हिंदी में बनी अब तक की सबसे ज्य़ादा देखी गई फिल्म है 'बजरंगी भाईजान'। कबीर ख्ाान द्वारा निर्देशित इस फिल्म की कहानी राजनीतिक धरातल पर है, लेकिन इंसानियत का संदेश देती है। फिल्म कैसे बनी, बता रहे हैं अजय ब्रह्मात्मज।

जुलाई महीने में ईद के मौके पर आई कबीर ख्ाान की 'बजरंगी भाईजान दर्शकों को बहुत पसंद आई है। देश में 315 करोड की कमाई कर चुकी इस फिल्म को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक साढे तीन करोड फुटफॉल मिल चुके हैं। इस लिहाज्ा से यह हिंदी में बनी सर्वाधिक देखी गई फिल्म है। विदेशों में भी यह अच्छा कारोबार कर रही है। उम्मीद है कि यह 500 करोड का आंकडा पार कर लेगी।

कबीर ख्ाान निर्देशित 'बजरंगी भाईजान में शीर्ष भूमिका सलमान ख्ाान ने निभाई है। हिंदी फिल्मों में तीनों ख्ाानों की तूती बोलती है। माना जाता है कि पिछले पच्चीस सालों से आमिर, शाहरुख्ा, सलमान की लोकप्रियता कम नहीं हो रही है। फिल्मों में इतनी लंबी पारी के पीछे सधी मेहनत होती है। ऐसा लगता है कि सलमान फिल्मों के चुनाव पर ध्यान नहीं देते। उनका अप्रोच अलग है। वह शोर-शराबे या आक्रामक प्रचार में यकीन नहीं करते। वह अच्छे वक्ता नहीं हैं। उनके इंटरव्यू सुनें या देखें तो वह पॉलिटिकली राइट बातें भी नहीं करते। दरअसल, वे मूड से चलते हैं और दिल से बोलते हैं। इसीलिए विवादों में फंसे रहते हैं।

राजनीतिक फिल्म

कबीर ख्ाान की 'बजरंगी भाईजान एक पॉलिटिकल फिल्म है। भारत-पाकिस्तान के बीच फैली ग्ालतफहमियों पर सीधी बात करती है और फिल्म के किरदारों की प्रतिक्रियाओं से उन धारणाओं को तोडती है, जो आज्ाादी के बाद से दोनों देशों के नागरिकों के मन में राजनीतिक स्वाार्थ की वजह से बिठाए गए हैं। कबीर ख्ाान हिंदी फिल्मों में आने सेपहले डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर रहे हैं। उन्होंने पॉलिटिकल जर्नलिस्ट सईद नकवी के साथ कई डॉक्यूमेंट्रीज्ा बनाई हैं। उनके पिता रसीदुद्दीन ख्ाान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर थे। राजनीतिक माहौल में रहने और राजनीतिक संदर्भ की डाक्यूमेंट्री बनाने के कारण कबीर ख्ाान की फिल्मों में भी राजनीति दिखती है। फिल्म 'काबुल एक्सप्रेस से लेकर 'एक था टाइगर तक यह राजनीति है। कबीर ख्ाान कहते हैं, 'राजनीति मेरे लिए ज्ारूरी है। अपने यहां फिल्मों में इस पर बात नहीं होती। समीक्षक भी समीक्षा लिखते वक्त फिल्मों की राजनीति की बातें नहीं कहते। मैं फिल्म में कमी बर्दाश्त कर सकता हूं, मगर फिल्म की पॉलिटिक्स ख्ाराब हो तो मैं फिल्म नहीं देख सकता। मेरी सर्वाधिक प्रिय फिल्म 'लगे रहो मुन्ना भाई है। उसमें घोषित रूप से राजनीति की बातें नहीं हैं, लेकिन वह फिल्म राजनीति की वजह से सभी को अच्छी लगती हैं। अनेक फिल्मों में क्राफ्ट बेहतर होता है, लेकिन पॉलिटिक्स नहीं रहती। ऐसी फिल्में नहीं चल पातीं।

दोस्ती काम आई

कबीर ख्ाान कहते हैं, 'मैंने सलमान ख्ाान के साथ पहले 'एक था टाइगर बनाई थी। उसके निर्देशन में मुझे कई समझौते करने पडे। पहली बार मैं किसी बडे स्टार के साथ काम कर रहा था। एक-दूसरे को समझने में वक्त लगा। फिल्म ख्ात्म होने तक सलमान मेरे अप्रोच को समझ गए थे। मुझे एहसास हो गया था कि बाहर से मज्ााकिया व अगंभीर दिख रहे सलमान ख्ाान की शिद्दत किसी से कम नहीं है। वे राजनीति समझते हैं। 'बजरंगी भाईजान जैसी फिल्म सलमान को लेकर ही बन सकती थी। 'एक था टाइगर के समय उनसे हुई दोस्ती काम आई। हम दोनों कुछ अलग करना चाहते थे। इस बार हम समान धरातल पर थे। हमें फिल्म पर भरोसा था। इसकी स्क्रिप्ट सुनते ही सलमान ने कहा था कि इसे हम ख्ाुद प्रोड्यूस करेंगे। इस फिल्म में सब रीअल है और मेनस्ट्रीम माउंटिंग है।

दिल छूने वाली स्क्रिप्ट

फिल्म की स्क्रिप्ट सलमान ख्ाान को इतनी पसंद आई कि उन्होंने इसी फिल्म के साथ निर्माता बनने का फैसला किया। यह उनके प्रोडक्शन की पहली फिल्म है। सलमान बताते हैं, कबीर ख्ाान पर मुझे भरोसा था। इस फिल्म की स्क्रिप्ट ने मेरे दिल को छुआ। इसमें मेनस्ट्रीम फिल्म के सभी तत्व है। यह फिल्म हंसाती है। बजरंगी की सादगी और ईमानदारी में गहरा संदेश है। फिल्म में किसी तरह का नारा या भाषण नहीं है, फिर भी यह सभी के दिलों को छूती है। मुझे ख्ाुशी है कि फिल्म सभी देशों में सराही जा रही है।

हिंदी फिल्मों के हीरो हमेशा बहादुर और विजेता दिखाए जाते हैं। हर मुसीबत से निकलने का तिकडम उनके पास रहता है। वे एक साथ दर्जनों व्यक्तियों का मुकाबला कर सकते हैं। सलमान पिछली फिल्मों में यह सब करते रहे हैं, लेकिन 'बजरंगी भाईजान में उनकी भूमिका अलग है। अंतिम दृश्य को याद करें तो एक व्यक्ति लंगडाता हुआ पस्त हाल में दिखता है, वह भी सलमान, लेकिन जब पीछे से भाईजान का नारा और मामा की पुकार आती है तो दर्शकों की आंखें बजरंगी की बहादुरी से द्रवित हो जाती हैं।

मासूम मुन्नी

'बजरंगी भाईजान में मुन्नी उर्फ शाहिदा की भूमिका निभा रही हर्षिल मल्होत्रा का ख्ाास योगदान है। हर्षिल की मासूमियत दर्शकों को सहानुभूति से भर देती है। उसके चेहरे पर आते-जाते भाव छू जाते हैं। हर्षिल की खोज मुश्किल रही। कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबडा ने सैकडों बच्चियों के ऑडिशन के बाद उसे फाइनल किया। कबीर ख्ाान भी मानते हैं, 'कास्टिंग सही हो जाए तो आधा काम हो जाता है। हर्षिल शाहिदा की भूमिका के लिए परफेक्ट साबित हुई।

पाकिस्तानी टीवी रिपोर्टर चांद नवाब की भूमिका में नवाज्ाुद्दीन सिद्दीकी ने चार चांद लगा दिए हैं। नवाज्ा कहते हैं, 'मैंने चांद नवाब के साथ अपने देश के टीवी रिपोर्टर के फुटेज भी देखे। मुझे इस कैरेक्टर को डंब दिखाना था, लेकिन यह सावधानी बरतनी थी कि वह कैरीकेचर न लगे। फिल्म में चांद नवाब की बडी भूमिका है। उसकी हरकतें बेवकूफाना हैं, लेकिन वह ज्ाहनी तौर पर तेज्ा और समझदार है। शाहिदा को उसके परिवार से मिलवाने का काम करता है। मेरे लिए फिल्म इसलिए भी ख्ाास रही कि यह एक बडे मकसद को लेकर बनाई गई थी। मुझे ज्य़ादा मेहनत नहीं करनी पडी। सलमान ख्ाान से मेरी अच्छी बॉण्डिंग हो गई। मैं आगे भी उनके साथ फिल्में करता रहूंगा।

आउटडोर शूटिंग्स

'बजरंगी भाईजान की शूटिंग देश के कई हिस्सों में हुई। इस फिल्म के लिए सलमान ने सुविधाएं छोडीं और मुंबई से बाहर निकले। सलमान मज्ााक में कहते हैं, 'कबीर को शौक है। वे कश्मीर की दुर्गम घाटियों से लेकर रेगिस्तान तक ले गए। हमने सर्द और गर्म मौसम में शूटिंग की। दर्शकों को इससे महसूस होगा कि देश कितना ख्ाूबसूरत है।

अंत में कबीर जोडते हैं, 'फिल्म की सिंपल पॉलिटिक्स बजरंगी भाईजान का नेक इंसान होना है। आप किसी भी धार्मिक-राजनीतिक विचार के हों, बॉर्डर के इस ओर हों या उस ओर... आख्िारकार इंसानियत सीमाओं को तोड देती है। हम चीज्ाों को रूढ ढंग से देखते-समझते हैं। उससे हमारी सोच प्रभावित होती है। 'बजरंगी भाईजान सारी सीमाओं से ऊपर उठकर बातें करती है।

अजय ब्रह्मात्मज