अति व्यस्त जीवनशैली में शारीरिक-मानसिक थकान स्वाभाविक है। इससे बचने में ध्यान बहुत मददगार होता है। विपश्यना इसकी एक ऐसी ही प्रमुख क्रिया है, जो तन-मन को सुकून पहुंचाती है। यह आपके लिए कैसे उपयोगी साबित होगी, बता रहे हैं स्वामी चैतन्य कीर्ति।

अगर हम अपने भीतर छिपी नकारात्मक बातों को बाहर निकालना चाहते हैं तो सबसे जरूरी यह है कि हम अपनी खामियों को पहचान कर उन्हें बाहर निकालने की कोशिश करें। अब सवाल यह उठता है कि इसका सही तरीका क्या हो? इसके लिए प्राचीनकाल से ही योगियों द्वारा विपश्यना की विधि अपनाई जाती रही है। यह ध्यान साधना की ऐसी पुरातन विधि है, जिसके माध्यम से ही आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि संभव है।

कैसे हुई उत्पत्ति दरअसल विपश्यना शब्द का अर्थ है- देखना, लौटकर देखना। ध्यान की प्राचीन क्रिया की जडें बौद्ध दर्शन में छिपी हैं। बुद्ध भी लोगों से यही आग्रह करते थे, आओ और देखो। वह लोगों से किसी भी धारणा को अपनाने का आग्रह नहीं करते थे। बुद्ध के मार्ग पर चलने के लिए ईश्वर को मानना न मानना, आत्मा को मानना न मानना आवश्यक नहीं है। बौद्ध धर्म में किसी भी मान्यता, पूर्वाग्रह, विश्वास इत्यादि की कोई भी आवश्यकता नहीं है। यह पूरी तरह वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। महात्मा बुद्ध भी यही कहते हैं, सिर्फ आओ और देख लो, मानने की जरूरत नहीं है। पहले देखो और समझो, अगर सहमत हो तो फिर मान लेना। दरअसल उनका दर्शन इतना सरल और सच्चा है कि उसे देखने के बाद हर व्यक्ति स्वेच्छा से उसे मानने को तैयार हो जाता है। अपने अंतर्मन को देखने और समझने के लिए महात्मा बुद्ध जो प्रक्रिया अपनाते थे, उसी का नाम है- विपश्यना।

प्रक्रिया को समझें विपश्यना बडा सीधा-सरल प्रयोग है। अपने आते-जाते श्वास के प्रति साक्षी भाव रखना ही इसका मूलमंत्र है। इसमें श्वास को इतनी ज्य़ादा अहमियत इसीलिए दी जाती है क्योंकि यही हमारा जीवन है। सरल शब्दों में कहा जाए तो श्वास एक ऐसा पुल है, जिसके इस पार देह है और उस पार चैतन्य है। इसके माध्यम से ही हमारे शरीर और मन का जुडाव परमात्मा से होता है। बुद्ध का कहना है कि यदि तुम श्वास को ठीक से देखते हो तो निश्चित रूप से इस नश्वर शरीर से परे रहकर तुम अपने आप को यानी अपनी अंतरात्मा को भी जान पाओगे। श्वास को देखने के लिए जरूरी हो जाएगा कि तुम अपनी आत्मचेतना में स्थिर हो जाओ। बुद्ध यह नहीं कहते कि तुम आत्मा को मानो लेकिन श्वास को देखने का और कोई उपाय ही नहीं है। जो श्वास को देखेगा, वह इससे भिन्न हो जाएगा और जो श्वास से भिन्न हो गया तो वह शरीर से भी स्वत: परे हो जाएगा। ...क्योंकि शरीर सबसे दूर है, उसके बाद श्वास है और उसके बाद तुम स्वयं अपनी अंतरात्मा के रूप में हो। अगर तुमने श्वास को देखा तो निश्चित रूप से स्वयं को शरीर के बंधन से अलग करके देखना सीख जाओगे। जब व्यक्ति शरीर के मोह से आजाद होता है, तभी उसे शाश्वत का दर्शन होता है। उस दर्शन में ही उडान, ऊंचाई और गहराई है। इसके अलावा संसार में सिर्फ व्यर्थ की आपाधापी है, जिससे इंसान को भौतिक सुख-सुविधाएं भले ही हासिल हो जाएं पर उसे मन की संपूर्ण शांति कभी नहीं मिल पाती।

बहुत कुछ कहता है श्वास श्वास अनेक अर्थों में महत्वपूर्ण है। यह तो आपने भी महसूस किया होगा कि क्रोध और करुणा जैसी अलग-अलग मन:स्थितियों में सांस अलग-अलग ढंग से चलती है। इसी तरह दौडऩे या चलने जैसी शारीरिक क्रियाओं के दौरान भी सांसों की गति तेज और धीमी होती रहती है। श्वास भावों से जुडा है। भाव को बदलो, श्वास बदल जाता है। श्वास को बदल लो तो भाव बदल जाते हैं। कभी कोशिश करके देखें। जब क्रोध आए तो सांस को तेज मत चलने दें, उसे शांत रखें। ऐसा करने पर चाहकर भी आपको गुस्सा नहीं आएगा। अगर आए भी तो पल भर में दूर हो जाएगा। क्रोधित होने के लिए सांसों का तेज चलना जरूरी है। जब श्वास आंदोलित होगा, तभी शरीर के भीतर हलचल और बेचैनी होगी। अगर सांस संयमित रहे तो क्रोध केवल देह पर ही रहेगा और ऐसा क्रोध प्रभावहीन होता है। क्रोध व्यक्ति को तभी नुकसान पहुंचाता है, जब उसकी चेतना आंदोलित होती है।

भाव और सांसों का रिश्ता इसी तथ्य का दूसरा पहलू यह भी है कि भावों को बदलो तो सांसों की लय बदल जाती है। सुबह के शांत प्राकृतिक वातावरण में अगर आप उगते सूरज को देखते हैं तो उस समय आपके मन के भाव बिलकुल शांत होते हैं। उगते सूरज को देखना बेहद सुखद अनुभव होता है। कभी ऐसा करने के तुरंत बाद आप यह भी सोचें कि उस पल आपकी सांसों का क्या हाल था? निश्चित रूप से ऐसी अवस्था में सांसों की गति संगीतमय हो जाती है।

प्राणायाम से अलग है यह लोग प्राणायाम और विपश्यना के फर्क को समझ नहीं पाते। दरअसल इस शब्द का अर्थ है, शांत बैठकर श्वास को बिना बदले, उसे अपने भीतर महसूस करना जबकि प्राणायाम में सांस को बदलने की चेष्टा की जाती है। विपश्यना में ऐसा नहीं है। सांस चाहे बहुत तेज या धीमी जैसी भी चल रही हो, उसे वैसा ही महसूस करें। बुद्ध कहते हैं, चेष्टा करके श्वास को नियंत्रित करना निरर्थक है क्योंकि व्यक्ति की कोशिश उसकी सांस से ज्य़ादा बडी नहीं हो सकती। इसलिए ऐसी कोशिश का कोई फायदा नहीं होगा। इसीलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा है कि तुम श्वास को बदलो। बुद्ध ने प्राणायाम का समर्थन नहीं किया है। उन्होंने तो केवल इतना कहा है, 'तुम थोडी देर बैठ जाओ, सांस तो चल ही रही है; जैसी चल रही है बस बैठकर उसे देखते रहो। जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को देखे, नदी के तट पर बैठ कर नदी की बहती धारा को देखे। तुम क्या करोगे? उसकी छोटी-बडी तरंगों को देखोगे, आते-जाते पशु-पक्षियों को देखोगे। जो भी है, जैसा है, उसको वैसा ही देखते रहो। उसे जरा भी बदलने की इच्छा मत रखो। देखते-देखते सांस और शांत हो जाती है क्योंकि देखने में ही शांति है। पसंद-नापसंद का चुनाव किए बिना चुपचाप देखने में बडी शांति है। जो भी गुजर रहा है, तुम्हारी आंखों के सामने से उसके प्रति अपने मन को बिना आसक्त और उद्विग्न किए, किसी निरपेक्ष दर्शक की तरह देखते रहना ही विपश्यना है। ऐसा करने पर धीरे-धीरे श्वास की तरंगें शांत होने लगेंगी। सांस जब भीतर आती है तो उसके स्पर्श को अपनी नाक के बाहरी हिस्से पर महसूस करें, भीतर जाकर जब वह फेफडे में फैल रही है, तब वहां भी उसे महसूस करने की कोशिश करें। सांस भीतर गई, फेफडों का फैलना अनुभव करें, फिर क्षण भर के लिए रुक कर उस रुके हुए क्षण को भी महसूस करें। इसके बाद सांस बाहर चली गई। इस प्रक्रिया में आपके फेफडे सिकुडते हैं तो उनका सिकुडऩा और नाक से बाहर निकलती हुई सांस को उसके बाहरी हिस्से पर दोबारा महसूस करें। फिर नई सांस आती है। यह पडाव है। श्वास का भीतर आना, क्षण-भर श्वास का भीतर ठहरना, फिर श्वास का बाहर जाना, श्वास का बाहर ठहरना, फिर नई श्वास का आवागमन...। निरंतर चलने वाली इस प्रक्रिया को शांत भाव से देखते रहें। आपको कुछ भी करने की जरूरत नहीं है, बस देखते रहें। विपश्यना का अर्थ यही है।

क्या है फायदा आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि सिर्फ सांसों की गति को महसूस करने से क्या लाभ होगा भला? दरअसल, इसके फायदे आपको धीरे-धीरे महसूस होंगे। इसे नियमित रूप से देखते-देखते ही चित्त के सारे रोग तिरोहित हो जाते हैं। इसके देखते-देखते ही, मैं केवल शरीर नहीं हूं, इस अनुभव का सहज एहसास हो जाता है। इसके बाद, मैं मन नहीं हूं, इसका स्पष्ट अनुभव हो जाता है और अंतिम अनुभव होता है कि मैं श्वास भी नहीं हूं। फिर मैं कौन हूं? फिर इस सवाल का जवाब इस धरती पर कोई भी व्यक्ति नहीं दे पाएगा। यह अनुभव किसी गूंगे व्यक्ति के मन में गुड की तरह होता है। यही है अध्यात्म की ऊंची उडान। अगर कोई व्यक्ति खुद को पहचान भी ले, तब भी वह मौन होकर गुनगुनाएगा, उसका मीठा-मीठा स्वाद लेगा और मस्त होकर नृत्य करेगा पर कुछ भी कह नहीं पाएगा।

बेहद सरल है यह क्रिया विपश्यना के साथ सबसे सुविधाजनक बात यह है कि आप इसे कहीं भी कर सकते हैं। आपके आसपास बैठे लोगों को भी इस बात का भान नहीं होगा कि आप क्या कर रहे हैं? बस-ट्रेन में यात्रा करते समय या अपने घर में बिस्तर पर लेटे हुए आप इसे कहीं भी बडी सुगमता से कर सकते हैं। इससे आपके आसपास के लोगों को भी कोई असुविधा नहीं होगी क्योंकि न तो इसमें किसी मंत्र के उच्चारण की जरूरत है और न बार-बार शारीरिक मुद्रा बदलनी है। यह प्रक्रिया बाहर से देखने में जितनी सरल है, इसमें उतनी ही अधिक गहराई है, जिसे अपनाने के बाद ही महसूस किया जा सकता है। गौतम बुद्ध द्वारा बताई गई साधना की इस क्रिया को एक बार अपने जीवन में उतार कर देखें, निश्चित रूप से आपको अपने भीतर सकारात्मक बदलाव महसूस होगा।