किसी भी रिश्ते में कटुता आने पर हम इसके लिए दूसरों को दोषी मानने लगते हैं, लेकिन इससे पहले यह बहुत जरूरी है कि हम अपने अंतर्मन में झांकें, उसे समझें और खुद से प्यार करना सीखें। इससे हमारे जीवन में खुशियों के फूल खिल उठेंगे।

अपने रिश्तों को सुंदर बनाने के लिए सबसे जरूरी यह है कि पहले हम स्वयं से रिश्ता जोडें। ब तक हम ऐसा नहीं करेंगे, स्वयं से प्यार नहीं कर पाएंगे। इस शुरुआत के बिना दूसरों के साथ अच्छे संबंध रखना मुश्किल है।

करें सकारात्मक चिंतन

हम दूसरों के लिए बडी आसानी से कह देते हैं कि हमें उनका व्यवहार समझ नहीं आता, पर इससे पहले हमें यह सोचना चाहिए कि क्या हमें अपना व्यवहार समझ आता है? अगर हम स्वयं को ही नहीं समझते तो हमें दूसरे को भी समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हम दूसरों के लिए अकसर यह कहते हैं कि वो बिना बात के गुस्सा करते हैं। क्या हम जानते हैं कि हमें गुस्सा क्यों आता है? क्रोध की अवस्था में हमारे मन के भीतर क्या चल रहा होता है? जब हम इस बात को समझ जाएंगे तो हमें दूसरों के गुस्से का कारण भी आसानी से समझ आ जाएगा। दूसरों को समझने से पहले हमें स्वयं को जानना और समझना बहुत जरूरी है। यह तभी संभव है, जब हम नियमित रूप से अपने लिए भी समय निकालें। हम रोजाना खुद को कितना समय देते हैं? हम कहते हैं, हमारे पास समय ही नहीं है। हमारे जीवन में जो लोग महत्वपूर्ण होते हैं, उनको हम अपना समय अवश्य देते हैं। जिनको हम समय नहीं देते और बार-बार कहते रहते हैं कि हमारे पास आपके लिए समय नहीं है, उनके साथ हमारे रिश्तों में खटास आ जाती है। अपने मन के साथ रिश्ते के मामले में भी हमारा यही हाल होता है, जब हम खुद को ही अहमियत नहीं देंगे तो अपने मन को कैसे समझ पाएंगे? मन के साथ संबंध जोडऩे के लिए स्वयं को समय देना भी बहुत जरूरी है और जब हम ऐसा करेंगे तो धीरे-धीरे हम अपने से संबंध जोड पाएंगे और समझ पाएंगे कि हमारा मन ऐसे क्यों सोचता है? यह अति आवश्यक है कि हम रोजाना अपने मन को सकारात्मक चिंतन की खुराक दें।

खुद से करें बातें

सुनने में यह बहुत आसान लगता है पर इसके लिए बहुत अभ्यास और एकाग्रता की जरूरत होती है। इसके लिए क्रमबद्ध ढंग से यह अभ्यास दुहराएं:

1. सबसे पहले अपने मन को शांत कर लें और यह विचार लाएं कि मैं एक पवित्र और शक्तिशाली आत्मा हंू। मैं जो चाहूं वो सोच सकता/सकती हूं।

2. अपने मन पर मेरा पूरा अधिकार है। यह मेरा कहना मानता है क्योंकि यह मेरा है। मैं जहां चाहूं, जितनी देर के लिए चाहूं, इसे एकाग्र कर सकता/सकती हूं।

3. यह मेरी अपनी शक्ति है। क्रमबद्ध ढंग से ऐसा सोचने के साथ ही पूरे दिन में कम से कम एक बार अपने मन को देखें कि अभी उसमें क्या चल रहा है? जैसे हम बच्चे को दिन में बार-बार चेक करते हैं कि वह अभी क्या कर रहा है? हम कमरे में जाकर एक कोने में खडे होकर सिर्फ बच्चे को देखना शुरू कर दें तो यदि वह कोई शरारत कर रहा होता है तो तुरंत संभल जाता है क्योंकि उसे ऐसा लगता है कि कोई मुझे देख रहा है। इसी तरह बीच-बीच में रुक कर मन को देखना चाहिए। यह कोई कठिन कार्य नहीं है। हमारे मन में विचार चल रहे हैं, उन्हें देखें, हम क्या सोच रहे हैं, सचेत ढंग से उस पर अपना ध्यान ले जाएं ।

सवेरे उठने के साथ ही अपने मन को देखना शुरू कर दें। मन को देखना अर्थात विचारों को देखना। जैसे हम लोगों से पूछते हैं कि आजकल क्या चल रहा है? ऐसे हम अपने ही मन से भी पूछें कि क्या विचार चल रहा है? जब हम ध्यान नहीं देते तो कई बार हमें पता ही नहीं होता और कोई गलत विचार निरंतर हमारे भीतर सक्रिय रहता है। फिर हम ऐसे ही विचारों के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं, पर जैसे ही हम देखते हैं कि हमारे भीतर क्या चल रहा है? तब हमें ध्यान आता है कि यह गलत है। फिर किसी शरारती बच्चे की तरह यह गलत विचार भी वहीं सुधर जाता है।

भूल जाएं, आगे बढें

मान लीजिए, किसी परिवार में छोटी सी बात पर सुबह नाश्ते के वक्त पति-पत्नी के बीच थोडी बहस हो गई। पति तो ऑफिस जाते ही कार्य में व्यस्त हो गया और वह भूल गया कि क्या हुआ था, लेकिन पत्नी जो कि घर पर थी, उसके मन में निरंतर यह विचार चलने लगता है कि उन्होंने मुझसे ऐसा क्यों कहा? मैंने इतनी मेहनत से सुबह उठकर नाश्ता बनाया, फिर भी मुझे डांट दिया। उन्हें ऐसे नहीं बोलना चाहिए था। ऐसा सोचने वाला कोई भी इंसान अगर बीच में रुक कर अपने मन को दोबारा न टटोले तो यह नकारात्मक विचार पूरे दिन उसे परेशान करेगा। इससे पति-पत्नी के बीच मतभेद और बढ जाएगा। शाम को जब पति घर वापस आएगा तो पत्नी उससे सीधे मुंह बात नहीं करेगी क्योंकि उसके मन में पूरे दिन नकारात्मक विचारों का जो प्रवाह चलता रहा, वह उसे पति के साथ सहज नहीं होने देगा। पति जो कि सुबह की बातें भूल चुका था, वह समझ नहीं पाता कि पत्नी उसके साथ ऐसा बर्ताव क्यों कर रही है? पति ने सुबह जो भी भला-बुरा कहा था, वह सिर्फ एक बार कहा था, लेकिन पत्नी दिन भर में हजारों बार अपने मन में वही नकारात्मक बातें दोहराती रही। नतीजतन मामूली सी बात राई का पहाड बन गई। अगर ध्यानपूर्वक विचार किया जाए तो इस पूरे मामले में गलती किसकी है? उस पति की, जिसने सिर्फ एक बार कुछ कहा या पत्नी की,जिसने स्वयं को दिन भर में हजारों बार कोसा? अगर हम इस बात के मर्म को आसानी से समझ जाएंगे तो संबंधों के मामले में मधुरता की नींव तक पहुंच पाएंगे। इसलिए जब हमें यह महसूस हो कि मन बहुत तेजी से चल रहा है तो रुक कर उसे देखें और ब्रेक लगा दें। नहीं तो हमारे रिश्तों में कटुता बढने लगेगी। अकसर हम मन को रोकते नहीं हैं क्योंकि हम यह सोचते हैं कि सामने वाला व्यक्ति गलत था। इसलिए हमारा सोचना सही है और हम अपने मन में आने वाले ऐसे नकारात्मक विचारों को रोक नहीं पाते।

दूसरों को नहीं खुद को बदलें

अगर और गहराई से सोचें तो पता चलेगा कि आसपास के माहौल या लोगों को बदल पाना हमारे बस में नहीं है लेकिन मन तो अपना है, जिसे हम यह समझा सकते हैं कि अभी हमें शांत रहना चाहिए। सबसे बडी दिक्कत यही है कि आज के जमाने में हम दूसरों को परिवर्तित करने का ही प्रयास करते हैं लेकिन पल भर के लिए भी रुक कर यह नहीं सोचते कि हमें अपने मन को नियंत्रित करना चाहिए। दूसरों से बदलाव की उम्मीद रखना कुछ ऐसा ही है जैसे, अगर पडोसी के बच्चों से हमारे बच्चे की लडाई हो जाए और हम उससे जाकर यह कहें कि मेरा बेटा मेरा कहना नहीं मानता, आप ही अपने बच्चे को समझा लें। सोचिए क्या ऐसा संभव है? जब हम स्वयं ही अपने मन पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे तो दूसरों से ऐसी आशा कैसे रख सकते हैं? हम अकसर यह सोचते हैं कि उस मुश्किल हालात में हमारा गुस्सा स्वाभाविक था। जब भी हम ऐसा कहते हैं तो वास्तव में अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे होते हैं। हम इस सत्य को सिरे से नकार देते हैं कि हम जिस खुशी या दुख का अनुभव कर रहे हैं, उसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। किसी मुश्किल में विचलित होना या शांत रहना, ये दोनों ही विकल्प हमारे सामने मौजूद होते हैं। अपने ही अपनों का कहना मानते हैं। इसलिए दूसरे से शांत रहने के लिए कहने से बेहतर यही होगा कि हम अपने मन को नियंत्रित रखें। हमें शांतिपूर्वक अपने अंतर्मन में झांककर यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि मेरे ऐसे नकारात्मक व्यवहार की वजह क्या है और इसे कैसे सुधारा जाए? जब हमारे मन के अंदर स्थिरता, सुख और शांति की अनुभूति होगी तो हमारा बाहरी व्यवहार भी उसी के अनुकूल शालीन और सौम्य होगा। जब हमारा मन शांत होगा तो स्वाभाविक रूप से हमारे संबंधों में भी मधुरता और समरसता आएगी। हमने हमेशा यही सोचा है कि यदि हमारे संबंध अच्छे होंगे तो हमें खुश्ी मिलेगी, पर सत्य यह है कि जब हम अंदर से खुश होते हैं तो हमारे संबंध भी सभी के साथ स्वाभाविक रूप से अच्छे होते हैं। ज्ञान को सिर्फ पढने-लिखने तक सीमित न रखकर हमें अपने जीवन की प्रयोगशाला में इसका इस्तेमाल करना चाहिए। अपने मन की आंतरिक प्रणाली को समझकर उसे शांति और खुशी की स्थिति में रखने के लिए कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर की तरह उसे भी प्रोग्रामिंग की जरूरत होती है। यही हमारे जीवन में सुखी एवं समरस संबंधों का आधार है।

बी.के.शिवानी

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