अतीत को भूलने और वर्तमान में जीने की शिक्षा बचपन से दी जाती है लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है। कई बार भूत वर्तमान को डराता है, असुरक्षा और बेचैनी पैदा करता है। ऐसे में दिमाग की हार्ड डिस्क से सभी गैरजरूरी फाइल्स को डिलीट करने की जरूरत पडती है।

बीती यादें, गहरे घाव, आहत कर देने वाली कोई घटना या अन्याय....दिमाग की मेमोरी में न जाने कितनी ऐसी फाइल्स भरी रहती हैं, जिन्हें जल्दी रीसाइकिल बिन में न डाला जाए तो वायरस अटैक हो सकता है और दिमाग के हार्डवेयर में एरर आ सकता है। जिस तरह लैपटॉप या कंप्यूटर में कोई भी गैरजरूरी फाइल्स या प्रोग्राम्स इसलिए डिलीट करने की जरूरत पडती है क्योंकि ये काफी स्पेस लेते हैं और इनसे सिस्टम स्लो होता है, उसी तरह मन से भी पुरानी यादों को बाहर करना जरूरी होता है। कई बार सिस्टम को रीबूट भी करना पडता है और ऐसा खुद न कर पाने की स्थिति में एक्सपर्ट की मदद लेनी पडती है।

रिश्तों के वर्तमान को अतीत की जो बातें सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं, वे हैं, विवाह पूर्व प्रेम या सेक्स संबंध, शारीरिक शोषण, ब्रेकअप, विवाहेतर संबंध, तलाक, प्रियजन की मौत आदि। ये स्थितियां कई बार इतनी हावी हो जाती हैं कि व्यक्ति एक ही जगह खडा रह जाता है, आगे बढ ही नहीं पाता।

इमोशनल ड्राइवर्स मनोविज्ञान में माना जाता है कि मन के तीन ताकतवर इमोशनल ड्राइवर्स हैं- प्यार, डर और गुस्सा। इनमें क्रोध के उफान को समझना आसान हो सकता है मगर इससे उबरना कठिन होता है। मन की इस दुनिया में प्यार की भी बडी भूमिका होती है। प्यार हो या न हो, इसे समझने, भूलने या इससे उबरने में काफी समय लगता है। ब्रेकअप, तलाक या मृत्यु जैसी घटनाएं दिलो-दिमाग पर लंबे समय तक छाई रहती हैं। इन्हें भुलाने का अर्थ है- उस अटैचमेंट या जुडाव को खो देना और उस याद को दिल से निकाल देना। जाहिर है, इस प्रक्रिया में काफी वक्त लगता है।

भावनाओं का टकराव हिंदी की एक कविता कहती है, 'लो अतीत से उतना ही, जितना पोषक है...। जीवन में नई संभावनाएं तब तक जन्म नहीं ले सकतीं, जब तक पुराने लगावों या यादों को खत्म न किया जाए। इसके बरक्स एक समस्या यह भी है कि जीवन से जैसे ही कोई रिश्ता खत्म होता है, एक अजीब शून्य या खालीपन पैदा होने लगता है। धीरे-धीरे इस खालीपन में भय अपनी जडें फैलाने लगता है। नए रास्ते पर चलने का भय, कोई अनजाना-अनदेखा भय, विफल होने, खो देने, निराशा या हताशा मिलने जैसे कई भय मन को जकड लेते हैं। कुछ पुराना छूटता है तो नए को पकडऩे में ये तमाम भय बाधा डालते हैं। भविष्य में भी कहीं ऐसा न हो...यह सोच दर्द को बढा देती है। दूसरी ओर मन का कोई हिस्सा कहता है, जाने दो, जो होगा देखा जाएगा, अतीत को भुला दो...।

ऐसे अदृश्य से विचार इमोशनल बैरियर्स से टकराते हैं। जितनी बार ये वाक्य खुद से बोले जाते हैं, उतनी ही बार विचारों में ब्रेक लगता है, डर लगता है कि जिस संबंध को इतना लंबा जिया है, उसे कैसे भुला दें? जागरूक रहते हुए इन विचारों के खिलाफ लडऩा पडता है। अतार्किक, काल्पनिक और अनुपयोगी विचारधारा से तब तक नहीं लडा जा सकता, जब तक कि अपने दिमाग को जागरूक न किया जाए। अपने डर से लडऩा और अपने भीतर चुनौतियों का मुकाबला करने का साहस पैदा करना अतीत के उस गहरे रिश्ते या अटैचमेंट से बाहर निकलने के लिए एक रास्ता देता है। ऐसे निकलें अतीत से आगे बढऩे के लिए सही दिशा में सकारात्मक कदम उठाने जरूरी हैं।

- खुद के लिए प्रेरणा पैदा करें जब तक आने वाले कल की सकारात्मक कल्पना मन में नहीं होगी, बीते कल को नहीं भुलाया जा सकता। भविष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण जरूरी है। अगर मानसिक तौर पर परेशान हैं तो शरीर को बेहतर बनाने की कोशिश करें। इसके लिए ट्रेनर, इंस्ट्रक्टर, योग या आध्यात्मिक गुरु की मदद भी ले सकते हैं। शारीरिक रूप से फिट रहेंगे तो मन की दुनिया भी बदलेगी। करियर या हॉबीज को बदल कर देखें, लक्ष्य बदलें, नए दोस्त बनाएं, रिश्तेदारों से घुलें-मिलें, अपने घर को सजाएं या कोई नई वस्तु खरीदें। कुछ भी ऐसा करें, जिससे अपने प्रति अच्छा महसूस हो।

- सख्ती बरतें नए रिश्ते में सहज होने के लिए पुराने रिश्ते को भूलना जरूरी होता है। इसमें चूक होने पर समस्याएं खडी हो सकती हैं, इसलिए अपने प्रति थोडी सख्ती बरतनी जरूरी है। ब्रेकअप या शादी टूटने के बाद उससे जुडी वस्तुओं के प्रति लगाव बना रहेगा तो अतीत को भूलना मुश्किल होगा। नए पार्टनर के साथ नए रिश्ते में जा रहे हों तो उसे अपने अतीत की झलक न दिखाएं। पुराने रिश्ते से जुडी चीजों से अधिक मोह न करें। उन्हें डोनेट करें, बांट दें या नष्ट कर दें....जो भी कर सकते हैं, करें और इसके लिए तैयार रहें कि ऐसा करने पर आपको दुख, नॉस्टैल्जिया, पछतावा, बेचैनी जैसे कई मिले-जुले भावों का सामना करना पड सकता है।

- मरम्मत रिश्तों की कई अपराध-बोध भी दिल पर बोझ बने रहते हैं। कुछ गलतियों पर पछतावा भी होता है। पार्टनर से कुछ छिपाया हो, झूठ बोला हो, उसकी शिकायत की हो, उसका सहयोग न किया हो, उसे आहत किया हो या दुख दिया हो.... ऐसी कई पीडाएं गले में फांस बनी रहती हैं। ऐसे में रिश्तों को रिपेयर करना पडता है। बताना हो जाता है ताकि गिल्ट से उबर सकें, हालांकि इससे रिश्ते सुधर जाएंगे, इसकी गारंटी नहीं की जा सकती क्योंकि रिश्तों को कई अन्य बातें भी प्रभावित करती हैं। तैयार रहें कि आपकी आत्म-स्वीकृति के बाद पार्टनर पलटवार कर सकता है लेकिन बोलने से आपके मन का बोझ कम होगा।

- कहानी दोबारा लिखें जिंदगी एक रोमांचक और दिलचस्प कहानी है। घटनाएं या स्थितियां किसी को पीडित तो किसी को परपीडक बना देती हैं। खुद को सजा देने से बचना चाहते हैं तो कहानी में बदलाव करें। जिन स्थितियों में आप हीरो या विलेन बने, उनका आकलन करें। कई बार संतुलित, परिपक्व व संवेदनशील नजरिया घटनाओं व स्थितियों को देखने की नई दृष्टि प्रदान करता है। इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। निहारिका ऐसे रिश्ते में थीं, जिनका भविष्य उन्हें नहीं मालूम था लेकिन वह भावनात्मक रूप से रिश्ते पर निर्भर थीं। वह उसे इतना बचाना चाहती थीं कि जीवन में बाकी चीजों उनके लिए गौण हो चुकी थीं। फिर एक दिन रिश्ता टूट गया और वह लंबे समय तक बीमार पड गईं। काउंसलर की मदद से लगभग एक वर्ष बाद सामान्य जीवन में लौटीं। धीरे-धीरे उन्होंने पार्टनर को माफ करना सीखा और जीवन के प्रति अलग नजरिया अपनाया। अगले दो-तीन साल उनकी सफलता के नाम थे। वह बेहतरीन प्रोफेशनल के तौर पर उभरीं। कुछ साल बाद उन्होंने शादी भी की और आज एक सुखद दांपत्य जीवन में हैं।

- माफ करना सीखें कहानी को दोबारा लिख पाने का साहस कम लोगों में होता है और ये वे लोग हैं, जो माफ करना जानते हैं। जिसने हर्ट किया, गलत किया या अन्याय किया, भला उसे कैसे माफ किया जा सकता है? मन में पहला सवाल यही आता है। माफ करने के लिए बहुत कुछ छोडऩा पडता है। मन को समझाना पडता है कि क्रोध को छोडऩे और माफ करने से बडे नुकसान से बचा जा सकता है। माफ करना एक निर्णय है। जो भी गलत हुआ, भले ही इसके लिए दूसरा जिम्मेदार था मगर क्रोध या बदला लेने की भावना के साथ जीवन में आगे नहीं बढा जा सकता। दृढ इच्छाशक्ति के बलबूते निर्णय लें। सामने वाले को भी अपने निर्णय की जानकारी मिलने दें। माफ करें और माफी मांगें, फिर भले ही इसका नतीजा कुछ भी हो।

- वर्तमान में रहें अतीत को भूलना और वर्तमान में जीना एक अभ्यास है, जिसकी कोई प्रामाणिक टेकनीक नहीं है। दुर्भाग्य से हम ऐसे समय में हैं, जहां अतीत या भविष्य का भय हमेशा वर्तमान को प्रभावित करता है। वर्तमान में रहने की कला निरंतर सजग रहने से आती है। हर क्षण को जीना, वर्तमान पर केंद्रित रहना ऐसी स्किल है, जो हर दबाव को दूर करती है।