मां बनना बेहतरीन अनुभवों में से एक है, लेकिन मातृत्व की यह राह इतनी आसान भी नहीं है। कई बार इस अनुभव से गुजरने में कुछ दिक्कतों का सामना करना पडता है। कभी-कभी प्रेग्नेंसी फलोपियन ट्यूब में हो जाती है। जब प्रग्नेंसी गर्भाशय में न होकर फलोपियन ट्यूब में होती है तो इसे एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो जब स्त्री के अंडाशय से अंडे निकलते हैं तो उसे फलोपियन ट्यूब द्वारा उठा लिया जाता है। फिर ट्यूब में ही पुरुष वीर्य द्वारा गर्भाधान होता है और तब गर्भधारण की प्रक्रिया होती है। जब प्रेग्नेंसी 8 सेल के आकार की हो जाती है तब वह गर्भाशय में आकर स्थापित हो जाती है और फिर अगले 9 महीनों तक विकसित होती है। अगर किसी कारणवश गर्भाधान हुए अंडे गर्भाशय तक नहीं पहुंच पाते तो वे ट्यूब में स्थापित हो जाते हैं, इस स्थिति को ट्यूबल एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी कहते हैं। इसलिए एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के लिए सबसे आम जगह फलोपियन ट्यूब ही होती है। आइए जानते हैं क्यों होता है ऐसा और इसका क्या उपचार है।

कितना है खतरा

दरअसल फलोपियन ट्यूब में गर्भाशय की तरह फूलने की क्षमता नहीं होती। इसलिए बढती प्रेग्नेंसी के कारण पडने वाले दबाव से यह जल्दी ही फट जाता है और पेट में अत्यधिक रक्तस्त्राव होने लगता है, जो कभी-कभी जानलेवा भी बन सकता है।

क्या है कारण

कोई भी ऐसी बीमारी की स्थिति जो गर्भाधान हुए अंडों को गर्भाशय में जाने से रोकती है, वही एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी का कारण बनती है। इसके अन्य कारण ये हैं-

-पेल्विक में सूजन की बीमारी का होना

-सेक्सुअल ट्रांस्मिटेड डिजीज ज से क्लैमाइडिया और सूजाक

-फलोपियन ट्यूब में जन्मजात विषमता

-पेल्विक सर्जरी की गई हो (कई बार क्षतिग्रस्त होने के कारण गर्भाधान हुए अंडे फलोपियन ट्यूब से नहीं निकल पाते)

-पहले भी एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी होना

-ट्यूब का ठीक से न बंध पाना (सर्जिकल स्टर्लाइजेशन) या ट्यूबल लिगेशन रिवर्सल व गर्भधारण के लिए दवाओं का इस्तेमाल

-इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आइ.वी.एफ) जैसे इनफर्टिलिटी के उपचार

जैसा कि इन कारणों से पता चलता है कि संक्रमण या सर्जरी से ट्यूब का क्षतिग्रस्त होना ही इसका सबसे अहम कारण है।

लक्षण

-इसके लक्षण प्रेग्नेंसी जैसे होते हैं

-योनि से हल्का रक्तस्त्राव होना

-मितली और उल्टी होना

-पेट के निचले हिस्से में दर्द

-पेट में तज ऐंठन

-चक्कर आना या कमजोरी महसूस होना

-कंधे, गले या रेक्टम में दर्द

-फलोपियन ट्यूब के क्षतिग्रस्त होने पर, दर्द और रक्तस्त्राव इतना हो सकता है जिससे बेहोशी जैसी स्थिति हो सकती है।

पीरियड्स मिस होने की हिस्ट्री भी हो सकती है, लेकिन कभी-कभी यह भ्रमित भी कर सकती है। क्योंकि पीरियड्स के दौरान हलका रक्तस्त्राव होना आम बात है और इसे भूल से एक्टॉपिक सर्जरी भी समझा जा सकता है। इसलिए अगर ऊपर बताए गए लक्षण सामने आएं तो पीरियड्स मिस होने की स्थिति में एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी होने की संभावना को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

उपचार

अगर डॉक्टर को संदेह है कि फलोपियन ट्यूब क्षतिग्रस्त हुई है तो आपातकालीन सर्जरी कराना अनिवार्य है, ताकि रक्तस्त्राव रोका जा सके। कुछ मामलों में फलोपियन ट्यूब के क्षतिग्रस्त होने पर उसे निकालना ही एकमात्र रास्ता बचता है। यह अब लैप्रोस्कोपी के जरिये आसानी से किया जा सकता है। लैप्रोस्कोपी एक रॉड जैसा पतला उपकरण होता है, जिसे नाभि के पास छोटा सा चीरा लगा कर पेट में प्रवेश कराया जाता है। अगर फलोपियन ट्यूब ज्यादा क्षतिग्रस्त नहीं हुई है और प्रेग्नेंसी भी अधिक विकसित न हुई हो तो लैप्रोस्कोपी सर्जरी से ही भ्रूण को हटा कर वहां हुए नुकसान का इलाज किया जा सकता है। इस सर्जरी के दौरान फलोपियन ट्यूब में मामूली चीरा लगाकर भ्रूण को हटाया जाता है और ट्यूब में हुए नुकसान को ठीक किया जाता है।

कुछ मामलों में गर्भधारण कोशिका (प्रेग्नेंसी टिश्यूज) का विकास रोकने के लिए दवाओं का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। इलाज का यह विकल्प तभी ठीक रहता है जब ट्यूब क्षतिग्रस्त नहीं हुई हो और गर्भावस्था अधिक विकसित न हो। इस प्रक्रिया में होने वाली मां को ट्यूब में प्रेग्नेंसी खत्म करने के लिए इंजेक्शन दिया जाता है। इसे मेडिकल निगरानी में किया जाता है। एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी के लिए इस प्रकार के इलाज के बाद मरीज को आमतौर पर कुछ अतिरिक्त ब्लड टेस्ट कराने होंते हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि पूरी ट्यूबल प्रेग्नेंसी हटा दी गई है या खत्म कर दी गई है। ब्लड टेस्ट से प्रेग्नेंसी से उत्पन्न होने वाले हॉर्मोन (एच.सी.जी.) स्तर का पता चल जाता है।

सफल गर्भधारण

हर स्त्री को भविष्य में अपने मातृत्व की फिक्र बनी रहती है। लेकिन एक अच्छी खबर भी है। अगर शरीर में एक भी ट्यूब ठीक से काम कर रही हो तो स्त्री सफल गर्भधारण कर सकती है। अगर ट्यूब में किसी भी प्रकार के संक्रमण की शंका रहे तो एंटिबायोटिक्स देकर प्रेग्नेंसी प्लान करने से पहले ही संक्रमण का इलाज हो सकता है। ट्यूब की स्थिति जांचने के लिए गर्भाशय और ट्यूब का एक्स-रे होता है जिसे एच.एस.जी (हाइस्ट्रो-सैलपिंगोग्राफी) कहते हैं। दूसरी बार गर्भधारण के समय थोडी सावधानी बरतनी जरूरी है ताकि जल्द से जल्द प्रेग्नेंसी का स्थान (गर्भाशय के बाहर या अंदर) पता चल सके। एक बार गर्भाशय के अंदर प्रेग्नेंसी की पुष्टि हो जाए तो फिर एक साधारण गर्भवती स्त्री की तरह इसका आनंद ले सकती हैं।

रोकथाम

यह समस्या ट्यूब के अंदर होती है। इसलिए ट्यूब का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है। सेक्सुअली ट्रांस्मिटेड डिजीज ट्यूब के क्षतिग्रस्त होने के अहम कारण होते हैं। असुरक्षित यौन संबंध से (कॉण्डम के बिना) यौन संचारित रोग (सेक्सुअली ट्रांस्मिटेड डिजीज) का खतरा होता है।

इसलिए सुरक्षित सेक्स के प्रति जागरूक होना जरूरी है। अपने पार्टनर को कॉण्डम इस्तेमाल करने के लिए कहें, जिससे न सिर्फ अनचाही प्रेग्नेंसी से बचेंगी बल्कि एसटीडी या नि यौन संचारित रोगों से भी बच सकेंगी और आगे जाकर एक्टॉपिक प्रेग्नेंसी का खतरा भी नहीं रहेगा।

जरूरी जांच

1. गर्भावस्था जांच या बी.एच.सी.जी टेस्ट प्रेग्नेंसी की पुष्टि कर सकता है

2. सोनोग्राफी से पता चल सकता है कि प्रेग्नेंसी यूटेराइन कैविटी के बजाय गर्भाशय के बाहर है। गर्भाशय के आसपास और पेट के अंदर लिक्विड या रक्त भी हो सकता है। सोनोग्राफी में अगर ट्यूबल एरिया (एडनेक्सिया) में हाइपर इकोइक (सफेद) रिंग जैसा आकार नजर आए तो इसका उपचार हो सकता है। परेशान होने की जरूरत नहीं है।

इनपुट्स: डॉ. अरुण आपटे, प्रोफर्ट आइवीएफ फर्टिलिटी क्लिनिक के कंसल्टेंट और गाइनिकोलॉजिस्ट एवं गाइनी कैंसर सर्जन डॉ. उर्वशी झा।

इला श्रीवास्तव

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