किसी भी समाज के विकास का रास्ता परिवर्तन के विभिन्न पडावों से होकर गुजरता है, पर हर नया बदलाव अपने साथ लेकर आता है ढेर सारी चुनौतियां। ऐसे हालात के लिए ख्ाुद को तैयार कैसे किया जाए, इन नई चुनौतियों का सामना किस तरह किया जाए और भविष्य में कैसी होगी समाज की तसवीर? कुछ कामयाब शख्सीयतों और विशेषज्ञों के साथ इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढ रही हैं विनीता।

अब पहले वाला जमाना नहीं रहा। मुश्किलें बहुत बढ गई हैं। चारों ओर कडी प्रतिस्पर्धा है। सीधे-सादे लोगों का जीना मुहाल हो गया है। ये कुछ ऐसे सामान्य से जुमले हैं, जिन्हें समय के हर दौर में अलग-अलग ढंग से दुहराया जाता रहा है।

हमेशा रही हैं मुश्किलें

अगर पुराने लोगों को नए जमाने से कुछ शिकायतें होती हैं तो युवा पीढी को भी ऐसा लगता है कि पुराने समय में लोगों का जीवन ज्य़ादा आसान था, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। सामाजिक विकास से जुडी जटिलताएं हर पीढी के सामने आती हैं, पर समय के साथ उनका स्वरूप बदल जाता है। देश की आजादी के बाद लोगों की जीवनशैली सादगीपूर्ण थी। शिक्षित वर्ग के सामने सरकारी क्षेत्र में रोज्ागार के अच्छे अवसर उपलब्ध थे। इस लिहाज से जीवन को आरामदेह कहा जा सकता था। ...पर यही वह दौर था, जब छूआछूत, अंधविश्वास, निरक्षरता और स्त्रियों की दयनीय दशा जैसी समस्याएं युवा पीढी के सामने चुनौती बनकर खडी थीं और उनके बीच से आगे बढऩे के लिए रास्ता निकालना बहुत मुश्किल था। प्रमिला वैद्य एक सरकारी बैंक के ब्रांच मैनेजर पद से अवकाश प्राप्त कर चुकी हैं। वह बताती हैं, 'साठ के दशक में लडकियों को ज्य़ादा पढाने का चलन नहीं था। बडी मुश्किलों के बाद मुझे कॉलेज में एडमिशन लेने और बैंकिंग सर्विस के एंट्रेंस एग्जैम में शामिल होने की इजाजत मिली थी। उस जमाने में अवसरों की उपलब्धता जरूर थी, पर उन तक पहुंचने की राह में हजारों बंदिशें थीं।'

कदम बढा कर तो देखें

भारतीय समाज बहुत बडे बदलाव के दौर से गुजर रहा है। आर्थिक उदारीकरण के बाद पिछले दो दशकों के दौरान भारतीय जीवनशैली में बदलाव की रफ्तार इतनी तेज है कि उसके साथ कदम मिलाकर चलना चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है, पर इसके सकारात्मक पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह बदलाव अपने साथ बेहतरी लेकर आ रहा है। बस जरूरत है, उसकी ओर आत्मविश्वास के साथ अपना पहला कदम बढाने की। आर्थिक उदारीकरण ने पूरी दुनिया को करीब लाने का काम किया है। भारतीय समाज भी इससे अछूता नहीं है। जहां एक ओर मल्टीनेशनल कंपनियों ने युवाओं को रोज्ागार के बेहतर अवसर प्रदान किए, वहीं उन्हें दुनिया में आ रहे हर नए बदलाव से रूबरू होने का अवसर मिला। सूचना तकनीक के क्षेत्र में आने वाले क्रांतिकारी परिवर्तन ने भौगोलिक दूरियों को मिटा दिया है। चाहे शिक्षा हो या टेक्नोलॉजी, भाषा हो या संस्कृति, हर स्तर पर लोग बडी सहजता से अनुभवों और विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। किसी भी कोने में बैठकर पूरी दुनिया से जुडे रहने की सुविधा ने लोगों के संपर्क का दायरा भी विस्तृत बना दिया है। इसका फायदा उठाकर लोग एक-दूसरे के अनुभवों से बहुत कुछ सीखने-समझने की कोशिश कर रहे हैं।

जरूरत नए प्रयोग की

चाहे सिनेमा हो या साहित्य, बिजनेस हो या सोशल वर्क, प्रोफेशन के हर क्षेत्र में बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए नए प्रयोगों को बढावा दिया जा रहा है। इसी वजह से हर क्षेत्र में लोग कुछ नया और बेहतर करने की कोशिश में जुटे नजर आते हैं। इसके लिए वे नई संभावनाएं तलाशने और नए प्रयोग करने से जरा भी नहीं हिचकते। हिंदी फिल्में इसकी सबसे अच्छी मिसाल हैं। आज के फिल्म निर्माता लीक से अलग हट कर वास्तविक जीवन-स्थितियों, चरित्रों और घटनाओं पर फिल्में बनाने का रिस्क उठाते हैं। तभी तो बिना ग्लैमर का छौंका लगाए और सीमित बजट में भी 'पान सिंह तोमर, 'लंच बॉक्स और 'मैरी कॉम जैसी उम्दा फिल्में दर्शकों के सामने आ रही हैं। केवल फिल्मों की ही बात नहीं है, बल्कि हर क्षेत्र में लोग बेहतरी की तरफ बढ रहे हैं। यहां तक कि लापरवाही के लिए बदनाम कई सरकारी विभाग भी इंटरनेट का इस्तेमाल करके अपनी कार्य-प्रणाली को पहले की तुलना में ज्य़ादा दुरुस्त बना रहे हैं।

जरूरत मल्टीटास्किंग की

आज के दौर में प्रोफेशनल क्षेत्र में आने वाला सबसे बडा बदलाव यह है कि अब मल्टीटास्किंग स्किल्स सीखना लोगों की जरूरत बन चुका है। आजकल ज्य़ादातर कंपनियां अपने कर्मचारियों को उनके मुख्य कार्य के अलावा उससे संबंधित अन्य प्रोफेशनल स्किल्स सीखने के लिए प्रेरित करती हैं, ताकि वे अपने विभाग के अलावा दूसरे विभाग की कार्य-प्रणाली से भी वाकिफ हो सकें। इससे कंपनी और कर्मचारी दोनों को लाभ होता है। कंपनी का कार्य ज्य़ादा तेजी से होता है और कर्मचारियों की दक्षता में भी वृद्धि होती है। इस संबंध में सॉफ्टवेयर इंजीनियर आशीष मिश्रा कहते हैं, 'वैसे तो मेरा काम अलग-अलग कंपनियों के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करना है, पर बाजार की जरूरतों को समझने के लिए मैंने मार्केटिंग रिसर्च का डिप्लोमा कोर्स भी किया है और यह जानकारी मेरे काम में बहुत मददगार साबित होती है।

कला की बदलती दुनिया

बदलाव के इस दौर का असर कला और संस्कृति के क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है। इस संबंध में कथक नृत्यांगना रचना यादव कहती हैं, 'पुराने समय में जीवनशैली बहुत सीधी-सादी थी, लिहाजा कलाकारों को अपने ऊपर ज्य़ादा ख्ार्च करने की जरूरत नहीं होती थी, पर अब ऐसी बात नहीं है। शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में भी कई नई चुनौतियां सामने आ रही है। कल तक जिन चीजों को लग्जरी समझा जाता था, अब वे जरूरत बन चुकी हैं। इसलिए आज के कलाकार भी बदलतेे वक्त के साथ कदम मिलाकर चलना सीख रहे हैं। पुराने समय में गुरु के घर पर ही शिष्य नृत्य सीखने चले आते थे। अपनी श्रद्धा और सामथ्र्य के अनुसार जो भी बन पडता, वे गुरु दक्षिणा के रूप में ले आते थे, पर अब ऐसा नहीं है। आज के शिष्यों को नृत्य सीखने के लिए आरामदायक माहौल की जरूरत होती है। इसलिए ज्य़ादातर सीनियर डांसर्स आधुनिकतम सुविधाओं से युक्त डांस अकेडमी की स्थापना कर रहे हैं। साथ ही कलाकारों को अपने प्रचार के लिए काफी मेहनत करनी पडती है। इसके लिए वे सोशल नेटवर्किंग साइट्स और जनसंपर्क कंपनियों की भी मदद लेते हैं। समय के साथ यह बदलाव स्वाभाविक है और इसके लिए हमें ख्ाुद को तैयार करना पडेगा।

बदल रही है तसवीर

केवल प्रोफेशनल लाइफ ही नहीं, बल्कि हमारे निजी जीवन में भी आहिस्ता-आहिस्ता बहुत कुछ बदल रहा है। भले ही हम इसे अति व्यस्त महानगरीय जीवनशैली की विवशता कहें या पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण, पर सच्चाई यह है कि अब केवल महानगरों में ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों के मध्यवर्गीय परिवारों के रहन-सहन में भी काफी बदलाव आ चुका है। कल की दबी-सहमी सी हाउसवाइफ आज की कॉन्फिडेंट होममेकर बन चुकी है। आधुनिक भारतीय स्त्री इस बदलाव को न केवल ख्ाुले दिल से स्वीकार रही है, बल्कि इस चुनौती के लिए उसने ख्ाुद को बहुत अच्छी तरह तैयार भी किया है। घरेलू उपकरणों की सुविधाओं ने स्त्रियों के कामकाज के तरीके को व्यवस्थित और आसान बना दिया है। पहले घर की सफाई और कुकिंग के लिए उन्हें बहुत ज्य़ादा वक्त देना पडता था, लेकिन अब उनका यह काम कुछ ही घंटों में निबट जाता है। कंप्यूटर और इंटरनेट ने होममेकर्स के जीवन को और भी आसान बना दिया है। चाहे बिजली का बिल चुकाना हो या ट्रेन की टिकट बुक करानी हो... ये सारे काम अब वे घर बैठे मिनटों में कर सकती हैं। अब उनके पास इतना वक्त होता है कि वे अपने परिवार की सेहत और फिटनेस पर पूरा ध्यान दे पाती हैं। इतना ही नहीं, अब वे इस वक्त का इस्तेमाल अपनी रुचि से जुडे कार्यों के लिए भी करती हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि ऐसा करते हुए उनके मन में यह ग्लानि नहीं होती कि 'मैं परिवार के बजाय ख्ाुद को ज्य़ादा समय क्यों दे रही हूं?

संतुलन है बडी चुनौती

शहरी मध्यवर्गीय समाज में कामकाजी स्त्रियों की तादाद तेजी से बढ रही है। जब स्त्री अपने परिवार का जीवन-स्तर बेहतर बनाने की कोशिश में जुटी है तो पुरुष भी कुकिंग और बच्चों की देखभाल जैसे घरेलू कार्यों में पत्नी को पूरा सहयोग देता है। कुल मिलाकर भारतीय स्त्री की परंपरागत छवि तेजी से बदल रही है और आज उसके सामने कई बडी चुनौतियां हैं। समाजशास्त्री डॉ. ऋतु सारस्वत कहती हैं, 'शुरुआत में हर बदलाव हमें सुखद लगता है, लेकिन उसके साथ कई चुनौतियां भी जुडी होती हैं। यह सामाजिक परिवर्तन स्त्रियों के लिए सबसे ज्य़ादा चुनौतीपूर्ण है। आज की स्त्री जहां एक ओर अपनी आजादी, पहचान और अधिकारों के लिए संघर्षरत है, वहीं दूसरी ओर उस पर अपनी पारंपरिक छवि बरकरार रखने का जबर्दस्त दबाव है। वह घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन साधने में बडी मुस्तैदी से जुटी है।

बढ रही है सजगता

वक्त के साथ प्रोफेशनल और व्यावसायिक क्षेत्र में तेजी से आ रहे बदलाव को लेकर लोग काफी सजग हो गए हैं। इस संबंध में फोटोग्राफर राजेंद्र कुमार वाधवा कहते हैं, 'नब्बे के दशक में ही मुझे यह आभास हो गया था कि अब डिजिटल फोटोग्राफी का जमाना आने वाला है। इसीलिए मैंने मुंबई जाकर एक प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट से दोबारा फोटोग्राफी की ट्रेनिंग ली। करियर काउंसलर जतिन चावला कहते हैं, 'हमें किसी भी परिवर्तन के सकारात्मक पक्ष को समझना चाहिए। नई तकनीकों को अपनाना आज की जरूरत है। जो व्यक्ति बदलाव की इस आहट को जितनी जल्दी पहचान लेता है उसके लिए कामयाबी की राह उतनी ही आसान होती है।

बहुत कुछ सिखाता है वक्त

आज के इस संक्रमणकालीन दौर में जीवन-स्थितियां जितनी जटिल हो रही हैं, लोग उतनी ही कुशलता से उनका सामना करने को तैयार नजर आ रहे हैं। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक सलाहकार डॉ. अशुम गुप्ता कहती हैं, 'अकसर लोग मुश्किलों को अच्छा नहीं समझते, पर यह मनोविज्ञान का बेहद सामान्य नियम है कि जटिल स्थितियों में व्यक्ति का दिमाग ज्य़ादा तेजी से काम करता है। जब तक हम अपने कंफर्ट जोन में होते हैं, मेहनत करने या नई चुनौतियां स्वीकारने से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन जैसे ही हमारे सामने कोई बडी समस्या आती है तो उसका समाधान ढूंढने के लिए हमारा दिमाग बहुत तेजी से काम करने लगता है। एकाएक सक्रियता बढ जाती है और हम समस्या को सुलझाने के लिए तत्पर हो जाते हैं। इसलिए चुनौतियों से घबराने के बजाय आगे बढकर उनका सामना करें। नाकामी मिले, तो भी पूरी उम्मीद के साथ दोबारा कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि इंसान अपनी गलतियों से भी बहुत कुछ सीखता है।

अगर कभी चुनौतियां डराने की कोशिश करें तो उस नन्हे बच्चे को याद करें, जो पहली बार चलना सीख रहा होता है। इस दौरान वह न जाने कितनी बार गिरता है। तब भी दोबारा उठकर लडखडाते हुए चलने की कोशिश करता है। ...फिर यही कोशिश उसे जल्द ही दौडऩा भी सिखा देती है।

संतुलित रहता हूं हमेशा

अक्षय कुमार, अभिनेता

जहां तक प्रोफेशनल लाइफ की चुनौतियों का सवाल है तो मैं साल में केवल चार फिल्में करता हूं। एक फिल्म लगभग महीने भर में पूरी हो जाती है। इसके बाद का सारा वक्त ट्विंकल और बच्चों के लिए होता है। पार्टियों में जाने का कोई शौक नहीं है मुझे। सुबह बहुत जल्दी उठ जाता हूं और दिन भर में सारे काम निबटा कर रात को जल्दी सो जाता हूं। अपनी हर फिल्म के लिए पूरी मेहनत करता हूं, पर यह जरूरी नहीं है कि हर बार कामयाबी मिले। इसलिए मैं अपनी सोच को संतुलित रखता हूं। अगर कोई फिल्म सुपरहिट होती है तो ज्य़ादा ख्ाुश नहीं होता, अगर कोई फिल्म फ्लॉप हो जाए तब भी अफसोस नहीं करता। इसी वजह से मुझे कोई भी चुनौती बहुत बडी नहीं लगती। सफलता की चिंता किए बगैर मैं तो सिर्फ ईमानदारी से अपना काम करना जानता हूं।

चुनौतियों के बिना बेमजा है जिंदगी

सोनाली सहगल, अभिनेत्री

हम बहुत ज्य़ादा तनावपूर्ण स्थितियों में काम कर रहे होते हैं। अगर एक फिल्म हिट हो भी जाए तो दूसरी की चिंता सता रही होती है। हमारे लिए सबसे बडी चुनौती यही होती है कि हमारा अभिनय इतना अच्छा हो कि लोग उसकी तारीफ करें। मैं नई फिल्मों का ऑडिशन देने के लिए मानसिक रूप से हमेशा तैयार रहती हूं। मेरा मानना है कि जीवन में हर कदम पर चुनौतियां होती हैं। अगर ऐसा न हो तो जिंदगी बेमजा हो जाएगी। दरअसल मुश्किलें हमारी क्षमता परखने के लिए ही होती हैं। अगर हम उनमें खरे उतरते हैं तो चमक जाते हैं। विफलता से निराशा होती है, लेकिन वहीं से दोबारा ख्ाुद को साबित करने की नई चुनौती शुरू हो जाती है। यही हालात हमें आगे बढऩे का हौसला देते हैं। एक फिल्म के लिए मैंने अपने लंबे बाल कटवा दिए और वह फिल्म भी नहीं बन पाई। तब मुझे बहुत अफसोस हुआ, पर ऐसे बुरे अनुभवों को भुलाकर आगे बढऩा जरूरी होता है। इसलिए ऐसी बातों से मैं निराश नहीं होती।

बढ गई हैं चुनौतियां

मधुर भंडारकर, निर्माता-निर्देशक

बॉलीवुड में प्रोफेशनल चुनौतियां अब बहुत ज्य़ादा बढ गई हैं। कानूनन अब हम पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। फिल्मकार के तौर पर अब मेरे लिए 'चांदनी बार जैसी रिअलिस्टिक फिल्म बनाना बहुत मुश्किल होता क्योंकि परदे पर धूम्रपान और मदिरापान दिखाने को लेकर कई तरह की पाबंदियां हैं। आज इंटरनेट पर हर तरह का कंटेंट आसानी से सुलभ है, जिसे युवा पीढी बिना रोक-टोक के देख रही है, पर फिल्मों पर बहुत ज्य़ादा पाबंदियां हैं। फिल्म में कभी भी बुरी चीजों को अच्छा नहीं बताया जाता। बुराई पर हमेशा अच्छाई की ही जीत दिखाई जाती है। दर्शकों तक सही ढंग से अपनी बात पहुंचाने के लिए और अच्छे को सही साबित करने के लिए परदे पर बुराई को भी दिखाना जरूरी होता है, पर फिल्म निर्माताओं से यह आजादी छिनती जा रही है। अब स्क्रिप्ट लिखते समय हमें बहुत सचेत रहना पडता है। हर सीन में देखना पडता है कि इससे कहीं कोई संगठन या समुदाय नाराज न हो जाए। प्रोफशनल लाइफ की ऐसी चुनौतियां से जब मन परेशान हो जाता है तो तनाव दूर करने के लिए अच्छी किताबें पढता हूं। इसके अलावा मुझे ट्रैवल करना और अपने परिवार के साथ सुकून के पल बिताना बहुत पसंद है। इसलिए काम ख्ात्म होते ही परिवार के साथ छुट्टियां बिताने कहीं दूर चला जाता हूं।

मुश्किलों को हावी

नहीं होने दिया

तारा शर्मा, अभिनेत्री

मल्टीटास्किंग होना आज की सबसे बडी चुनौती है। इससे व्यक्ति की प्रोफशनल क्षमता को आसानी से परखा जा सकता है। मेरे पिता कई कार्यों में निपुण थे। नाटककार होने के साथ वह बहुत अच्छे कवि और वक्ता भी थे। शायद उन्हीं से प्रेरित होकर मैं भी कई कार्यों को अच्छी तरह अंजाम दे पाती हूं। जब लंदन में थी तो वहां मैंने कई कॉर्पोरेट बैंकों में काम किया। जब मुझे ऐसा लगा कि मैं मॉडलिंग और ऐक्टिंग कर सकती हूं तो मैंने वह भी किया। फिर दोनों बच्चों के जन्म के बाद पति के साथ मिलकर स्टार वल्र्ड चैनल पर पेरेंटिंग का शो कर रही हूं। इस दौरान मेरे सामने कई तरह की मुश्किलें आईं, लेकिन मैंने उन्हें ख्ाुद पर हावी नहीं होने दिया।

दर्शकों को निराश नहीं कर सकता

शाहिद कपूर, अभिनेता

इंसान के जीवन में चुनौतियां का होना स्वाभाविक है। अपने अनुभावों के आधार पर मुझे ऐसा महसूस होता है कि उम्र के हर दौर की जरूरत के हिसाब से हमारी चुनौतियां बदलती रहती हैं। मैं बॉलीवुड में पिछले बारह वर्षों से काम कर रहा हूं। शुुरुआती दौर में केवल काम मिल जाना भी बहुत बडी चुनौती थी। फिर इस बात की चिंता होने लगी कि आने वाली फिल्म चलेगी या नहीं? अनुभव न होने की वजह से तब फिल्मों के चुनाव में मुझसे गलतियां हुईं और इससे मुझे काफी नुकसान भी हुआ। ख्ौर, फिल्मी करियर के ग्राफ में आने वाला उतार-चढाव तो हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा है। सच तो यह है कि ऐसी गलतियों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। अब मैं फिल्मों के चुनाव को लेकर बहुत ज्य़ादा सजग हो गया हूं। 'हैदर से मिली कामयाबी भी मेरे लिए बडी चुनौती बन गई हैं, क्योंकि अब दर्शकों को मुझसे बहुत उम्मीदें हैं और मैं उन्हें निराश नहीं कर सकता।

बदल गए हैं हालात

डॉ. के. के. अग्रवाल, सेक्रेटरी जनरल, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन

पहले डॉक्टर अपने अनुभवों के आधार पर मरीज का इलाज करते थे। इसलिए उपचार के पहले उन्हें बहुत तरीके की जांच की जरूरत महसूस नहीं होती थी। पहले डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास का मजबूत रिश्ता था क्योंकि मरीज के पास बीमारी के बारे में पहले से ज्य़ादा जानकारी नहीं होती थी, पर अब ऐसा नहीं है। इंटरनेट की वजह से मरीजों में जागरूकता बढी, यह बहुत अच्छी बात है, पर इसका एक बहुत बडा नुकसान यह भी है कि मरीज डॉक्टर की योग्यता और अनुभवों के बजाय इंटरनेट से मिली जानकारियों पर ज्य़ादा भरोसा करते हैं। स्वास्थ्य बीमा की वजह से हर मरीज महंगे अस्पताल में जाना चाहता है। वह डॉक्टर का योग्यता का मूल्यांकन उसकी फीस के आधार पर करता है। उसे बुजुर्ग और अनुभवी के बजाय युवा डॉक्टर्स पर ज्य़ादा भरोसा है। वह अपनी बीमारी की गंभीरता या शारीरिक अवस्था पर ध्यान देने के बजाय यह सोचता है कि अगर मैंने इलाज में दो लाख रुपये खर्च किए हैं तो मुझे बहुत जल्दी आराम मिलना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार इलाज के दौरान अगर मरीज को कोई शारीरिक क्षति पहुंचती है या उसकी मौत हो जाती है तो उसकी आय के आधार पर मुआवजा तय होगा, जिसकी भरपाई डॉक्टर को करनी होगी। जरा सोचिए, यह डॉक्टर्स के लिए कितनी मुश्किल स्थिति है कि वह सभी मरीजों से बराबर फीस लेता है, लेकिन उसे मरीज की आय के अनुकूल मुआवजा देना होगा। यह स्थिति डॉक्टर्स और मरीज दोनों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है।

हौसले से मिलती है कामयाबी

स्नेहा शर्मा, पायलट

अगर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में चुनौतियां बढी हैं तो हमारी क्षमताएं भी बढ रही हैं। मेरा मानना है कि कामयाबी हासिल करने के लिए व्यक्ति के मन में चुनौतियां स्वीकारने का हौसला बहुत जरूरी है। मल्टीटास्किंग होना आज के दौर की मांग है। वैसे तो मैं पायलट हूं, पर इसके साथ ही ड्राइविंग मेरा पैशन है। इसलिए मैं कार रेसिंग को भी उतना ही टाइम देती हूं। मेरी जॉब सुबह 4 बजे से शुरू हो जाती है। दोपहर के वक्त जब मैं फ्लाइट छोडती हूं तो उसके बाद सीधे रेसिंग ट्रैक पर जाती हूं। वहीं मेरी शाम गुजरती है। इन कार्यों को सही ढंग से पूरा करने के लिए मैं टाइम मैनेजमेंट का विशेष ध्यान रखती हूं।

इंटरव्यू : मुंबई से अमित कर्ण एवं स्मिता श्रीवास्तव,

दिल्ली से सीमा झा एवं विनीता