दीपिका जिंदल ऐसी बिजनेस फैमिली से आती हैं, जहां स्टील ही सब कुछ है। पति रतन जिंदल के साथ बाहरी देशों की यात्राओं के दौरान जब वह स्टील के प्रयोग देखतीं तो सोचतीं कि क्या भारत में ऐसा हो सकता है! धीरे-धीरे सोच पैशन में बदली और आर्ट डि नॉक्स के रूप में उनका सपना हकीकत बन गया। उन्होंने बिना किसी ट्रेनिंग और अनुभव के न सिर्फ एक अनजान क्षेत्र में कदम बढाया, बल्कि स्टील आर्ट को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाली पहली भारतीय स्त्री भी बनीं। काम के प्रति उनका जज्बा, समर्पण और स्पष्ट सोच बताती है कि अनुभव कम होने के बावजूद अगर मन में लगन है तो सफलता मिलकर रहती है। दीपिका जिंदल से मुलाकात उनके गुडग़ांव स्थित स्टोर पर हुई। मैं 15 मिनट लेट थी लेकिन उन्होंने गर्मजोशी से स्वागत किया और अपनी नायाब कलाकृतियों से भी रूबरू कराया। दीपिका की सफलता की कहानी उनकी जुबानी। दीपिका जी, आर्ट डि नॉक्स का आइडिया कैसे आया? आप कोलकाता में पैदा हुईं, क्या वहां के कल्चरल माहौल का असर है? मैं कोलकाता के एक मारवाडी परिवार में पैदा हुई,जहां कहा जाता है कि शादी करनी है, अच्छी हाउसवाइफ या बहू बनना है। मेरी परवरिश बहुत ट्रडिशनल और कंजर्वेटिव ढंग से हुई। सोचा भी नहीं था कि बिजनेसवुमन बनूंगी। मेरी शादी 19 की उम्र में हो गई। मैंने लॉरेटो से पढाई की लेकिन ग्रेजुएशन पूरा होने से पहले ही शादी हो गई और मैं दिल्ली आ गई। 20 साल हाउसवाइफ के रूप में गुजारे। हालांकि इसमें भी बहुत कुछ करने का मौका मिला। शादी, जन्मदिन, घर के इंटीरियर...के जरिए क्रिएटिविटी मेरे भीतर आ रही थी। मेरी पसंद-नापसंद बन रही थी। पति रतन स्टील बिजनेस में हैं। यात्राओं के दौरान हम इंटरनेशनल मार्केट में स्टील प्रोडक्ट्स देखते तो चर्चा करते थे कि भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? हमें यहां एक वैक्यूम दिखाई देता था। तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि मैं कुछ करूंगी। मेरे पास अनुभव नहीं था। मैं न तो बिजनेसवुमन थी, न मेरा ऐसा बैकग्राउंड था। सफलता की गारंटी भी नहीं थी। सामने ऐसा भी कोई नहीं था, जिसे देख कर कह सकती कि हां-यह इस फील्ड में सफल है। उस समय मैं 39 साल की थी। बच्चे बडे हो रहे थे। उनकी बाहरी दुनिया बनने लगी थी। जीवन में खालीपन आ रहा था। मैं सोचने लगी कि अब क्या करना चाहिए। तब रतन ने कहा कि तुम स्टील में डिजाइनिंग क्यों नहीं करतीं? मैंने सोचा, चलो कुछ तो मिला करने को (हंसते हुए) और काम शुरू कर दिया। लेकिन हमने कहीं पढा था कि आपके पति इस आइडिया से कन्विंस्ड नहीं थे...। नहीं...बल्कि उन्होंने ही कहा कि मुझे यह काम करना चाहिए। वह चाहते थे कि मैं डिजाइन करूं और उसे बाहर से फैब्रिकेट करूं। इस इंडस्ट्री में प्रोफेशनलिज्म नहीं है। हम कारीगरों के पास जाते थे। कभी मटीरियल सही नहीं मिलता तो कभी समय पर नहीं मिलता। कभी वे पैसे ज्य़ादा मांगते थे। डिजाइंस कॉपी होना भी समस्या है। हम स्टैंडर्ड प्रोडक्शन चाहते थे लेकिन हमने जो सोचा था और जो मिल रहा था, उसमें काफी अंतर था। तब मुझे लगा कि काम आगे बढाना है तो अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट सेटअप करनी होगी। रतन इसके लिए तैयार नहीं थे कि फैक्टरी को कौन संभालेगा? जमीन, पैसा, मशीनरी... सब चाहिए। ...फिर उन्हें कैसे मनाया? शायद वह सोचते थे कि इस बिजनेस में आगे संभावनाएं हैं। रतन डिजाइनिंग की समझ रखते हैं। मैं जो कर रही थी, उस पर भी उन्हें भरोसा था, शायद इसीलिए वह तैयार हुए। तो शुरू में आप उनसे सलाह लेती थीं? इन्वेस्टमेंट तो उन्होंने ही किया और सलाह भी दी...आलोचना के रूप में, क्योंकि वह मेरे सबसे बडे क्रिटिक हैं। उनके पास इतना समय नहीं था कि वह मेरे बिजनेस को वक्त दे पाते। दो साल तो मुझे समझने में ही लग गए। किसी भी इंडस्ट्री को जमने में थोडा समय लगता है...। बहुत समय देना पडता है। उन स्थितियों में भी आपका आत्मविश्वास बना रहा कि आप कर सकती हैं...? हां, मेरे लिए यह आइडिया तो बहुत मजबूत था लेकिन मार्केट धीमा था, लोगों को समझ नहीं आता था। स्टेनलेस स्टील के प्रोडक्ट पांच रुपये के तो होते नहीं, थोडे महंगे होते हैं। बहुत कम लोग डिजाइनिंग की तरफ जाते हैं। वे क्रॉकरी या सिरैमिक की तरफ जाते हैं। वे सोचते हैं कि पता नहीं क्या है...महंगा है....लें या नहीं। हम डिजाइनिंग ओरिएंटेड कंपनी थे, हाई स्ट्रीट रिटेल कंपनी थे, ऐसे में हमें बहुत सचेत रहने की जरूरत थी। नॉलेज, इन्फॉर्मेशन, जगह की कमी, महंगा किराया..., शुरुआत में नुकसान उठाना पडा। हमारी हर चीज इनहाउस डिजाइन होती है, कुछ भी बाहर से कॉपी नहीं होता। हमें प्रोडक्शन के स्तर पर भी बहुत सीखना था। मुझे सीनियर मैनेजमेंट पर बहुत कुछ बदलना पडा...। आजकल स्थितियां बदल गई हैं। लोग ओपन हैं। हमारा फोकस भारतीय कंज्य़ूमर्स हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्टेनलेस स्टील काफी पॉपुलर है लेकिन हमें भारत में भी इसे बढाना है...। कभी किसी जेंडर इश्यू से जूझना पडा...? नहीं। मैं ओपन हूं, हिसाब-किताब लगाकर नहीं बोलती। बिजनेस मेरे लिए हमेशा से एक पैशन था और मैं जानती थी कि मैं इसे कर सकती हूं। मुझे स्त्री होने से नहीं, नॉलेज कम होने से परेशानी हुई। लोगों से कनेक्ट करने में प्रॉब्लम नहीं होती थी। वे मुझे बिजनेसवुमन की तरह नहीं, मिसेज जिंदल की तरह देखते थे। शायद मेरा बैकग्राउंड भी रहा कि मुझे किसी समस्या का सामना नहीं करना पडा। लेकिन खास बैकग्राउंड से आने के कारण आपसे अपेक्षाएं भी ज्य़ादा रही होंगी...? हां, मुझे लगता है कि एक खास बैकग्राउंड से आने के कारण लोगों की ही नहीं, खुद से भी आपकी अपेक्षाएं बढ जाती हैं। अगर आप एक सक्सेसफुल बिजनेस फैमिली से आते हैं तो आपको अपने लिए स्पेस बनाना पडता है। मुझे किसी को साबित नहीं करना था, अपनी खुशी और कंफर्ट के लिए मैं यह कर रही थी। इसलिए बाहरी दबाव से नहीं घबराई। मैं जो कुछ भी क्रिएट कर रही थी, उससे खुश थी। आप अपनी ससुराल हिसार में भी रहीं? अपने ससुर ओ.पी. जिंदल के साथ आपका रिश्ता कैसा था? मैं लंबे समय तक हिसार में नहीं रही। रतन हिसार की फैक्टरी देखते थे तो उनके साथ अकसर जाना होता था। मेरे ससुर मेरे मेंटर की तरह थे। बहू होने के नाते मैं उनसे बहुत बात नहीं करती थी लेकिन मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। वह बहुत अच्छे-सिंपल इंसान थे और मुझे एक यंग लडकी की ही तरह समझातेे थे। उन्हें राजनीति से लेकर हर विषय की जानकारी थी। वह सबकी मदद के लिए तैयार रहते थे चाहे वे इंडस्ट्री के हों, कॉम्पिटीटर हों या कोई और...। हॉस्पिटल्स, स्कूल, चैरिटेबल संस्थाएं....सब साथ-साथ संभाल लेते थे। मेरे भीतर संवेदनशीलता शायद वहीं से आई। परिवार के अलावा बाहर के लोग भी उनका सम्मान करते थे। आपकी सास भी सफल स्त्री रही हैं। जब दो पीढी के लोग समान रूप से सफल होते हैं तो किसी तरह का अहं टकराव होता है? नहीं। मुझे लगता है कि सौभाग्य से हम सभी लोग अलग-अलग काम कर रहे हैं। कोई भी दूसरे से प्रतिस्पर्धा में नहीं है। हम एक-दूसरे की सीमाओं का सम्मान करते हैं, दूसरे के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करते। हम जॉइंट फैमिली में हैं। जब जरूरत होती है, तब साथ होते हैं। इससे कोई टकराव नहीं होता। आप बिजनेस में आ रही थीं तो बच्चों की जिम्मेदारियां भी थीं। कभी ऐसा लगा कि बच्चों को समय नहीं दे पा रही हैं...? नहीं। मैं काम जरूर कर रही थी लेकिन किसी दौड में शामिल नहीं थी। मेरी मां इस मामले में बहुत सख्त थीं, मैं ऐसी नहीं हूं। मेरे बच्चों ने वही किया, जो वे करना चाहते थे। मुझे लगता है, हम सभी अपने ढंग से सीखते हैं। हमने बच्चों पर दबाव नहीं डाला, इसलिए मुझे कभी रिग्रेट नहीं हुआ। मैंने खुद अपनी पहचान बनाई और मुझे लगता है कि बच्चे भी अपनी पहचान खुद बनाएंगे। मैं दिन के पहले हिस्से में काम करती थी और दूसरे हिस्से में परिवार के साथ होती थी। काम मेरी आइडेंटिटी जरूर था लेकिन इसके लिए मैं परिवार को नहीं छोड सकती। मैंने संतुलन बना कर रखा। परिवार मेरी प्राथमिकता रहा। मैंने न कभी काम को प्रभावित होने दिया, न परिवार को। मुझे पता है कि कहां मेरी ज्य़ादा जरूरत है और इस मामले में मैं शुरू से स्पष्ट रही। मुझे लगता है कि लोगों पर निर्भरता भी अच्छी होती है। वे आपकी व्यस्तता देखते हैं तो हर जगह आपके होने की अपेक्षा नहीं करते। इससे काफी आसानी हो जाती है। कई स्त्रियों में योग्यता होती है लेकिन सही गाइडेंस नहीं होती। उन्हें क्या सलाह देंगी? आजकल प्लैटफॉर्म बहुत हैं लेकिन सही होमवर्क करने की जरूरत है। अब इतने मीडियम्स हैं कि स्टोर खोलने की जरूरत नहीं है, ऑनलाइन सेलिंग से भी अच्छा कर सकते हैं। स्टार्टअप्स कंपनीज बढ गई हैं, मौके हैं, लोन मिल रहे हैं लेकिन पहले खुद ढंग से सोचना होगा। यह भी कि कब बिजनेस को छोडऩा है। कोशिश करें लेकिन जब लगे कि संभावनाएं नहीं हैं तो उसे छोडऩे को तैयार रहें। एक बार भावनात्मक रूप से जुड जाएंगे तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। आपने अभी कहा कि आपके फील्ड में डिजाइंस का कॉपी होना भी बडी चुनौती है। ऐसी स्थिति का सामना कैसे करती हैं? अब हम ऐसे डिजाइंस बनाने में सफल हो गए हैं जिनका अपना स्टैंडर्ड है, जिन्हें कॉपी नहीं किया जा सकता। हमारे डिजाइंस यूनीक हैं, हम अपना स्टैंडर्ड अपने हिसाब से बनाते हैं। आपने कहा कि 19 की उम्र में आपकी शादी हो गई थी, पढाई बीच में छूट गई.... हां, मुझे पढऩा बहुत पसंद था। शादी के बाद भी दो स्कूल्स संभालने को मिले। विद्या देवी जिंदल स्कूल और ओ.पी. जिंदल मॉडर्न स्कूल। बचपन में मेरा सपना था कि टीचर बनूं। शादी के बाद भी मैं पढाई जारी रखना चाहती थी, लेकिन कुछ पारिवारिक समस्याओं के कारण ऐसा नहीं हो पाया। कभी ऐसा भी लगा कि खुद को समय नहीं दे पा रही हैं? आर्ट डि नॉक्स के साथ एक तरह से मेरी आध्यात्मिक और आंतरिक यात्रा शुरू हुई। मैं इसमें जिंदगी के मायने खोजती थी। मेरी जिंदगी में स्पष्टता का बहुत महत्व रहा है। मुझे रिग्रेट नहीं हुआ... लेकिन हां, जब मैंने काम शुरू किया, मुझे नॉलेज नहीं थी। आज स्टार्टअप्स हैं, ढेरों सूचनाएं हैं। मेरे समय में यह सब होता तो शायद बेहतर कर पाती। मेरे पास एक्सपीरिएंस नहीं था। जैसे किसी बच्चे को कोई अच्छी चीज खाने को मिलती है और वह सोचता है-अभी खा लो वर्ना फिर नहीं मिलेगी..., मेरी स्थिति उसी बच्चे की तरह थी कि अभी करने को मिल रहा है-कर लो। इसीलिए मैं सबसे कहती हूं कि कुछ भी करने से पहले होमवर्क करो थोडा स्टडी करो...। लेकिन जो गलतियां हम शुरू में करते हैं, उनसे कहीं न कहीं संतुष्टि मिलती है कि हमने सब कुछ अपने बल पर किया...। हां बिलकुल, लेकिन यह भी लगता है कि थोडी समझदारी दिखाई होती तो बेहतर होता। मैं अपने प्रोडक्ट्स को एक कंज्य़ूमर की नजर से देखती हूं क्योंकि मैं भी कंज्य़ूमर हूं। मैं सोचती हूं कि मेरे प्रोडक्ट देख कर कंज्य़ूमर कैसे सोचेगा, वह इसे खरीदेगा या नहीं...। कंज्य़ूमर्स की शिकायतों को कैसे लेती हैं? कंज्य़ूमर्स का फीडबैक बहुत महत्वपूर्ण है। हमने स्टील ही क्यों चुना? इसलिए कि यह हाइजीनिक, हेल्दी, व्यावहारिक और टिकाऊ है। इसके बहुत फायदे हैं। लुक्स या ब्यूटी ही उतना महत्वपूर्ण नहीं है, भारतीय घरों में इसका अपना अलग महत्व है। हमारे कॉलम का नाम है मैं हूं मेरी पहचान। क्या आप महसूस करती हैं कि अपनी पहचान बनाना जरूरी है? बिलकुल। मुझे लगता है कि मेरा काम ही मेरी पहचान है, यह मेरा सबसे बडा खजाना है। मैं आज अपना जितना सम्मान करती हूं, उतना पहले कभी नहीं किया। पैसे के लिए नहीं, बल्कि अपनी पहचान के लिए हर स्त्री को काम करना चाहिए। कुछ भी ऐसा करना चाहिए, जो उसे आत्मसंतुष्टि दे, उसे व्यस्त रखे। बिजी रहने का मतलब यह नहीं है कि परिवार को नजरअंदाज करें। आर्ट डि नॉक्स के पैशन ने न सिर्फ अपने प्रति मेरा नजरिया बदला, बल्कि इसने दुनिया को देखने का मेरा नजरिया भी बदल दिया। 1. आपका सबसे बडा डर? जिंदगी में ऐसा कोई काम न करूं जिससे बाद में पछतावा हो। 2. किस चीज को लेकर अंधविश्वासी हैं ? शेखी न बघारें, अगर बडी-बडी डींगे हांकते हैं तो आपको मुंह की खानी पड सकती है। 3. आपके लिए खुशी... आसपास के सभी लोगों को खुश और कंफर्टेबल देखना चाहती हूं। 4. काश मैं यह कर पाती... हर तरह की स्थिति में खुद के प्रति ज्य़ादा कंफर्टेबल रह पाती.... 5. जीवन है... सीखते रहने का नाम... 6. शादी एक-दूसरे को समझना। 7. ईश्वर हर चीज में भगवान है। 8. मुझे गर्व है स्त्री होने पर....।