कोरियाई फिल्म 'मोंटाज' पर आधारित 'तीन' कोलकाता की पृष्ठभूमि पर बनी थी। इस फिल्म में रहस्य और रोमांच था। सुजॉय घोष ने इसके पहले कोलकाता की ही पृष्ठभूमि पर 'कहानी' का निर्माण और निर्देशन किया था। 'तीन' के वह निर्माता थे। उन्होंने निर्देशन की जिम्मेदारी युवा फिल्मकार रिभु दासगुप्ता को दी। रिभु दासगुप्ता ने पहली बार किसी फिल्म में अमिताभ बच्चन को निर्देशित किया लेकिन अमिताभ बच्चन और रिभु दासगुप्ता दोनों ही टीवी शो 'युद्ध' का अनुभव साझा करते हैं। इस टीवी शो में रिभु ने अमिताभ बच्चन को निर्देशित किया था। नया डायरेक्टर 'युद्ध' करते समय ही रिभु दासगुप्ता ने अमिताभ बच्चन से उनके साथ फिल्म करने की इच्छा जाहिर की थी। हालांकि 'युद्ध' टीवी शो दर्शकों के बीच पॉपुलर नहीं हो पाया था, लेकिन अनुराग कश्यप के भरोसे के निर्देशक रिभु दासगुप्ता पर अमिताभ बच्चन ने भी भरोसा किया था। उन्हें रिभु के काम करने का तरीका पसंद आया था। दोनों की सहमति थी कि मौका मिलते ही एक फिल्म करेंगे। इधर सुजॉय घोष भी अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म करने के लिए उतावले थे। वह किसी अनोखे विषय की खोज में थे। रिभु दासगुप्ता उनकी मदद कर रहे थे। दोनों ने केरल की पृष्ठभूमि पर एक फिल्म लिखनी शुरू कर दी थी। लिखने के दरम्यान अमिताभ बच्चन से उनकी मुलाकातें होती रहती थीं। ऐसी ही एक मुलाकात में रिभु दासगुप्ता ने उन्हें 'तीन' का आइडिया सुनाया। रिभु बताते हैं, 'अमित जी को यह इतना पसंद आया कि उन्होंने झट से कहा कि पहले 'तीन' करते हैं, बाद में कोई और फिल्म करेंगे।' अमिताभ बच्चन की स्वीकृति मिल जाने के बाद बगैर समय गंवाए रिभु दासगुप्ता ने फटाफट स्क्रिप्ट तैयार की। कोलकाता की पृष्ठभूमि इस फिल्म की पृष्ठभूमि पहले गोवा रखी गई थी और फिल्म के नायक के रूप में गोवा के ईसाई बुजुर्ग थे। अमिताभ बच्चन के हां कहने के बाद उनकी रजामंदी से 'तीन' की कथाभूमि कोलकाता कर दी गई और नायक को कोलकाता का एंग्लो इंडियन कर दिया गया। सुजॉय घोष ने अमिताभ बच्चन से वादा किया कि वह उन्हें कोलकाता के ऐसे इलाकों में ले चलेंगे, जिन्हें उन्होंने कोलकाता प्रवास के आठ सालों में भी नहीं देखा होगा। अमिताभ बच्चन ने इसे सुजॉय घोष का बडबोलापन ही समझा, लेकिन 'तीन' की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन ने महसूस किया कि अपने आठ साल के प्रवास में भी उन्होंने यह कोलकाता नहीं देखा था। फिल्म की थीम के मुताबिक पुराने कोलकाता के स्थिर और मंथर परिवेश को फिल्म में रखा गया है। फिल्म के रोमांचक और ऐक्शन दृश्य में भी कोलकाता की पुरानी इमारतों और दीवारों को दिखाया गया है। कम फिल्मों में शहरों का ऐसा रचनात्मक उपयोग हो पाता है। अमिताभ बने रिभु की चुनौती फिल्म में अमिताभ बच्चन के होने से रिभु दासगुप्ता के लिए निर्देशन की चुनौतियां बढ गई थीं। रिभु कहते हैं, 'अमिताभ बच्चन अनुभवी और सरल अभिनेता हैं। उनकी लगन देखकर मैं दंग रह जाता था। समस्या दूसरी थी कि हर दिन शूटिंग के समय 8000 से ज्य़ादा लोगों की भीड जमा हो जाती थी। फिल्म का अच्छा-खासा हिस्सा आउटडोर में था। अमिताभ बच्चन की फैन फॉलोइंग का जवाब नहीं। वह शूटिंग सूंघ कर आ जाते थे। अमित जी को देखने 6 से 60 साल के प्रशंसक आते थे। फिर भी कोलकाता की अच्छी बात है कि वहां की भीड समझाने पर मान जाती है। वह तंग नहीं करती और न शूटिंग में बाधा डालती है।' रिभु का फिल्मी कनेक्शन रिभु दासगुप्ता का परिवार फिल्मी परिवार है। उनके दादा हरिसाधन दासगुप्ता देश के बडे डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर रहे हैं। उनके पिता राजा दासगुप्ता भी फिल्मकार हैं। यहां तक कि उनके बडे भाई बिरसा दासगुप्ता भी फिल्ममेकर हैं। ये सभी बंगाली भाषा में ही फिल्में करते रहे हैं। रिभु दासगुप्ता ने मुंबई का रुख किया। वहां निर्देशन के गुर सीखे और अनुराग कश्यप के संपर्क में आए। अनुराग कश्यप से बढावा और प्रोत्साहन मिला और धीरे-धीरे वह इस काबिल बन गए कि 'तीन' जैसी फिल्म का निर्देशन किया है। पृष्ठभूमि बदलने की वजह 'तीन' में अमिताभ बच्चन के चुनाव के पीछे क्या 'पीकू' के बंगाली चरित्र के रूप में उनकी स्वीकृति और लोकप्रियता रही? हालांकि, निर्माता या निर्देशक इसे सीधे तौर पर स्वीकार नहीं करते, मगर अनुमान लगाया जा सकता है कि 'पीकू' की सफलता भी एक वजह रही होगी। 'पीकू' की भूमिका के लिए अमिताभ बच्चन को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। 'पीकू' और 'तीन' देखने के बाद बंगाली बुजुर्गों की एक छवि बनती है। ऐसा लगता है कि वे देश के दूसरे इलाकों के बुजुर्गों की तुलना में ज्यादा अलर्ट और जिज्ञासु होते हैं। रिभु दासगुप्ता का जवाब होता है, 'मैं तो यही कहूंगा कि बुजुर्ग होने पर भी बंगाली जिंदगी को एंजॉय करते हैं। मैंने देखा है कि हर बंगाली खेल, राजनीति, फिल्म, भोजन और साहित्य पर घंटों बहस कर सकता है। वे जल्दी से चिढते, रूठते और फिर मान भी जाते हैं। मोबाइल और मल्टीप्लेक्स संस्कृति आने के बावजूद कोलकाता में अड्डेबाजी खत्म नहीं हुई। चाय की चुस्कियों के बीच वे घंटों गप्प कर सकते हैं। ताजा मछली लाने के लिए हाट जा सकते हैं। भाव-तोल कर सकते हैं। 'तीन' के जॉन विश्वास में रिभु दासगुप्ता के वर्णित बंगाली बुजुर्ग को हमने देखा है। इसे उन्होंने बखूबी निभाया भी है। नवाजुद्दीन थे पहली पसंद 'तीन' में अमिताभ बच्चन और नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक साथ दिखे। नवाज की लोकप्रियता के बाद आई इस फिल्म से ऐसा लगा था कि शायद दोनों पहली बार किसी फिल्म में एक साथ काम कर रहे हैं। सच यह है कि यह उनकी दूसरी फिल्म है। स्वयं अमिताभ बच्चन पहली फिल्म का हवाला देते हैं, 'मैंने शुजित सरकार की 'शू बाइट' फिल्म की है। कुछ कारणों से यह फिल्म अभी तक रिलीज नहीं हो सकी है। उस फिल्म में नवाज का पासिंग रोल था। उस छोटे से सीन में ही नवाज ने मुझे प्रभावित किया था। मैंने शुजित से पूछा भी कि इस लडके को कहां से खोज कर लाए हो? 'तीन' में बडी भूमिका में उन्हें देख कर लगा कि वह मंझे हुए कलाकार हैं। उनके अंदर एक साधारणता है। उनके निभाए किरदारों को देख कर एहसास होता है कि उन्हें और कोई निभा ही नहीं सकता था। उनके साथ काम करने का अनुभव ही अलग है। कमाल का अनुशासन नवाजुद्दीन सिद्दीकी अमिताभ बच्चन के बारे में बताते हैं, 'इस उम्र में भी वह ऐक्टिव रहते हैं। उम्र बढऩे के साथ वह डबल एनर्जी के साथ काम करते जा रहे हैं। पता नहीं क्या चीज उन्हें ड्राइव करती है? वह हमेशा पूरी तैयारी में रहते हैं। वह अनुशासित इंसान और ऐक्टर हैं। मैंने देखा कि जब हम रात को कोलकाता में शूट कर रहे थे तो वह शूटिंग से समय मिलते ही फेसबुक और सोशल मीडिया अपडेट कर रहे थे। वह एक साथ कई काम कर लेते हैं।' वह आगे कहते हैं, 'उनका अनुशासन और प्रोफेशनलिज्म कमाल का है। सीन खत्म होते ही हम अपने वैनिटी वैन में चले जाते हैं। वहां सिगरेट पीकर फिर आते हैं। अमित जी तो वहीं पर डटे रहते हैं। सीन भले ही पांच घंटे चले। वह वहीं पर बैठे रहते हैं। मैंने उनसे सीखा कि इन्वॉल्वमेंट में ब्रेक नहीं होना चाहिए। वह लगातार रहना चाहिए। उनके अनुशासन और प्रोफेशनलिज्म का मैं कायल हो चुका हूं।'