सौरभ शुक्ला की पहचान ऐक्टर और कॉमेडियन के तौर पर है। इन दिनों वह थिएटर में भी सक्रिय हैं। ऐक्टिंग के लिए पढाई छोड कर दिल्ली से मुंबई का रुख्ा करने वाले सौरभ ने लंबे संघर्ष के बाद अलग पहचान बनाई है। सहजता और बेबाकी उनकी खासियत है। पिछले दिनों हुई मुलाकात में उनके व्यक्तित्व के कुछ अन्य पहलुओं को भी जानने का मौका मिला।

ल्म 'सत्या के कल्लू मामा और 'जॉली एलएलबी के जज त्रिपाठी के रूप में मशहूर सौरभ शुक्ला के पूरे व्यक्तित्व से कॉमेडी झलकती हैं। वे हाज्िारजवाब हैं और सहजता से सारे सवालों के जवाब देते हैं। पिछले दिनों दैनिक जागरण के नोएडा ऑफिस में उनसे मिलना हुआ तो उनके बारे में कई रोचक बातें जानने को मिलीं। उन्हें फाकामस्त इंसान कहा जा सकता है, जो अपने जुनून के लिए जी रहा है। वह बिना लाग-लपेट सरल तरीके से जो भी बोलते हैं, उसमें तंज और व्यंग्य की पैनी धार होती है। साफ बोलते हैं, भले ही उनके विचार किसी को पसंद न आएं। ऐक्टिंग में वह सीमाओं में नहीं बंधना चाहते। फिल्में, टीवी, थिएटर सब करना चाहते हैं, बशर्ते बेहतर काम मिले (और बेहतर पैसा भी...)।

जीवन तो बस एक है

मैं टेनिस खेलता हूं और सच कहूं तो बहुत अच्छा खेलता हूं, अगर दूसरी तरफ अच्छा प्लेयर हो। कॉलेज टाइम में ख्ाूब खेलता था। अभी 2012 से फिर खेलना शुरू किया है। जब शूटिंग नहीं करता तो तीन-चार घंटे तक टेनिस खेलता हूं, पूरी खेल-भावना और ऊर्जा से खेलता हूं। मेरी एक िफलोसॉफी है। मेरे पास जीवन एक ही है। मैं पुनर्जन्म में यकीन नहीं करता। मुझे लगता है कि जीवन यहीं तक है और यहीं ख्ात्म हो जाता है। जो भी करना है, यहीं करना है। इसीलिए मैं बीच-बीच में फिल्मों से वक्त निकाल कर थिएटर करता हूं।

सुबह की चाय

मेरी पत्नी बर्नाली मेरी बेस्ट फ्रेंड हैं। हमारे रिश्ते में यही अच्छी बात है कि हम अब तक पति-पत्नी नहीं बने हैं। वैसे तो हम 16-17 साल से साथ हैं मगर अब तक अच्छे दोस्त हैं। बर्नाली का अपना जीवन है, वह इंडीपेंडेंट पर्सनैलिटी हैं। वह स्क्रिप्ट राइटर, फिल्ममेकर हैं। कई बार लोग पूछते हैं, आपके कितने बच्चे हैं? मैं कहता हूं-दो। एक मैं और दूसरा बर्नाली। हम दोनों बच्चे एक-दूसरे को संभालते रहते हैं और जीवन चलता रहता है। हम सुबह की चाय हमेशा साथ पीते हैं, अगर एक शहर में हों या बाहर शूटिंग्स में न हों। यह पूरे 2-3 घंटे की चाय होती है। हम समाज, लोगों, फिल्म जैसी सारी चर्चाएं करते हैं लेकिन हम अपनी समस्याओं के बारे में बात नहीं करते, क्योंकि इसमें अकसर झगडा हो जाता है।

कन्फ्यूज्ान ज्ारूरी है

ज्िांदगी में थोडा कन्फ्यूज्ान या दुविधा होना •ारूरी है। यह व्यक्तित्व-विकास की अहम प्रक्रिया है। सामने दो दरवाज्ो हैं, किस दरवाज्ो से जाऊं....यह समस्या हर पीढी के सामने होती है। यहीं से रास्ते निकलते हैं। मेरी मां म्यूज्िाक टीचर थीं, पापा प्रोफेसर और भाई टीचर। मैंने कॉमर्स पढा पर उसकी बेसिक्स तक मालूम नहीं थीं। मैं सिर्फ नाटक कर सकता था तो वही किया। मैं सफल न होता, मुझे लोग नहीं पहचानते तो थोडी कसक होती मगर दुख नहीं होता, क्योंकि मैंने अपने मन का काम किया। सबसे यही कहता हूं कि वही करें जो करना चाहते हैं। प्रस्तुति : इंदिरा राठौर