न एक पूरा वाक्य है, जिसमें हां की कोई गुंजाइश नहीं होती मगर इसे बोलने के लिए जितना साहस चाहिए, सुनने के लिए भी उतनी ही हिम्मत चाहिए। दुनिया भर में इस इनकार, मर्जी या कंसेंट को लेकर आंदोलन जारी हैं और कानून भी पारित हो रहे हैं। स्त्री-पुरुष संबंध तभी स्वस्थ ढंग से विकसित हो सकते हैं, जब न कहने में डर न लगे और इसे सुनने में अहं न टूटे। ऐसा कैसे संभव है, बता रही हैं इंदिरा राठौर।

छोटा सा शब्द है न...। मतलब बिलकुल साफ है- नो, नहीं...। इसमें क्या कुछ और सोचने की गुंजाइश है? इसकी न कोई दूसरी व्याख्या की जा सकती है, न इसके पक्ष या विपक्ष में तर्क दिए जा सकते हैं। मगर बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। ऐसा होता तो आज के दौर में भी स्त्रियों को इस शब्द को बोलने में दुविधाओं के बडे-बडे पहाड न पार करने पडते और न सुनने पर पुरुषों का अहं इतना आहत न होता। कितने मौके आते हैं, जब मन इनकार करता है और दिमाग नफा-नुकसान का हिसाब कर हां बोलने को विवश करता है। बचपन में सिक्का उछाल कर टॉस करते थे...। हेड आया तो हां और टेल आया तो न...मगर जिंदगी बचपन के खेल से नहीं चलती, उसमें बडे फैसले लेने पडते हैं। एक हां उम्र भर की पीडा बन जाती है तो एक इनकार सही निर्णय साबित हो सकता है।

गलत व्याख्याएं स्त्रियों को लेकर समाज में अजीब सी धारणाएं हैं। पहनावे, रहन-सहन, बातचीत, खानपान, व्यवहार के अलावा वर्ग, क्षेत्र या स्तर के आधार पर भी उनके लिए धारणाएं गढ ली जाती हैं। समाज में अच्छी और बुरी स्त्री की कुछ आदर्श परिभाषाएं हैं। कपडे छोटे हैं तो आजाद-खयाल होगी, उसे हासिल किया जा सकता है... सिर झुका कर चलती है तो इनकार नहीं कर सकती, उसे टारगेट किया जा सकता है... खास राज्य या क्षेत्र की है तो उसका चरित्र गडबड होगा... आर्थिक-सामाजिक स्तर पर कमजोर है तो उसे आसानी से दबाया जा सकता है...।

लडकियों के लिए शर्माना, शारीरिक रूप से खुद को कमजोर जाहिर करना, सिर झुका कर चलना, पुरुषों के बनाए आदर्शों को चुपचाप मान लेना और स्वयं को नाजुक और परनिर्भर बनाए रखना जरूरी समझा जाता है। जाहिर है, बुरी स्त्रियां वे हैं, जो इन जेंडर आधारित व्याख्याओं को स्वीकार नहीं करतीं। भारतीय समाज में चरित्र या यौन शुचिता को स्त्री पर इतना थोप दिया गया है कि वे इससे बाहर नहीं निकल पातीं। किसी स्त्री की आवाज दबानी हो तो उसके चरित्र पर सवाल खडे कर दें, वह चुप हो जाएगी। जो स्त्रियां आजादी से जीने की चाह रखती हैं और खुद को रूढ परिभाषाओं के घेरे में नहीं बांधतीं, वे लोगों की नजरों में खटकती हैं।

कुछ समय पूर्व आई फिल्म 'पिंक में इन्हीं सवालों को उठाया गय। जैसे ही कोई स्त्री अपने ढंग से जीने की कोशिश करने लगती है, उसे 'सर्वसुलभ मान लिया जाता है। उसकी न को हां समझ लिया जाता है। लडकी देर शाम सडक पर हो तो आती-जाती कारों के शीशे उतरने लगते हैं। कई जोडी घूरती आंखें उनका पीछा करने लगती हैं और कई तो रेट भी पूछ लिया करते हैं।

कानूनी परिभाषा नो मीन्स नो...एक कानूनी टर्म है। एडवोकेट कुणाल मदन इसका अर्थ बताते हैं, बिना किसी की मर्जी के उसके साथ सेक्स संबंध बनाना कानूनन अपराध है। दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद जस्टिस वर्मा कमेटी ने क्रिमिनल लॉ में कुछ संशोधन किए थे। आईपीसी की धारा 375 के अनुसार, स्त्री की मर्जी या इच्छा के खिलाफ उसके साथ सेक्स संबंध बनाना रेप की श्रेणी में आता है। मर्जी या कंसेंट को कानून में कुछ इस तरह परिभाषित किया गया है, 'सेक्सुअल क्रिया में स्त्री की हां तब मानी जाएगी, जब वह अपने शब्दों, बॉडी लैंग्वेज, मौखिक या शारीरिक संवाद से जाहिर करे कि वह उस विशेष क्रिया में दिलचस्पी रखती है। दूसरी ओर महज इस आधार पर उसकी मर्जी नहीं मानी जाएगी कि उसने शारीरिक रूप से सेक्स क्रिया का विरोध नहीं किया था।

भारत में कंसेंट की यह व्याख्या केनेडियन कानून से प्रभावित है, जहां यौन शोषण का आरोपी यह कह कर नहीं बच सकता कि उसे लगा था कि सेक्सुअल एक्ट में स्त्री की सहमति है। उसे इस बात को स्पष्ट ढंग से बताना होता है।

इनकार मुश्किल क्यों इसमें संदेह नहीं कि बेडरूम से बोर्डरूम तक आज की स्त्री ने अपनी पारंपरिक छवि को काफी हद तक तोडा है। इसके बावजूद कई स्तरों पर वह आज भी न कहने का साहस नहीं दिखा पाती। आखिर न कहना इतना मुश्किल क्यों है? इसका एक जवाब यह हो सकता है कि स्त्रियों पर रिश्तों का दबाव बहुत ज्यादा होता है। अपराध-बोध, तारीफ की ख्वाहिश, भावनात्क निर्भरता और असुरक्षा-भय... जैसी कई वजहें हैं, जो उन्हें न कहने से रोकती हैं। सबको खुश रखने जैसी नसीहतें उन्हें गलत को सहते रहने और विरोध न कर पाने की स्थिति तक पहुंचा देती हैं।

दूसरी ओर इनकार को हमेशा एक नकारात्मक शब्द माना जाता रहा है। समाजशास्त्री डॉ. रितु सारस्वत कहती हैं, 'स्त्रियां खुद को कमजोर समझने की भूल करती हैं। इसकी वजह यह है कि उनके लिए जेंडर और वर्जिनिटी को इतना बडा

बना दिया गया है कि उनमें निर्भरता और असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है। दुर्भाग्य से पितृसत्तात्मक समाज में इसकी जडें बहुत गहरी धंसी हुई हैं। समस्या का दूसरा पहलू यह है कि सारा खेल पावर का है। चूंकि सत्ता पर हमेशा से पुरुष रहा है, इसलिए वह स्त्री की न को भी हां समझना अपना अधिकार समझता है। इसके उलट कई पावरफुल स्त्रियों के सामने पुरुष भी झुकते हैं, हालांकि यह संख्या नगण्य है। स्त्री के सामने सर्वाइवल का संघर्ष अधिक है। इसलिए वह कोई भी कदम उठाने से पहले जोड-घटाव करती है। जहां नुकसान की आशंका दिखती है, वहां इनकार नहीं कर पाती। अगर वह थोडा रिस्क ले तो शायद उसका पलडा भारी हो मगर यह आत्मविश्वास अभी उसमें पूरी तरह नहीं आ सका है। जब तक वह आर्थिक और भावनात्मक तौर पर मजबूत नहीं बन जाती, तब तक अपने हक में न कहना भी नहीं सीख सकती।

निर्णय लेना है जरूरी इसी बात को आगे बढाते हुए मनोवैज्ञानिक डॉ. अलका चौबे कहती हैं, 'न कहना निर्णय लेने की क्षमता से जुडा मामला है। मैं कई कामगार स्त्रियों को देखती हूं, जो पति की मारपीट पर चुप नहीं रहतीं, पलटवार करती हैं या अलग होने का साहस भी कर लेती हैं। दूसरी ओर मेरे काउंसलिंग सेंटर में कई बार उच्चवर्गीय पढी-लिखी स्त्रियां भी आती हैं, जो बहुत कुछ सहने के बावजूद विरोध नहीं कर पातीं। एक डॉक्टर को मैं निजी तौर पर जानती हूं जो हर रोज पति से पिटती हैं लेकिन इसकी शिकायत नहीं करतीं। नो मीन्स नो आज भी एक आदर्श वाक्य है, जिसे आम समाज पर लागू करना मुश्किल है। स्त्रियों को यह आत्मविश्वास दिलाना होगा कि न कहने से उनके रास्ते बंद नहीं हो जाएंगे।

राहें खुद बनानी होंगी कोलकाता की साहित्यकार और 'लास्ट वर्ड जैसा चर्चित उपन्यास लिखने वाली सहेली मित्रा कहती हैं, 'जिन समाजों में स्त्रियों की स्थिति मजबूत है, वहां वे आसानी से फैसले लेती हैं और इनकार करना भी जानती हैं। मैं बंगाली परिवार से आती हूं, जहां स्त्रियां पहले से मजबूत स्थिति में रही हैं। मेरे माता-पिता ने 50 वर्ष पहले लव मैरिज की थी और तब भी परिवार ने उसे स्वीकार किया था। मैंने भी हमेशा अपनी शर्तों पर जिंदगी जी है। रिश्तों में मेरा पक्ष साफ रहा है। मैंने शादी से पहले ही ससुराल वालों को कह दिया था कि सिंदूर नहीं लगाऊंगी और सरनेम नहीं बदलूंगी...। मेरे पुरुष मित्र भी हैं लेकिन मेरे पति को इससे कोई समस्या नहीं हुई। हालांकि शादी के बाद कुछ लोगों का मानना था कि मुझे पुरुष मित्रों से नहीं मिलना चाहिए। कई बार मेरे खुले व्यवहार के कारण दोस्तों के परिवार वालों को गलतफहमी हो जाती थी, जिसे बाद में मुझे ही दूर करना पडता था। मैंने 20 साल नौकरी करने के बाद हाल ही में छोड दी। नौकरी करना या न करना भी मेरी चॉयस थी। मैं अपने पेरेंट्स की इकलौती बेटी हूं। मेरी मां अभी बीमार हैं तो उनकी देखभाल मेरी प्राथमिकता है। मैं 'ऑल अबाउट ईस्ट नाम से ब्लॉग लिखती हूं, जिसमें स्त्रियों की रीअल लाइफ की बात करती हूं। मैं न की ताकत उन्हें बताती हूं। इसका मतलब यह नहीं है कि मैं नारीवादी हूं या मुझे पुरुषों से नफरत है। मैं बस लोगों को यही बताना चाहती हूं कि स्त्री से भी पहले मैं एक इंसान हूं। मुझे सिर्फ जेंडर की तरह न ट्रीट किया जाए।

मां को भी बदलना होगा लडकी में ऐसी निर्णय क्षमता तभी आ सकती है, जब उनकी परवरिश में भेदभाव न बरता जाए। यहां मांओं को भी बदलना होगा। उन्हें बेटियों को बोलना सिखाना होगा।

रेडियो जॉकी-ऐक्टर अपारशक्ति खुराना कहते हैं, 'असल समस्या हमारे घरों से शुरू होती है। लडकियों पर पाबंदी लगाई जाती है कि उन्हें कैसे रहना है, क्या पहनना है, क्या खाना है और कहां जाना है। मेरे रेडियो शो पर कुछ साल पहले एक साइकोलॉजिस्ट अपने अनुभव बांट रही थीं। उनकी एक क्लाइंट के बेटा-बेटी एक ही स्कूल में पढते थे। दोनों साथ घर लौटते थे। मां बेटी से कहती थी कि बेटे के लिए मिल्क शेक बना दे। क्या लडका यह काम नहीं कर सकता? मां ही भेदभाव करेगी तो बाकी समाज को क्या कहें? हमारे देश में लडकियों के खिलाफ जघन्य अपराध होते रहते हैं और मुझे नहीं लगता कि इसमें उनके कपडों की कोई भूमिका होती होगी। अगर कोई गंदी मानसिकता का है तो लडकी चाहे सलवार-सूट में हो या घूंघट में, वह झांकेगा जरूर क्योंकि उसकी फितरत यही है। हाल में मैंने सोशल साइट पर एक पोस्ट देखी थी, जिसमें शॉट्र्स और बुर्के का संवाद चल रहा है। शॉट्र्स ने कहा, यह मेरी गलती है। जवाब में बुर्के ने कहा, गलती तो मेरी भी है। मसला शॉट्र्स या बुर्के का नहीं, मानसिकता का है। मैंने हाल में फिल्म 'दंगल की है। इसमें दो बहनें गाली देने पर लडके की पिटाई कर देती हैं। असल जिंदगी में भी ऐसा होना चाहिए। कुछ महीने पहले मैं अपने भतीजे-भतीजी के लिए शॉपिंग कर रहा था। पांच वर्षीय भतीजे के लिए हेलीकॉप्टर लिया और ढाई साल की भतीजी के लिए ड्रेस। फिल्म 'पिंक और 'दंगल के बाद मेरी सोच बदली। फिर मैं एक स्पोट्र्स शॉप पर गया और मैंने दोनों के लिए बॉक्सिंग ग्लव्स और पैड खरीदे ताकि वे साथ-साथ प्रैक्टिस कर सके। अगर हम चाहते हैं कि लडकियां दमदार तरीके से अपनी हां या न कह सके तो उन्हें मजबूत बनाना होगा।

चुनौती का सामना करें स्त्रियों के सेल्फ डिफेंस के लिए काम कर रही संस्था स्लैप की एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर मृगांका डडवाल कहती हैं, 'कई बार लडकी किसी गलत प्रस्ताव पर बॉयफ्रेंड को इसलिए न नहीं कह पाती कि कहीं वह रिश्ता न तोड दे। कई बार ऐसी लडकियां भी हमसे मदद मांगने आती हैं, जो पहले किसी के साथ रिश्ते में थीं मगर अब नहीं रहना चाहतीं और पार्टनर उन्हें ब्लैकमेल कर रहा है। एक गलती सुधारने के क्रम में वे गलतियां करती चली जाती हैं। इसकी वजह केवल यही है कि वे माता-पिता से डरती हैं कि कहीं उन्हें ही इसकी सजा न मिल जाए...। बच्चों और माता-पिता के बीच खुलापन जरूरी है। लडकियों के भीतर यह विश्वास होना जरूरी है कि उनके पेरेंट्स हर जगह उनके साथ खडे होंगे। कई बार वे कार्यस्थल में हो रहे यौन शोषण के खिलाफ नहीं बोल पातीं क्योंकि डरती हैं कि उन्हें नौकरी से हाथ न धोना पडे। इस तरह के डर से बाहर निकलना होगा, सिर्फ न कहना ही काफी नहीं है, हर अन्याय के विरोध में खडे रहने का साहस करना होगा।

इनकार का स्वीकार बेहतर, भयमुक्त और सुरक्षित समाज तभी बन सकता है, जब स्त्री और पुरुष मिल कर इसकी नींव डालें। इसकी शुरुआत अपने घर से होनी चाहिए। पुरुषों को यह जानना होगा कि अगर कोई स्त्री मर्जी के बिना उनकी बात मान रही है तो ऐसे रिश्ते के परिणाम कभी सुखद नहीं हो सकते। प्यार का एहसास जबरन नहीं कराया जा सकता। उन्हें स्त्री के अधिकारों का सम्मान करना सीखना होगा। ऐसा तभी होगा, जब वे स्त्री को जेंडर से पहले इंसान समझेंगे।

स्त्रियों को भी सीखना होगा कि अगर कुछ ऐसा है, जो उनकी आत्मा को गवारा नहीं तो महज इसलिए उसे न मानें कि इससे कुछ लोग खुश रहेंगे। व्यक्तिगत और प्रोफेशनल जिंदगी में उन्हें स्पष्टवादी बनना होगा। अपनी असुरक्षाओं, अपराध-बोध और दुविधाओं से उबरना, जागरूक और सतर्क रहना, साफ सुनना और बोलना उनके लिए जरूरी है। गलत न तो सहें और न होने दें।

अहं आपसी रिश्तों और सामाजिक संरचना को ठेस पहुंचाता है और ऐसा अहं किस काम का, जो किसी इंसान को ऑब्जेक्ट में तब्दील कर दे? जिसमें किसी एक की इच्छा या मर्जी शामिल नहीं, ऐसे रिश्ते सिर्फ समझौतों से चल सकते हैं, वे किसी को मंजिल तक नहीं पहुंचा सकते। क्या हम अपने घर के पुरुषों को यह बता सकते हैं कि स्त्रियों को खुश रखे बिना उनके घर नहीं चल सकते...? क्या हम अपने बेटों को सिखा सकते हैं कि स्त्री का सम्मान या अपमान करने से पहले उन्हें एक इंसान की तरह देखने की कोशिश करें? क्या हम उन्हें यह समझा सकते हैं कि स्त्री की खुशी, पसंद या इच्छा का ध्यान रखने, उनके हक की बात करने, उन्हें बराबरी का दर्जा देने और उन्हें सपोर्ट करने से कोई पुरुष कमजोर नहीं हो जाता? इंटरव्यू : मुंबई से अमित कर्ण, प्राची दीक्षित, स्मिता श्रीवास्तव और दिल्ली से इंदिरा

सोच पर प्रहार जरूरी हमारे देश में घोर मर्दवादी सोच हावी है। लडकियों के कपडों, चलने, हंसने-बोलने से उनके चरित्र का आकलन कर लिया जाता है। अगर वे किसी से हंस कर बात कर रही हैं तो उन्हें गलत ही समझ लिया जाता है। इस पितृसत्तात्मक सोच से पुरुष ही नहीं, स्त्रियां भी ग्रस्त हैं। खासकर छोटे शहरों में तो लडकियां हमेशा एक सुरक्षा कवच बना कर चलती हैं। अपने पहनावे और बातचीत को लेकर अतिरिक्त सजग रहती हैं। वे हमेशा एक डर के साथ जीती हैं। हमारी जैसी कुछ लडकियां खुशकिस्मत हैं कि हमारे परिवार और आसपास के लोग खुली सोच वाले रहे। मैं जो चाहती थी, इसीलिए हासिल भी कर पाई। मेरे भीतर स्वतंत्र फैसले लेने का साहस भी इसीलिए पैदा हो सका क्योंकि मुझे मेरे परिवार ने इस लायक बनाया। यह जरूरी है कि हिंदुस्तान की हर लडकी को ऐसी परवरिश मिल सके। ऐसा भी नहीं है कि आम लडकियों के साथ ही गलत होता है, उच्च घरानों की स्त्रियों के साथ भी बहुत कुछ होता है, जिसके खिलाफ खडे होने का साहस उनमें नहीं होता। तथाकथित सुरक्षित चारदीवारी में अपने ही घात लगाए बैठे रहते हैं। मुझे मेरे माता-पिता ने बुरी चीजों का विरोध करना सिखाया, इसलिए मैं भी सबसे यही कहती हूं कि अपनी बेटी, बहन और बहू को 'न कहना सिखाएं। इसी से पुरुषों का नजरिया भी बदलेगा।

न शब्द से परहेज नहीं किया मेरे सामने निजी जीवन में तो नहीं, मगर प्रोफेशनल जिंदगी में कई बार ऐसे मौके आए, जब न कहना पडा। कई बार किसी काम के लिए न कहना मुश्किल भी होता है। खासकर तब, जब आप करियर के पहले पडाव पर होते हैं। कई बार न कहने का नुकसान झेलना पडता है। न कहते ही आपको इंडस्ट्री से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। धीरे-धीरे जब थोडी जगह बन जाती है तो न कहना भी आसान हो जाता है। ऐक्टर बनना आसान बात नहीं है। एक बार इंडस्ट्री में पहचान बन जाती है तो बिना किसी दुविधा के ऐसे काम को मना कर सकते हैं, जिनमें हम कंफर्टेबल नहीं हैं। फिर भी मैं नई लडकियों से कहना चाहती हूं कि शुरू से ही हां और न के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा बना लें और उस पर मजबूती से डटे रहें ताकि किसी तरह की गलतफहमी या बाद में होने वाले पछतावे से बच सकें। एक मुकाम तक पहुंचने के बाद राहें आसान हो जाती हैं। मैंने तो जीवन में कई बार न कहा है और मुझे कभी इस शब्द से परहेज नहीं रहा। हो सकता है इनकार के कारण तात्कालिक रूप से मुझे नुकसान हुआ हो लेकिन बाद में इसके परिणाम बेहतर ही रहे।

विरोध का साहस पैदा करें लैमर वल्र्ड हो या कॉरपोरेट जगत, स्त्रियों के लिए हर जगह लोग जजमेंटल होते हैं। उन्हें लगता है कि वे जो चाहें, स्त्री के बारे में सोच सकते हैं या कह सकते हैं। बहुत ही कम फील्ड ऐसे हैं, जहां लोगों की सोच थोडी खुली हुई है और वे स्त्रियों को एक इंसान की तरह देख पाते हैं। शुरुआती दिनों में मुझे भी बहुत कुछ झेलना पडा है, कई बार न कहने का साहस जुटाना पडा। मैंने अपनी गलतियों से सबक लिया और उसे दोहराया नहीं। अब जिस चीज को मैं करना चाहती हूं, सिर्फ उसी के लिए हां कहती हूं। वैसे अब धीरे-धीरे लोगों का नजरिया भी बदलने लगा है। महानगरों में लोग लडकियों के प्रति सहज हो रहे हैं। उनके पहनावे, रहन-सहन या जीवनशैली को लेकर उनकी सोच बदल रही है। वैसे, मैं समझती हूं कि जो लोग लडकी के इनकार को नहीं समझ पाते या उनकी न का सम्मान नहीं कर पाते, उनका एक ही इलाज है- कान के नीचे जोरदार तमाचा जड दें। इस मामले में लडकियों को हिम्मत दिखाने की जरूरत है, साथ ही कानून सख्त हों और पुलिस प्रशासन चुस्त, तभी लोग सुधरेंगे। इससे भी पहले अपनी पितृसत्तात्मक सोच बदलने की रूरत है।

सवाल लडकी पर ही क्यों? देखिए, पुरुष हो या स्त्री, गलतियां सभी से होती हैं। हमारे समाज में युगों से यही धारणा बनी हुई है कि स्त्री की न में हां छिपी है। हम सभी पुरुष इसी धारणा के साथ पले-बढे हैं। हां, आज मैं स्वीकार करता हूं कि मैंने भी यह गलती की है क्योंकि शायद पहले उतनी परिपक्वता नहीं थी मुझमें। अगर लडकी ने न कह दिया तो हम पुरुषों का अहं आहत हो जाता है। मैंने अनजाने में यह भूल की, जिसके लिए बाद में पछतावा भी हुआ। फिल्म पिंक में कंसेंट के इसी मुद्दे को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है। अकसर कहा जाता है कि लडकियां छोटे कपडे पहन कर चलेंगी तो पुरुष तो भटकेंगे ही या लडकियों को रेप से बचना है तो उन्हें शालीन ड्रेस पहननी चाहिए। मैं ऐसे लोगों से कहना चाहता हूं कि कपडे नहीं, लोगों की सोच छोटी होती है। एक बात और....भले ही कोई चीज गलत हो, अगर उसे मानने वालों की संख्या ज्यादा है तो ऐसी धारणाओं या बातों को सिरे से खारिज करने के बजाय सावधानी से उसका आकलन करें। कई बार लडकियों के लिए आसानी से बोल्ड, फास्ट-फॉरवर्ड जैसे शब्द बोल दिए जाते हैं, जबकि लडकों के लिए ऐसी शब्दावली प्रयोग नहीं की जाती। लडके जिस भी तरीके से रहना चाहें-रह लेते हैं मगर लडकियां मर्जी के मुताबिक नहीं जी सकतीं। ऐसे कई उदाहरण भी हैं, जिनमें लडकी ने न कहने की हिम्मत की, भले ही इससे उन्हें बेहद नुकसान भी हुआ हो। इस हिम्मत की सराहना होनी चाहिए।

लडकों को बदलने होंगे विचार मुझे तो यह बात ही बेहद बेवकूफाना लगती है कि लडकी के कपडों के कारण उसके प्रति अपराध बढते हैं। हमारी पीढी को इस सोच के खिलाफ खडा होना चाहिए। समाज बदल रहा है मगर आज भी कई जगह पर लडका-लडकी के बीच भेदभाव जारी है। लडके मनमानी करते हैं तो एकबारगी उन्हें माफ कर दिया जाता है मगर लडकियों को गलती करने का भी अधिकार नहीं होता। उनके घर से निकलने व लौटने का समय निश्चित होता है, अगर किसी कारण देर हो जाए तो डांट सुननी पडती है। लडका हो या लडकी, दोनों एक मां की कोख से ही पैदा होते हैं, फिर दोनों की परवरिश अलग क्यों होनी चाहिए? यहीं से गडबड होती है। पुरुष को लगता है कि वह सुपीरियर है, इसलिए वह स्त्री के प्रति जजमेंटल हो जाता है। लडकों को सिखाना चाहिए कि वे लडकियों से कैसा व्यवहार करें। इसका आगाज पिता से होगा क्योंकि लडकों का आदर्श उनके पिता होते हैं। वैसे अब लडकियां स्वतंत्र फैसले ले रही हैं, अपनी बात को स्पष्ट ढंग से रखना सीख रही हैं। फिल्म इंडस्ट्री में तो अब अपनी भूमिका से जुडा हर फैसला लडकियां अपने विवेक से लेती हैं। उन्हें मालूम है कि उन्हें कहां हां कहना है और कहां न...। अब वह समय नहीं है कि कोई उनसे जबरन कुछ करवा लेगा।

न कहना जरूरी होता है निजी और प्रोफेशनल स्तरों पर मेरे सामने भी कई बार ऐसी स्थितियां आई हैं, जब मेरे लिए न कहना जरूरी हो गया। जब मेरी उम्र कम थी तो मैं असहज स्थितियों से हमेशा बचने की कोशिश करती थी मगर अब खुद पर भरोसा है। मुझे पता है कि मेरी जरूरतें क्या हैं। कई बार मेरे सामने भी 'फाइट और फ्लाइट जैसी स्थितियां आई हैं क्योंकि हमारे यहां स्त्री की न कोई सुनना ही नहीं चाहता। मैंने जीवन में कई बार न कहा है और इसे कहने के पहले या बाद में मुझे कोई अपराध-बोध नहीं रहा। मुझे लगता है कि अगर मैं ही दुविधाग्रस्त रहूंगी तो बाकी लडकियों के लिए उदाहरण कैसे पेश करूंगी...। मुझे अपनी इस स्पष्टवादिता या न कहने के कारण कई बार प्रोफेशनल जीवन में नुकसान भी झेलना पडा है, फिर भी मुझे जो सही लगता है, उसके लिए खडी होती हूं। अपने लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी लडती हूं। कई बार तो मुझ पर घमंडी जैसा लेबल भी लगा है पर मैं चुपचाप बैठ कर तमाशा देखने वालों में नहीं हूं। मैं गलत के खिलाफ बोलना पसंद करती हूं। हां, मेरे लिए भी कई बार दोस्ती या रिश्ते में न कहना मुश्किल हुआ है क्योंकि वहां मैं अपने कंफर्ट के बजाय करीबियों और प्रियजनों की सुविधा का खयाल रखती हूं और उन्हें खुश देखना चाहती हूं।

न पर मेरा हक है न अपने आप में पूरा वाक्य है, इससे आगे किसी को कुछ समझाने की जरूरत होनी ही नहीं चाहिए। अच्छा तो यह होता है कि सामने वाला हाव-भाव से ही इस इनकार को समझ जाए। न कहना हमारा हक है और हर पुरुष को इसका सम्मान करना चाहिए। मैं खुद को खुशकिस्मत मानती हूं कि मुझे अपने जीवन में यह बात किसी को समझानी नहीं पडी। मेरे आसपास के पुरुष ऐसे रहे, जो स्त्री की बात को महत्व देते हैं। हां, इतना जरूर है कि न बोलने से पहले मैं काफी सोच-विचार करती हूं, ठीक वैसे ही, जैसे हां बोलने से पहले भी सोचती हूं। मैंने अब तक हमेशा अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं लिए और पूरे आत्मविश्वास के साथ लिए। इसीलिए अपनी निजी और प्रोफेशनल जीवन में मैं इस मुकाम तक पहुंची हूं। मुझे अगर कोई बात पसंद नहीं है तो बेझिझक न कह देती हूं। कोई काम पसंद नहीं तो उसके लिए भी न कहने से नहीं हिचकिचाती। एक बार न बोल दिया तो फिर अपना निर्णय कभी नहीं बदलती, फिर भले ही इसका परिणाम कुछ भी हो।

हमने पहले यह नहीं सोचा था कि हमारी फिल्म की थीम 'नो मीन्स नो होगी। हमारा सोचना था कि अगर लडकी अपनी मर्जी से जीना चाहती है, वह आपके साथ ड्रिंक करना चाहती है तो भी इसका यह मतलब कैसे हुआ कि वह 'चरित्रहीन है और आप उसके साथ कुछ भी कर सकते हैं? अगर वह आपके साथ संबंध नहीं बनाना चाहती तो आप अपनी मर्जी उस पर कैसे थोप सकते हैं? लडकी की न को कई बार उसका नखरा समझा जाता है। उसकी न को हां में बनाने के लिए बल-प्रयोग भी किया जा सकता है। यह अनैतिक ही नहीं, गैरकानूनी भी है। हमारी फिल्म की पूरी थीम लडकियों से बातचीत के बाद ही बनी। तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी, शुजित सरकार, सभी ने अपनी-अपनी जिंदगी के अनुभव सामने रखे। कहानी दिल्ली और आसपास के माहौल पर इसलिए फोकस की गई क्योंकि यहां लोग रातों-रात अमीर बने हैं, खासतौर पर नोएडा और गुडग़ांव में।

उन्हें लगता है कि पैसे के दम पर वे कुछ भी कर सकते हैं, पकडे गए तो छूट जाएंगे। दुर्भाग्य से ऐसा होता भी है। जिन कम्युनिटीज में स्त्रियां ब्रेड अर्नर हैं, वहां उनकी स्थिति थोडी बेहतर है। जैसे मुंबई में नौकरीपेशा औरतें ज्यादा हैं तो वहां लोग स्त्रियों को देखने के आदी हैं। हमारे समाज में कहावत है, 'हंसी तो फंसी। पुरानी फिल्मों ने इस कहावत को चरितार्थ भी किया है। जिस समाज में परिवार व समाज के निर्माण में स्त्रियों की भूमिका अहम होगी, वहां उनके प्रति ऐसी सोच कम विकसित होगी। जहां ऐसा नहीं होगा, वहां वही पुरानी मर्दवादी सोच काम करेगी। स्वीडन विकसित देश है मगर वहां नो मीन्स नो का कानून अब आया है। जर्मनी में भी अभी यह कानून आया है। ऑस्ट्रेलिया में भी यह समस्या है। यूरोपीय देशों में लडकियां शॉर्ट ड्रेस पहनती हैं तो वहां भी सीटियां बजती हैं लेकिन बस यहीं तक...। वहां ड्रेस लडकियों का कैरेक्टर सर्टिफिकेट नहीं बनती।