सतर्कता बचाव का अचूक हथियार है। लडकियों से जुडे मामलों में कई बार परिवार की ओर से लापरवाही होती है। पारिवारिक प्रतिष्ठा या बदनामी के भय से रिपोर्ट नहीं लिखाई जाती, नतीजा होता है दुष्कर्म, एसिड अटैक या हत्या जैसे बडे अपराध। किसी भी घटना की शुरुआत में ही सही कदम उठाना क्यों जरूरी है, बता रही हैं सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश जैन।

अक्सर देखा जाता है कि जब कोई लडका किसी लडकी का पीछा करता है, सोशल साइट्स पर उसके बारे में या उसकी वॉल पर भद्दी पोस्ट डालता है, उसे गंदे मेसेज भेजता है, रास्ते में अश्लील कमेंट्स करता है या शारीरिक क्षति पहुंचाने की कोशिश करता है तो लडकियां और उनके घर वाले शुरुआत में चुप रहने में भलाई समझते हैं। बात बढ जाती है, तभी पुलिस में रिपोर्ट करते हैं। ऐसा कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे अपराधी के हौसले और बढ जाते हैं।

दूसरी ओर पुलिस की तरफ से भी पहले तो यही समझाने की कोशिश की जाती है कि शिकायत न करें, लडकी की बदनामी होगी। रिपोर्ट किसी तरह दर्ज हो भी जाए तो लडका थाने आकर मौखिक या लिखित रूप से माफी मांग लेता है और लडकी के परिवार वाले शिकायत वापस ले लेते हैं।

बदले की भावना सवाल यह है कि क्या बात यहीं खत्म हो जाती है? कई मामलों में पाया गया है कि लडका इसे अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लेता है। वह अपमानित महसूस करता है और लडकी से बदला लेने की कोशिशें शुरू कर देता है। इसके बाद शुरू हो जाती हैं स्टॉकिंग या लडकी का पीछा करने, उसे गंदे मेसेज भेजने, रास्ते में रोकने, भद्दे कमेंट्स करने जैसी हरकतें। कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसे मामलों में कई बार दुष्कर्म या हत्या तक की वारदात हो जाती है। इसके बाद परिवार को एहसास होता है कि शिकायत वापस लेने या समझौता कराने जैसा उनका फैसला कितना गलत था।

दोषी को दंड जरूरी कानून में प्रावधान है कि ऐसी घटनाओं में छह महीने से तीन वर्ष तक की सजा हो सकती है। एक बार अपराधी को अपने किए का दंड मिल जाए तो बदले की भावना थोडी कमजोर जरूर पडती है। जेल जाने और सजा काटने के बाद परिवार भी थोडा सहम जाता है और बदले की भावना को मन में दबाना उचित समझता है। हालांकि अपराधी प्रवृत्ति के कई लोगों पर यह सिद्धांत काम नहीं करता, फिर भी 80 फीसदी मामलों में सजा के बाद अपराध का ग्राफ घटता है।

चुप्पी समस्या का हल नहीं कानून में हर अपराध के लिए सजा का प्रावधान है लेकिन लोग फैसला लेने में हिचकिचाते हैं। जैसे, शादी के बाद दहेज या किसी तरह की प्रताडऩा हो तो मां-बाप हमेशा लडकी को चुप रहने की हिदायत देते हैं। उन्हें लगता है, यह एडजस्टमेंट की समस्या है या कई बार ज्यादा पैसे या सामान देकर उन्हें लगता है कि लडकी के प्रति अपने दायित्व से मुक्त हो गए हैं। ऐसी सोच ही समाज में गलत को बढावा देती है। जब लडकी के बारे में कोई बुरी खबर मिलती है तो वे अफसोस जताने लगते हैं कि पहले उन्होंने उसकी स्थिति क्यों नहीं समझी। 'तकदीर में जो लिखा होगा, वही होगा... जैसी कहावतें भी अपराधों को बढावा देने का काम करती हैं। बेटी की शादी करके गंगा नहा लेने जैसे जुमले भारतीय समाज में आज भी बोले जाते हैं। यही कारण है कि लडकियों के प्रति अन्याय होता रहता है और समाज चुप रहता है।

परिवार भी है दोषी कई घटनाओं में पाया गया है कि लडकी के माता-पिता भी अपनी ही बेटी को दोषी समझने लगते हैं। एक मुकदमा अभी सुप्रीम कोर्ट में फाइल किया गया है। लडकी लखनऊ स्थित एक शॉपिंग स्टोर में काम करती थी, जहां उसके संबंध अपनी बॉस के भाई से बन गए। यह सब प्रेम के नाम पर आपसी सहमति से हुआ। लडकी आश्वस्त थी कि लडका उससे विवाह करेगा मगर एक दिन उसे पता चला कि लडके ने तो कहीं और शादी कर ली। मामला यहीं नहीं रुका,शादी के बाद भी लडके ने लडकी पर सेक्स संबंध बनाने का दबाव डाला। लडकी ने मना किया तो उसने धमकी दी कि इनकार का मजा चखा देगा और सोशल साइट्स पर उसे और उसकी छोटी बहन को बदनाम कर देगा। लडकी हिम्मती थी, नहीं मानी तो एक दिन मौका मिलते ही लडके ने उस पर तेजाब डाल दिया, जिससे लडकी का चेहरा और शरीर का अधिकांश हिस्सा प्रभावित हुआ। लडकी की बहन उस समय लडकी के साथ थी, जिसने अपराधी को देखा था। घटनास्थल पर तेजाब की बोतल पडी थी और लडका फरार हो गया था। छोटी बहन ने दौड कर घर के पास ही हुई इस घटना की जानकारी पिता को दी। पिता बेटी को अस्पताल लेकर गए। वहां उन्हें पता चला कि अभियुक्त तो एक समृद्ध और रसूखदार परिवार से संबंध रखता है। पिता को शराब की लत थी, जिसका फायदा उठाया अभियुक्त के परिवार ने। उसे काफी पैसा दिया गया ताकि वह अभियुक्त का नाम न ले। पिता ने भी उनसे पैसे ले लिए और अपनी ही बेटी से मुंह मोड लिया। रिपोर्ट हुई लेकिन एफआइआर में अभियुक्त का नाम नहीं लिखा गया। घायल बेटी को अस्पताल में ही छोड कर पिता चला गया। बाद में छोटी बहन और भाई ने ही रिपोर्ट में अभियुक्त का नाम लिखवाया।

तारीख पर तारीख रिपोर्ट हो गई तो स्वयं पिता ही पीडित बेटी पर दबाव डालता रहा कि किसी भी हालत में लडके का नाम न ले। उसे कई तरह से धमकाया गया, इज्जत का हवाला दिया गया, इस कारण लडके को जल्दी ही जमानत भी मिल गई। लडकी को पिता ने घर से निकाल दिया। लडकी और उसका छोटा भाई घर से निकल गए और कुछ काम करके जीवन चलाने लगे। कोर्ट में हर तारीख पर पिता आता मगर अभियुक्त का नाम न लेता, हमेशा कहता कि अज्ञात ने एसिड अटैक किया है। बेटी को भी डरा-धमका कर ऐसा ही बयान दिलवाता। वकीलों ने भी काम ठीक से नहीं किया। मुकदमे की डेट पर वे गायब रहते। केस लंबा खिंचने लगा तो अंत में लडकी ने हिम्मत दिखाई। उसने बयान बदलने की इच्छा जताई और उच्च न्यायालय में पिटिशन फाइल की। वहां पैसा लेने के बावजूद उसके वकील नहीं आए और पिटिशन रद्द हो गई। शिकायत दोबारा फाइल की गई मगर नौ महीने की देरी से। इस बार भी वह रद्द हो गई। सवाल यही खडा होता है कि केस को फाइल होने में ही इतना वक्त लगेगा तो पीडित का धैर्य कैसे बचेगा? उसे न्याय कैसे मिलेगा?

खत्म हो जाती है जिंदगी कुछ दिन पहले (18 जनवरी 2017) दिल्ली के नजफगढ इलाके में सनसनीखेज वारदात में एक लडकी अनु पर उसी के घर में चाकू से कई बार वार किया गया, जिससे उसकी मौत हो गई। लडकी का कसूर यह था कि उसने हत्यारोपी अमित से शादी करने से इनकार कर दिया था। अमित पुलिस कॉन्स्टेबल का बेटा है। वह शादीशुदा है। वह लंबे समय से लडकी का पीछा कर रहा था। एक बार उसने लडकी को जहर देने की कोशिश भी की थी। लडकी एक स्कूल में अध्यापिका थी। मानसिक रूप से परेशान होने के बावजूद खौफजदा परिवार ने पुलिस में शिकायत नहीं की। अंतत: इस देरी ने लडकी की जिंदगी छीन ली। अगर इस मामले में पहले से पुलिस में रिपोर्ट कर दी जाती और अभियुक्त के खिलाफ कडे कदम उठाए जाते तो शायद आज लडकी जिंदा होती।