ऐक्ट्रेस-प्रोड्यूसर दीया मिज्र्ाा और लेखक-डायरेक्टर साहिल संघा ने लंबे सहजीवन के बाद शादी की। एक कहानी के सिलसिले में हुई मुलाकात दोस्ती और फिर बिज्ानेस पार्टनरशिप में बदली। इसके बाद ज्िांदगी में भी पार्टनर बन गए। अभी दोनों अपनी प्रोडक्शन कंपनी चला रहे हैं। रिश्तों को लेकर अजय ब्रह्म्ाात्मज ने उनसे की लंबी बातचीत।

बॉलीवुड की ख्ाूबसूरत अभिनेत्रियों में एक हैं दीया मिज्र्ाा, जो सामाजिक कार्यों के लिए भी जानी जाती हैं। लंबे सहजीवन के बाद उन्होंने अपने बिज्ानेस पार्टनर साहिल संघा से शादी की और ख्ाूबसूरत सफर पर साथ-साथ चल पडे। दांपत्य को लेकर उनकी सोच परिपक्व, स्पष्ट और परंपरागत धारणाओं से अलग है। उनसे हुई बेबाक और लंबी बातचीत के कुछ अंश।

कहानी भरी मुलाकात

साहिल : मैं दीया को एक कहानी सुनाने आया था। कहानी के साथ इन्हें मैं भी पसंद आ गया था। कुछ समझ पाते, इसके पहले ही 'होना था प्यार, हो गया।

दीया : वह एक लव स्टोरी थी। संवेदनशील किरदार थे उसमें। कहानी के साथ ही साहिल को समझने-जानने का मौका मिल रहा था। इतना लंबा वक्त हो गया इंडस्ट्री में। एकाएक कोई बेहद ख्ाूबसूरत सोच वाली कहानी लेकर आ जाए तो पसंद तो आएगा ही। इनकी कहानी में एक इमोशनल इंटेलिजेंस था, जो मुझे भा गया।

साहिल : यह तो मैं कहने वाला था कि मेरे दिमाग्ा ने ही इन्हें प्रभावित किया होगा, बाकी तो मेरे पास कुछ है नहीं।

दीया : तहज्ाीब भी थी इनमें। आजकल ऐसे लडके कम दिखते हैं। मेरे साथ इससे पहले शायद कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी से मिली और उसके बारे में जानने को उत्सुक हो गई। साथ काम करने के दौरान हम मानसिक तौर पर नज्ादीक आए। उन दिनों मैं चार फिल्मों की शूटिंग कर रही थी। मेरा ज्य़ादातर समय सफर में गुज्ारता था। अरशद वारसी के साथ 'हम तुम और घोस्ट की शूटिंग न्यू कैसल में चल रही थी, फिल्म 'एसिड फैक्ट्री के अलावा शुजित सरकार की 'शू बाइट की शूटिंग चल रही थी। इसी व्यस्तता में साहिल मिले और हम भावनात्मक तौर पर जुड गए।

समझदारी बढती गई

साहिल : दीया से मिलते समय मैं घबराया कि न जाने ये कैसे रिएक्ट करेंगी, मगर मिलने पर इनकी नज्ााकत और तहज्ाीब से रूबरू हुआ। फोन पर ही मैंने महसूस कर लिया था कि दीया ज्ामीन से जुडी हस्ती हैं। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोगों का मिलना ही बडी मुसीबत होती है। मुलाकात तय हो भी जाए तो अकसर तय समय पर रद्द हो जाती है। ख्ौर, दीया तय समय पर मिलीं। उन्होंने मीटिंग सिर्फ 45 मिनट आगे बढाने की मोहलत मांगी थी। पहला इंप्रेशन अच्छा था। मेरी चिंता थी कि दो घंटे में अपनी कहानी से इन्हें प्रभावित कर लूं। इमोशंस के साथ 120 पन्ने सुनाना आसान काम नहीं। कहानी के आख्िारी हिस्से तक आते-आते दीया की आंखों से आंसू टपकने लगे। मैं घबरा गया कि क्या इतनी बेकार कहानी है कि ये रो रही हैं? फिर दीया ने थोडा समय मांगा। वह ख्ाुद को संयत करने गईं, लौट कर उन्होंने कहानी की विशेषताओं की चर्चा की। उस कहानी का टाइटिल था 'कुछ इस तरह। वह एक शादीशुदा दंपती की कहानी थी।

दीया : हां, इस दंपती के पास सब कुछ था, मगर रिश्ते में कुछ मिस था। दूसरी ओर एक कपल था, जिसके पास कुछ नहीं था, यहां तक कि वे शादीशुदा भी नहीं थे, मगर रिश्ते के स्तर पर बहुत ख्ाुश थे।

साहिल : असल चीज्ा है-ट्यूनिंग। एक-दूसरे को आप कितना समझते हैं। हमारे विचार मिलते हैं, लेकिन कई बातों में हम असहमत भी होते हैं।

दीया : उस स्क्रिप्ट पर फिल्म तो नहीं बनी, मगर हम साथ रहने लगे। अब मुझे लगता है, वह फिल्म बननी चाहिए।

साहिल : फिल्म बन जाती, लेकिन तभी मंदी का समय शुरू हो गया और तब वह फिल्म महंगी थी। अब उस कहानी का सही वक्त आया है। मैं ज्य़ादा अनुभवी हूं। हमारी कंपनी है। हम फिल्म को ज्य़ादा बेहतर तरीके से बना पाएंगे।

पहचान और आज्ाादी

दीया : कहानी में ख्ाूबसूरत विरोधाभास है। हम पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था में जी रहे हैं। यहां हमेशा और-और....की होड है। हमें पता भी नहीं होता कि हम गहरे लालच में फंस चुके हैं। इस कहानी में दिखाया गया है कि कामयाबी हासिल करने के चक्कर में रिश्ते कैसे दरकने लगते हैं। सच तो यह है कि छोटी-छोटी ख्ाुशियां यूं ही मिलती हैं, उनके लिए पैसे ख्ार्च करने की ज्ारूरत नहीं पडती।

मेरे करियर के शुरू में डायरेक्टर, टेक्नीशियन और दूसरे लोग कहते थे कि तुम ख्ाूबसूरत हो, सफल हो। तुम्हें किसी अमीर आदमी से शादी करनी चाहिए। तुमने छोटी उम्र से काम किया, सेल्फमेड हो, ऐसे आदमी से शादी करो कि रानी की तरह रह सको...। मैं उनसे यही कहती थी कि आप मेरी शादी इंसान से नहीं, पैसों से कराना चाहते हैं। हमारी इंडस्ट्री में एक्ट्रेस के बारे में ऐसे ही सोचा जाता है। जाने-अनजाने दबाव बन जाता है कि किसी अमीर व्यक्ति से शादी करे, ताकि भविष्य में तकलीफ न हो। मेरे मां-बाप ने मुझे पूरी आज्ाादी दी है। मुझे सिखाया है कि अपने दम पर कामयाबी हासिल करो। शादी के बाद मैं आज्ाादी क्यों खोऊं? मेरी पहचान मेरे पार्टनर के पैसे से क्यों जुडे?

साहिल : बिलकुल, ऐसी सोच में बदलाव ज्ारूरी है। पार्टनर का चयन रुपये-पैसे से नहीं, विचारों के आधार पर होना चाहिए। एक कनेक्ट बन जाएगा तो ज्िांदगी में जो भी हासिल करोगे, उसका आनंद उठा पाओगे। दीया मूल्यों पर ज्य़ादा ज्ाोर देती हैं।

दीया : मुझे रिश्तों में भौतिकवादी रवैया बिलकुल पसंद नहीं है।

साहिल : असल चीज्ा है नीयत।

दीया : हां.. नीयत सही होनी चाहिए। बाकी चीजें तो आती-जाती रहेंगी। क्या कर रहे हैं-कितना कमा रहे हैं, इससे ख्ाास फर्क नहीं पडता। हमारी पीढी अपने बलबूते पहचान बना रही है। हम अपनी शर्तों पर ज्िांदगी जी रहे हैं, कमा रहे हैं, अपनी पसंद से शादी कर रहे हैं। रिश्ते भी मूल्यों पर आधारित हों तो ठीक रहते हैं, वर्ना उनमें गंध आने लगती है।

साहिल : अब तो छोटे-बडे सभी शहरों में युवा ऐसे ही सोच रहे हैं। देखिए, दीया एक नेकदिल इंसान हैं। भले ही वह दीया मिज्र्ाा होतीं या दीया मिज्र्ाा संघा, कपूर या ख्ाान होतीं, तो भी वह दीया ही होतीं। हमारी मुलाकात शायद किसी और स्तर पर होती। किसी और प्रोफेशन में भी वह ऐसे ही सोचतीं। मुझे उनसे मिल कर कभी लगा नहीं कि किसी एक्ट्रेस से मिल रहा हूं।

परवरिश बनाती है व्यक्तित्व

साहिल : दीया से मुलाकात 27 साल की उम्र में हुई थी। तब सोचा भी नहीं था कि 30 की उम्र के पहले शादी करूंगा। दीया के डैड ने उन्हें समझाया था कि तीन साल साथ रहने के बाद ही शादी का फैसला करना। तीन सालों में उसके तेवर पता चल जाएंगे। ऐसी सलाह देने वाले कितने डैड होंगे।

दीया : किसी पिता द्वारा दी गई यह 'सबसे बोल्ड सलाह है। उन्होंने छोटी उम्र में ही मुझे नेक सलाह दी थी कि कोर्टशिप का समय रखना। पहले भी लडका-लडकी को इतना समय दिया जाता था कि दोनों एक-दूसरे को समझ लें। इस बीच उन्हें समझ आ जाता था कि निभा सकेेंगे कि नहीं। शुरू में तो सभी शिष्ट नज्ार आते हैं। धीरे-धीरे वास्तविक स्वभाव खुलता है, तब भी अगर दोनों एक-दूसरे को स्वीकार कर सकें तो शादी करनी चाहिए। हर पति-पत्नी में झगडे होते हैं, लेकिन मर्यादा का पालन होना चाहिए और सम्मान ख्ात्म नहीं होना चाहिए।

साहिल : हम एक साथ रहे तो एक-दूसरे के स्वभाव, पसंद-नापसंद को समझते भी रहे। माता-पिता का आशीर्वाद था, एक-दूसरे के प्रति हमारे मन में सम्मान था। हमने दिखावा नहीं किया, न शादी में कोई हडबडी की। शादी हमारे लिए कोई मुहर नहीं थी। यहां तक कि दीया की मां ने शादी की तारीख्ा तय करने को लेकर दो टूक कहा था, कोई भी तारीख्ा रख लो, क्या फर्क पडता है। हमारे लिए तो तुम दोनों शादीशुदा हो।

एक प्रोफेशन में होना अच्छा है

दीया : मुझे लगता है दोनों एक ही प्रोफेशन में हों तो जोश रहता है। जैसे हम साथ में फिल्म बनाना चाहते हैं। इस कोशिश में कई बार एक-दूसरे में कुछ अलग क्वॉलिटीज्ा भी दिखती हैं। मेरा एक ही मंत्र है- अपने इगो को संभाल लो, बाकी सब संभल जाएगा।

हम अच्छे दोस्त हैं, एक-दूसरे से बहस करते हैं, नाराज्ा भी होते हैं, फिर मान भी जाते हैं। मैं ऐसे दंपतियों को जानती हूं, जो घर लौट कर काम के बारे में बातें नहीं करते। अगर हमारा काम सुंदर है तो हम बात क्यों न करें? मैं ढेरों दिलचस्प लोगों से मिलती हूं, उनकी कहानियां लेकर घर लौटती हूं। साहिल कहानियां लिखते हैं और मैं साहिल को दुनिया की कहानियां बताती हूं। हमारी ज्िांदगी एक कहानी की नींव पर टिकी है।

आइ लव यू नहीं कहा

दीया : सच कहूं तो साहिल से मिलने के बाद मैंने ख्ाुद को टीनएजर जैसा महसूस किया। हालांकि मैंने शायद कभी 'आइ लव यू भी नहीं कहा। दो मुलाकातों के बाद इन्हें कहानी की एक किताब भेंट की, जिस पर एक संदेश लिखा, 'ख्ाुशियों का महत्व तभी है, जब उसे बांटने वाला कोई हो। ईश्वर करे आपको वह मिले, जिसके साथ अपनी ख्ाुशियां बांट सकें।

साहिल : हां, दीया शूटिंग में बिज्ाी थीं तो हम फोन पर लंबी-लंबी बातें करते थे। लौटीं तो मुलाकातें बढीं। मैं अभी तक भी दीया के सामने प्यार का इज्ाहार नहीं कर सका।

दीया : साहिल धीरे-धीरे ही कुछ ज्ााहिर करते हैं। ठीक भी है, धमाके से कुछ कह दो तो निभाना भी मुश्किल हो जाता है।

प्रेम में स्पेस का महत्व

साहिल : पार्टनर से ख्ाुश रहना सीखना चाहिए। किसी एक बात से दुखी हैं तो वे बातें याद करें, जिससे ख्ाुश होते हों। किसी एक पर अटकने का अर्थ है कि आप ज्िाद कर रहे हैं। प्रेम तो हमेशा वर्क इन प्रोग्र्रेस की तरह होता है। हमारी शादी में पर्सनल स्पेस जैसा कोई मसला नहीं उठा। हां, एक बार कबर्ड में स्पेस को लेकर बातचीत हुई थी। दीया : खलील जिब्रान ने लिखा था, 'साथ पियो, लेकिन एक ही प्याले से मत पियो। शादी का मतलब एक बट्टा दो नहीं होता। सब कुछ शेयर करना है, लेकिन व्यक्तित्व को बचाए रखना है। साहिल की अपनी पर्सनैलिटी है। वह मैं उनसे नहीं छीन सकती। साहिल भी मुझसे मेरा व्यक्तित्व नहीं ले सकते। मैं घंटों अकेले रहती हूं। वह समय मेरे लिए ख्ाास है। किताबें पढती हूं हमेशा हाथ पकड कर बैठना ज्ारूरी नहीं।

शादी में व्यक्तित्व न खोएं

दीया : एक-दूसरे के साथ ही अपने परिवारों को भी आदर दें तो ज्िांदगी सही रहती है। ईमानदारी, एकरूपता व सम्मान जैसे गुण हों तो लडका हस्बैंड मटीरियल होता है। कैफी आज्ामी ने लिखा था न- उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे। एक-दूसरे का सम्मान करते हुए साथ चलें तो हर मुश्किल जीत जाएंगे।

साहिल : लडकियों से मेरा कहना है, पहले ख्ाुद से प्रेम करें। व्यक्तित्व मज्ाबूत बनाएं। जैसे दीया ने अपनी पहचान बनाई है। बेटियों को इस लायक बनाना चाहिए कि वे स्वयं जीवनसाथी चुन सकें। लडकी जागरूक व स्वतंत्र होगी तो लडका भी झुकेगा। हमारे समाज में लडके बडे ही नहीं हो पाते। शादी का नाम लेते ही माता-पिता सब याद आ जाते हैं उन्हें। ज्िांदगी के फैसले लेने का हौसला भी नहीं होता उन्हें।

दीया : समाज को बदलना हो तो पहले औरतों को बदलना होगा, उनके नज्ारिये में बदलाव करना होगा। हर लडके की मां एक औरत होती है। लडके मां से ही सीखते हैं।

साहिल : लडकियां सशक्त और स्वतंत्र हों तो पुरुषों की मानसिकता भी बदल जाएगी। लेकिन नियंत्रण की मानसिकता से उबरना होगा, तभी रिश्ते बेहतर हो सकेेंगे।

एक-दूसरे के प्रति सम्मान है ज्ारूरी

दीया : हम सात साल साथ में रहे। इस बीच अपनी कंपनी खोली, दो फिल्में बनाईं। परिवार के लिए हम कपल थे और दुनिया की नज्ार में एक थे। दोनों परिवारों में हमारा आना-जाना था। फिर शादी की क्या ज्ारूरत थी? शायद लडकों के लिए कोई ख्ाास बात नहीं होगी, लेकिन लडकियों के लिए इसका महत्व होता है। लोग जमा होते हैं, शादी के गवाह बनते हैं, समाज के सामने एक पार्टनरशिप शुरू होती है। हमने आर्य समाजी तरीके से शादी की थी। अच्छा लग रहा था। सभी उस माहौल और एनर्जी का हिस्सा थे। साथ तो हम पहले से थे, न मैं किसी और के बारे में सोचती थी और न साहिल। हमने कोई ऑप्शन ओपन ही नहीं रखा था।

साहिल : मेरे लिए शादी एक-दूसरे के साथ किए गए वायदे को पूरा करना है। वैसे मुझे चर्च की शादी अच्छी लगती है। पादरी एक-दूसरे से पूछता है और शादी करवा देता है।

दीया : मर्यादा और सम्मान न हो तो प्रेम नहीं हो सकता। क्या किसी बच्चे को गोद में उठाते समय 'मैं होता है मन में? प्रेम में भी अहं नहीं होना चाहिए।

साहिल : सम्मान व आदर ज्ारूरी है। साथ का मतलब एक ही राह पर चलना भी नहीं होता, एक-दूसरे का हाथ थामे रखना काफी है। शेयरिंग से प्यार बढता और मज्ाबूत होता है।

दीया : जब हमारे बीच 'मैं निकल जाए और हम बच जाएं अहं से तो समझें कि प्यार हो गया।

अजय ब्रह्म्ाात्मज