मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर पद पर रहने के बाद सामाजिक कार्यों से जुडऩा, शोषितों व वंचितों के हक के लिए काम करना आसान नहीं होता। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालिवाल ने दिल की आवाज सुनी और जुनून को जिंदगी बनाया। उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश। क्या वजह थी कि एक बडी नौकरी छोडकर आप सामाजिक कार्यों से जुडीं? हर किसी के जीवन में ऐसा दौर आता है, जब लगता है कि कुछ करना चाहिए। यह जज्बा तो बचपन से ही था कि जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए। इसलिए प्रोफेशनल जीवन में काफी आगे बढऩे के बावजूद मैंने यह राह चुनी। 'परिवर्तन' संस्था के साथ आठ वर्षों तक काम किया। फिर अन्ना आंदोलन से जुडी और कोर कमेटी की मेंबर रही। मेरा सौभाग्य है कि मुझे अच्छे और अनुभवी लोगों के साथ काम करने व सीखने का मौका मिला। सोचा था, उन लोगों की आवाज बनूं, जिनकी सिस्टम में कोई नहीं सुनता। दिल्ली महिला आयोग में भी मेरा फोकस उन स्त्रियों की आवाज बुलंद करना है, जो गुमनामी में रहते हुए अकेली समस्याओं से जूझ रही हैं। आए दिन छोटी-छोटी बच्चियों से रेप की घटनाएं हो रही हैं। ऐसे में हमारा फर्ज बनता है कि हम ऐसी स्त्रियों की मदद करें और उनमें इतना आत्मविश्वास जगाएं कि वे अपने हितों की रक्षा स्वयं कर सकें। आपके सामने क्या चुनौतियां है? जिम्मेदारियां तो काफी बढ गई हैं। हमेशा यही सोचती रहती हूं कि स्त्री-सुरक्षा की गारंटी कैसे की जाए। दिल्ली में स्त्रियां कहीं भी महफूज नहीं हैं पर डरने के बजाय हमें सिस्टम से लडऩा चाहिए। अभी भी बहुत अच्छे लोग हैं, जो दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते हैं। स्त्रियों के मन से असुरक्षा का भय दूर करना ही सबसे बडी चुनौती है और मैं इसी दिशा में प्रयासरत हूं। मौजूदा हालात को कैसे बदला जाए? इसके लिए सभी को मिल कर काम करना होगा। परिवार से शुरुआत होनी चाहिए। हम बेटे को महान बना देते हैं, बेटी को सिखाते हैं कि तुम्हें सहना चाहिए। दोहरी मानसिकता से बाहर निकलना होगा। सच्चा भारतीय वही है, जो स्त्री का सम्मान करे, दूसरों का दर्द समझे। स्त्री को देवी बनाने की नहीं, इंसान समझने की जरूरत है। उसे समानता का अधिकार देना होगा। रेप के मामले इधर काफी बढे हैं... एक वजह यह भी है कि समय पर अपराधी को सजा नहीं मिल पाती। पुलिस जांच में देरी होती है, जांच में क्वॉलिटी नहीं दिखती। दिल्ली में एक ही फॉरेंसिक लैब है, जिसके कारण सैंपल आने में ही चार-चार साल लग जाते हैं। फास्ट ट्रैक कोर्ट बने हैं लेकिन अभी वे बेहद स्लो हैं। सजा मिलने में देरी भी वह बडा कारण है, जिससे अपराध को बढावा मिलता है। निजी और प्रोफेशनल जिंदगी के बीच तालमेल कैसे बिठाती हैं? कामकाजी स्त्रियों को घर और दफ्तर, दोनों जगह समान रूप से ध्यान देना जरूरी होता है। मैं खुशनसीब हूं कि मेरे हज्बैंड बहुत सपोर्टिव हैं। वे मेरी जिम्मेदारियों को समझते हैं। मैं परिवार को ज्यादा समय नहीं दे पाती। हां, अपने काम के प्रति ईमानदार हूं, हमेशा खुद को पहले से बेहतर बनाने की कोशिश करती हूं। फुर्सत के पल कैसे बिताती हैं? फुर्सत के पल मुश्किल से ही मिलते हैं मुझे। थोडा समय मिलता है तो विपश्यना करती हूं। पुराने गाने भी सुनती हूं, जिनसे मन को बहुत सुकून मिलता है। योगा करना चाहती हूं लेकिन इसके लिए समय नहीं मिल पाता। रात में देर तक जाग कर मुझे काम करना पडता है, जिसका नींद पर प्रभाव तो पडता है। क्या पढऩा पसंद है आपको? पॉलिटिक्स और अध्यात्म से जुडी किताबें पढती हूं। कभी-कभी फिक्शन भी पढ लेती हूं। सखी की पाठिकाओं को क्या संदेश देना चाहेंगी? मैं सभी स्त्रियों से यही कहना चाहूंगी कि राह में चाहे कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएं पर हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए। वही करें, जिससे आपके दिल को सच्ची खुशी मिले पर यह भी ध्यान रखें कि हमारी वजह से दूसरों को परेशानी न हो। खुद को बेहतर कैसे बनाएं, इस बारे में सोचना जरूरी है। हर धर्म इंसानियत सिखाता है। कर्म ही सबसे बडी पूजा है, इसलिए अपने काम पर ध्यान दें। अंत में सबसे जरूरी बात, हमें हमेशा सच्चाई के लिए लडऩा चाहिए। प्रस्तुति : संध्या रानी फोटो : संजीव कुमार