैं। आज उन्हें देखा तो हैरान रह गया।

रोहिणी को जैसे एक लक्ष्य मिल गया, 'क्या कहा....? सुप्रभा यहां रहती है? 'हां, उन्होंने यहां घर खरीदा है। बता रहे थे कि सुप्रभा जी के घुटने की सर्जरी हुई है। चलो, शाम को मिल आते हैं उनसे। रोहिणी का दिल बल्लियों उछल रहा था। मन कर रहा था कि तुरंत जाकर सुप्रभा जी से मिले और उन्हें अपनी हैसियत दिखाए। कहे कि देखिए मैंने भी जमाने का चलन समझ लिया है, आपकी तरह बाल कटवा लिए हैं, पार्लर जाने लगी हूं, बच्चों को हॉस्टल में पढाया है, मेरे पास भी कीमती साडिय़ां हैं... कभी मेरे घर आकर मेरा रसूख देखिए।

पीडब्ल्यूडी में गिरधारी लाल एग्जिक्युटिव इंजीनियर और विनायक जूनियर इंजीनियर थे। विनायक का शाजापुर में पहला साल था और बडे साहब भी तबादले पर शाजापुर आए थे। रोहिणी को याद है, तीन ट्रकों में सामान लद कर आया था बडे साहब का। विनायक ने उससे कहा था, 'अभी सामान आया है। बडे साहब परसों सुबह आएंगे तो उन्हें चाय पर बुला लूंगा। अच्छा सा नाश्ता बना लेना। गिरधारी लाल जी की पत्नी सुप्रभा काफी स्टाइलिश थीं। तीनों बच्चे नैतिक, निर्भय और नीति भी काफी स्मार्ट थे। सुप्रभा ने चाय पीते हुए कहा, 'सुबह-सुबह आपने इतना सब क्यों बनाया? वहां से विदा करते हुए दोस्तों,

कर्मचारियों ने खाने-पीने का इतना सामान रख दिया है कि क्या कहें...। बडे साहब ने रुचि दिखाई, 'घर की बनी ताजी चीजों में मजा होता है। ढोकला और पोहा भी टेस्टी है। उधर वे लोग गए, इधर रोहिणी ने विनायक को घेरा, 'बडे साहब ने अच्छा रिमार्क पास किया। यही पोहा, ढोकला, हलवा खिलाने के लिए बुलाया था तुमने? बार से कुछ स्पेशल ले आते...।

'रोहिणी, वह तो तुम्हारी तारीफ कर रहे थे। तुम हर बात का गलत अर्थ क्यों निकालती हो? बडे साहब ने मकान का कायाकल्प करा लिया था। सरकारी निर्माण कार्य में लगे मजदूरों में एकाध को घर और बगीचे की साफ-सफाई के लिए रख लिया और विनायक को भी प्रेरित करते रहते, 'आप अपने बगीचे को व्यवस्थित करवा लीजिए, मैं यहां से 1-2 मजदूर भेज दूंगा। विनायक कहते, 'मजदूरों की जरूरत नहीं है सर। रोहिणी को गार्डनिंग का शौक है, थोडी-बहुत सब्जी लगा लेती हैं।

बडे साहब सराहना करते, 'आपके परिवार की सादगी मुझे बहुत प्रभावित करती है। विनायक ने यह बात रोहिणी को बताई तो वह व्यंग्य से बोली, 'अच्छा, तभी इतनी शान से रहते हैं? तुम्हीं को ईमानदारी का भूत चढा है। सुप्रभा बताती हैं कि बडे साहब की ऊपरी आमदनी कितनी है...तुम बने रहो ऐसे ही... हमेशा अपने सेकंड हैंड स्कूटर पर फिदा रहो, घंटों दफ्तर में काम करो और इसके बाद घर चलाने भर को भी पैसे पर्याप्त न पडें...।

'मेरे लिए मेरा वेतन काफी है रोहिणी..., विनायक गंभीरता से बोले। 'वेतन? न ढंग से खा पाते हैं, न पहन पाते हैं....तीन बच्चों की पढाई और शादी...कैसे करेंगे सब? खुदा न करे, कोई बडी बीमारी हो गई तो इलाज के लिए भी तरस जाएंगे। 'ऊपर वाले पर भरोसा रखो। 'सुप्रभा मुझसे क्लब जॉइन करने को कहती हैं लेकिन करूं कैसे? मेरे पास कहां हैं उन लोगों जैसे कपडे या गहने? 'बच्चों को पढाओ...समय बर्बाद क्यों करना चाहती हो?

सर्दियों में अधिकारियों की पत्नियां लॉन की धूप में बैठ कर गपशप का आनंद लेतीं और रोहिणी घर के कामों में उलझी रहती। गर्मियों में लोग देर रात तक घूमते मगर रोहिणी के घर की लाइट्स 10 बजे ऑफ हो जातीं। बडी बेटी उपासना मां से कहती, 'मम्मी देखो न, बडे साहब के घर पर कितनी चहल-पहल रहती है। एक हमारा घर है, जहां सारे नियम-कायदे फॉलो करने पडते हैं। पापा तो बहुत पढाकू थे न? कितना एंजॉय कर रहे हैं लाइफ में?

मझली बेटी आराधना और बडे साहब की बेटी नीति एक ही कक्षा में पढती थीं, इसलिए आराधना के पास उस परिवार की हर सूचना रहती। वह बताती रहती कि कब नीति घूमने गई... कहां से शॉपिंग की....कब परिवार के साथ डिनर पर गई आदि..। एक बार वह नीति के साथ उसके घर गई तो सुप्रभा ने उसे एक नई ड्रेस दी, नीति ने आदेश दिया कि उसके भाई नैतिक की बर्थ डे पार्टी में वह इसी ड्रेस में आए।

घर लौट कर उसने ड्रेस दिखाई तो विनायक ने थोडे रोष से कहा, 'क्या तुम्हारे पास कपडे नहीं हैं? क्यों ली तुमने यह ड्रेस? आराधना का उत्साह मर गया। जन्मदिन पर बडे साहब ही बुलाने आए, 'डिनर में सपरिवार आना है...। आपकी बेटी आराधना तो क्लास में फस्र्ट आती है। सोच रहा हूं, नीति को आपके घर भेज दिया करूं ताकि उसे पढाई में कुछ मदद मिले। आपके बच्चे तो बहुत अनुशासित हैं, कुछ सीख लें मेरे बच्चे भी।

विनायक क्या कहते कि यह महज पिता का डर है, वर्ना तो उनके बच्चे भी कुछ न मानते। नैतिक के जन्मदिन पर रोहिणी महंगा तोहफा खरीदना चाहती थी लेकिन विनायक किताबों का सेट खरीद लाए, 'छात्रों के लिए इससे अच्छा गिफ्ट नहीं हो सकता। डिनर पर सुप्रभा कहती रहीं, 'अरे, रोहिणी ठीक से खाओ। संकोच कर रही हो।

रोहिणी ने नजरें झुका लीं। वहां से लौटने लगे तो रास्ते में बेटी प्रार्थना ने कहा, 'देखा मां... इसे कहते हैं पार्टी...। एक हम लोग हैं, हर जन्मदिन पर बस कथा रखवा लेते हैं। नीति रोज आराधना के पास आकर पढाई करने लगी। पढाई कम, बातें ही ज्यादा करती। एक दिन बोली, 'भाई को तुमने किताबों का सेट दिया था न...पापा ही पढ रहे हैं उन्हें। सुप्रभा भी कोई कम न थीं। रोहिणी को किसी न किसी तरह हीन भावना से ग्रस्त कर ही देतीं, 'रोहिणी बार चलोगी?

'कलकत्ता की साडिय़ां हैं। मैंने छह ले ली हैं, तुम भी खरीद लो न? 'रोहिणी, कभी पार्लर चलो न मेरे साथ...सच कहती हूं, तुम इतनी सुंदर हो, मेकअप करोगी न तो निखर जाओगी। कई बार जब विनायक बडे साहब को चाय पर बुलाते तो रोहिणी की शामत ही आ जाती। बडे साहब कहते, 'आपके घर पर चाय का असली स्वाद मिलता है। नाश्ता भी बडा टेस्टी होता है विनायक साहब।

पडोसी थे बडे साहब मगर राजा-रंक वाली स्थिति थी दोनों के बीच। खैर, इस दुर्दशा से जल्दी ही रोहिणी को मुक्ति मिली। विनायक का ट्रांस्फर ऑर्डर आ गया। सुप्रभा ने विदाई भोज पर विनायक को सपरिवार अपने घर आमंत्रित कर लिया। एक से बढकर एक दुर्लभ व्यंजन परोसे और चलते समय पूरे परिवार को महंगे उपहारों से लाद दिया। विनायक थोडे असहज तो थे लेकिन मौका ऐसा था कि कुछ कहते भी नहीं बन पडा...।

नई जगह जाने के बाद रोहिणी ने मानो नया फैसला कर लिया था। महीने के पहले हफ्ते में विनायक ने रोहिणी को अपना वेतन थमाने की कोशिश की तो उसने साफ इनकार कर दिया, 'देखिए जी, अब इस तनख्वाह से मेरे घर-खर्च पूरे नहीं हो सकते। तुम्हीं चलाओ इतने पैसे में घर...। मैं तंग आ चुकी हूं।

विनायक अंचभित हो गए लेकिन करते क्या, रोहिणी ने मानो अटल प्रण कर डाला था। फिर एक दिन कुछ ऐसा घटा, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। विनायक ने जीवन में पहली बार ऊपरी कमाई की। किसी का काम करने के एवज में थोडी रिश्वत ली तो उनके हाथ कांपे। आत्मा पर बोझ पडा और अपनी ही नजरों में गिर गए। ऐसा पहली बार हुआ लेकिन धीरे-धीरे सब आसान होने लगा। तीसरी-चौथी बार से हाथों ने कांपना, आत्मा ने बोझ महसूस करना और नजरों ने झुकना छोड दिया था। मकान, जमीन, आभूषण, गाडी, बैंक बैलेंस, राजसी ठाट-बाट...। रोहिणी की जिंदगी असल मायने में अब आजाद हुई थी, हसरतें पूरी होने लगीं। सिर्फ एक हसरत बाकी थी। सुप्रभा से कभी मुलाकात हो तो उसे अपना यह रूप भी दिखाए।

...अब आज ऐसा हो गया, जिसे सपना सच होना और इतिहास का दोहराया जाना कहते हैं। विनायक और रोहिणी बडे साहब के घर पहुंचे। बडे साहब बरामदे में बैठे किताब पढ रहे थे। रोहिणी ने जिज्ञासावश पूछा, 'अरे आप अकेले बैठे हैं...? सुप्रभा जी कहां हैं? 'भीतर अपने बेडरूम में लेटी हुई हैं। घुटने की सर्जरी हुई है...ठीक से अभी चल नहीं पातीं, आप लोग बैठें, उन्हें बुला लेता हूं।

'अरे नहीं-नहीं, कोई तकल्लुफ न करें, मैं ही भीतर चली जाती हूं। सच यह था कि आज सुप्रभा को चौंकाने की मंशा से आई थी रोहिणी मगर भीतर का दृश्य देख कर खुद चौंक गई। बिस्तर पर लेटी सुप्रभा पहले से बिलकुल अलग थी। बिना मेकअप का सादा सा चेहरा, पीछे बंधे काले-सफेद रूखे से बाल, दुबली देह.....। उसे लगा, मानो वह किसी दूसरी सुप्रभा को देख रही है। बिना मेकअप के उसने कभी देखा ही नहीं था सुप्रभा को। रोहिणी को देख कर सुप्रभा के चेहरे पर मुस्कान आई और वह तकिए का सहारा लेती हुई बोलीं, 'अरे रोहिणी तुम? पहचान में ही नहीं आ रही...

'आप ही कहती थीं न मुझसे कि जमाने की दौड में शामिल हो जाओ। आजकल एक लेडीज क्लब की अध्यक्ष हूं। सुप्रभा आश्चर्य से भर गई, 'कैसी बातें करती हो रोहिणी, तुम्हें पता है, हमारे साहब तो तुम्हारी सादगी के कायल रहे हैं। कितनी तारीफ करते थे तुम्हारे परिवार की। रोज शाम जब तुम्हारे घर आरती होती थी न, साहब कहते थे कि तुम्हारे मधुर स्वरों से दिन भर की थकान उतर जाती है। कई बार जब हम पार्टी से देर रात लौटते तो साहब कहते, देखो, विनायक का शांति में डूबा घर कितना अच्छा लग रहा है। कितनी व्यवस्थित दिनचर्या है उन लोगों की।

मुझे हमेशा उलाहने मिलते कि बच्चों को तुम्हारे घर जैसा अनुशासन सिखाऊं। मैं फिजूल खर्च करती तो मेरे सामने तुम्हारा उदाहरण दिया जाता। सच कहूं रोहिणी तो मुझे कई बार तुमसे ईष्र्या होती थी। मुझे लगता था कि तुम्हारे पास कुछ तो ऐसा है, जो मेरे पास नहीं है। मैं न जाने कब और कैसे तुमसे कॉम्पिटीशन करने लगी। तुम्हें उकसाने लगी लेकिन तुमने कभी अपनी गरिमा नहीं छोडी। रोहिणी का मेकअप वाला चेहरा एकाएक स्याह पडऩे लगा। कहां तो वह सुप्रभा जी को चौंकाने आई थी और कहां इस बार भी उनसे मात खा गई। यह क्या देख रही है वह...? 'सुप्रभा जी, मैं...मैं तो....

'नहीं रोहिणी, मैं ये बातें तुम्हें इसलिए नहीं बता रही हूं कि तुम्हें ठेस पहुंचे लेकिन हां- इतना मैं जरूर कहना चाहती हूं कि हम सब जिस परिवेश में रहते हैं, उसका असर हमारी सोच पर पडता है। सच कहूं तो तुम्हें देखते-देखते मुझे भी लगने लगा था कि तुम अपनी जगह सही हो और मुझे अपने भीतर बदलाव लाने चाहिए। ऐसा हो नहीं पा रहा था मगर फिर कुछ ऐसा हुआ कि मुझे लगने लगा, यह पार्टी, क्लब, ऐशो-आराम कहीं नहीं पहुंचाते, सिर्फ मानसिक तौर पर परेशान करते हैं। मेरे बच्चे मेरे नियंत्रण में नहीं थे, पढाई में पिछड रहे थे और खर्चीले हो गए थे।

हमारी बेटी नीति की ऐसी ही अपव्ययिता की आदतों के कारण उसकी शादी टूट गई। हमने उसकी शादी पर जरूरत से अधिक खर्च किया क्योंकि वह चाहती थी कि शादी धूमधाम से हो। उसका पति उसके जिद्दी स्वभाव और फिजूलखर्ची से परेशान था। धीरे-धीरे उनमें कलह होने लगी, जो इतनी बढी कि नीति ने तलाक ले लिया और अब पास के ही शहर में नौकरी कर रही है। नैतिक विदेश में बस गया है और निर्भय तो पढाई में कभी अच्छा था ही नहीं, सो उसके लिए हमने एक मेडिकल स्टोर खुलवा दिया है। उसकी पत्नी यहीं पास के स्कूल में पढाती है।

थोडी देर चुप रहने के बाद सुप्रभा बोलीं, '...अरे देखो तो रोहिणी, मैं अपना ही राग अलापती रही, तुम्हें चाय के लिए भी नहीं पूछा। जरा मुझे खडा होने में मदद करो और किचन में ले चलो, मैं बता दूंगी तो तुम चाय बना लेना। रोहिणी सहारा देकर सुप्रभा को रसोई में ले आई। सुप्रभा एक-एक कर पुरानी यादें ताजा कर रही थीं, 'तुम्हें मालूम है रोहिणी, एक बार चीफ इंजीनियर आए थे हमारे यहां। उन्होंने बडे साहब को वॉर्निंग दी थी और विनायक जी के काम की तारीफ की थी।

'मैं इस बारे में नहीं जानती सुप्रभा जी। ये दफ्तर की बातें घर में कभी नहीं बताते थे। 'वे सचमुच सज्जन इंसान हैं। इसी का तो असर मुझ पर हुआ। मुझे लगने लगा था कि दिखावे में कुछ नहीं रखा, दरअसल ऐसा करके हम खुद को छलते हैं और अपनी ही नजरों में गिरने लगते हैं। रोहिणी के पास शब्द नहीं हैं। सिर झुकाए चाय बना रही है। सुप्रभा कुछ देर उसके भावों को परखती रहीं। फिर बोलीं, 'अब तुम सुनाओ रोहिणी, इस बीच क्या-क्या हुआ?

रोहिणी कैसे कहे कि उसने तो अपने पैर आप कुल्हाडी मारी है। सादगी, सरलता व सदाचार को शाजापुर में छोड दिया और ईमानदार पति को जबरन बेईमान बनने पर मजबूर कर दिया। उसकी अनुशासित बेटियां वैभव पाकर फैशन की दुनिया में खो गईं। वह कहना चाहती थी कि दरअसल आज भी वह सुप्रभा से मिलने इसलिए आई, ताकि उन्हें बता सके कि उसकी हैसियत क्या है मगर यहां तो पासा ही उलट गया। एक बार फिर सुप्रभा ने उसे मात दे दी थी। प्रत्यक्ष में वह कुछ नहीं बोली, बस खौलती चाय पर नजरें गडाए रही।