न जाने कितनी वैचारिक नावों में बैठकर यह असुविधाजनक प्रश्न कितनी ही बार पूछा जाता रहा है कि भारतीय विशेषकर हिंदी की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता धारा में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का स्थान क्या है? उनकी मनोभूमिका में आधुनिक जागरण-सुधारयुग के आंदोलनों की अन्त‌र्ध्वनियों की लय को अभिव्यक्ति का इतना प्रबल विस्फोट मिलता है कि आज भी उसे पाकर हम चकित रह जाते हैं। गुप्त जी के प्राणों में बैठकर कोई एक प्रदेश नहीं,पूरा अखंड देश बोला है। आज उनकी एक सौ पच्चीसवींजयंती पर क्यों उन्हें पुराणपंथी कहकर ठुकरा पाना संभव नहीं हो पाता है। कारण यह कि उनमें नये के प्रति अद्भुत आदर का भाव था। साथ ही नए को तर्क की कसौटी पर कसना भी वे आवश्यक समझते थे। वे जीवन भर यही गाते रहे- मैं अतीत नहीं भविष्य हूं आज तुम्हारा। आश्चर्य की बात है कि बीसवीं शतीब्दी के पांच दशक तक वे परम्परा-संस्कृति-इतिहास-राजनीति से नाता तोडे बिना युवतर पीढी के लिए चुनौती बने रहे। इसीलिए क्रांतिकारी विद्रोही रचनाकार अज्ञेय ने उन्हें अपना काव्यागुरु माना और इस प्रच्छन्न आधुनिक राष्ट्रकवि की आधुनिकता का नया पाठ-चिंतन किया।

गुप्त जी के लिए भारतीय होने का अर्थ था-समग्रता में देश-प्रेम,देश-भक्ति और मातृभूमि के प्रति पावन-पूजा का भाव। उनके लिए आज के लुम्पेन बुद्धिजीवी की तरह देश भक्ति, देश-प्रेम कोरे निरर्थक शब्द नहीं थे-जिन्हें आज का आधुनिक बुद्धिजीवी मुंह पर लाते हुए घबराता है- जैसे ये अपशब्द हों- एक सस्ती भावुकता या घटिया किस्म की गाली। गुप्त जी के लिए देश प्रेम एक घटना है निरंतर सार्थक प्रसंग। यही कारण है कि उनकी कृति भारत भारती,जयद्रथ वध,पंचवटी, जय भारत या साकेत-यशोधरा-विष्णुप्रिया का चिंतन वह देश -भक्ति रहा है जिसे न तो इतिहास से अंकित किया जा सकता है न भूगोल से लाया जा सकता है, वह देश के प्रति लगाव एक आदि अनंत स्पृति है जिसमें हमारी पुरखों की आभा निवास करती है, जिसमें निरंतर रामायण-महाभारत-गीता-बुद्ध-विवेकानंद,तिलक-गांधी का राग सुनाई देता है। मैथिलीशरण गुप्त की पूरी सृजन-चिंतन दृष्टि की लय का निर्माण राष्ट्र की सेकुलर-संकीर्ण अवधारणा से भिन्नता से हुआ है। यहां वेद-उपनिषद-रामायण-महाभारत-गीता, पुराण के प्रतीक-मिथक-बिंब अपने नए अर्थ संदर्भ देने में सहायक होते हैं। जिसकी अर्थवत्ता,राम-सीता,उर्मिला,कृष्ण-राधा,बुद्ध-यशोधरा.चैतन्य महाप्रभु-विष्णुप्रिया से सर्जनात्मक अर्थ पाती है। इस तरह देश-प्रेम व्यापक अर्र्थो में संस्कृति-परम्परा,स्मृति,जातीय चेतना.भक्ति की चेतना से जुडा है।

हम यह कैसेभूल सकते हैं कि आधुनिक हिंदी कविता की एक प्रबल प्रवृत्ति का नाम है-देशभक्ति। इसीलिए इस कविता को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक नाम देना उचित ही है। यह कविता प्रवृत्ति भारतेन्दु-द्विवेदी युग के साथ छायावाद में बेहद सर्जनात्मक रूप धारण करती है। यहीं देश से राग-अनुराग का आधार है-उत्साहण जिसमें समष्टि की प्रेरणा का विस्फोट है। मध्ययुग की कविता में व्यक्त वैयक्तिक शौर्य वीर की श्रेणी में आने पर भी देशभक्ति की श्रेणी में नहीं आता। उस युग राष्ट्रीयता की भावना का क्षेत्र संकुचित है। आधुनिक राष्ट्रीयता का प्रथम विद्रोह 1857 की स्वाधीनता संग्राम की क्रांति में मिलता है। इस भारतेन्दु युग में अनेक आंदोलन हुए तथा देशभक्ति में राजशक्ति का मेल रहा। दयानंद,राजा राममोहन राय, दादाभाई नौरोजी, विवेकानंद और तिलक जैसे लोकनायकों ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध देश को जागृत किया। पूरे देश में सांस्कृतिक-राजनीतिक जागरण की लहर दौड गई। विदेशी पराधीनता से मुक्ति का विचार साहित्य क्षेत्र में स्थायीभाव बन गया। इसी समय कवियों ने इतिहास-संस्कृति के गौरवगान गाये। राष्ट्रीयता ने कांग्रेस आंदोलन में नया अर्थ-प्रकाश पाया। भारतीय जनता की चेतना को जागृत करने के लिए विदेशी शासन के अंत का नारा तेज हुआ। इस नारे को मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर, सोहनलाल द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के साथ छायावाद युग के सभी कवियों-रचनाकारों ने स्वर दिया। राष्ट्रीय आंदोलन और साहित्य की अनुभूतियों में पहला सामंजस्य सत्याग्रह युग के रूप में सामने आया। इस युग के दो आच्छादन है-गांधी और रविन्द्र नाथ टैगोर।

मैथिलीशरण गुप्त जिस काव्य के कारण जनता के प्राणों में रच-बस गए और राष्ट्रकवि कहलाए, वह कृति भारत भारती है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में पहले पहल हिंदी प्रेमियों का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली पुस्तक भी यही है। इसकी लोकप्रियता का आलम यह रहा है कि इसकी प्रतियां रातोंरात खरीदी गई। प्रभात फेरियों, राष्ट्रीय आंदोलनों, शिक्षा संस्थानों ,प्रात:कालीन प्रार्थनाओं में भारत भारती के पद गांवों-नगरों में गाये जाने लगे। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका में कहा कि यह काव्य वर्तमान हिंदी साहित्य में युगान्तर उत्पन्न करने वाला है। इसमें यह संजीवनी शक्ति है जो किसी भी जाति को उत्साह जागरण की शक्ति का वरदान दे सकती है। हम कौन थे क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी? का विचार सभी के भीतर गूंज उठा। यह काव्य 1912 में रचा गया और संशोधनों के साथ 1914 में प्रकाशित हुआ। यह अपूर्व काव्य मौलाना हाली के मुसद्दस के ढंग का है। राजाराम पाल सिंह और रायकृष्णदास इसकी प्रेरणा में हैं। मूल बात यह है कि भारतीय साहित्य में भारत भारती सांस्कृतिक नवजागरण का ऐतिहासिक दस्तावेज है। भारत भारती की इसी परम्परा का विकास माखनलाल चतुर्वेदी, नवीन जी, दिनकर जी, सुभद्राकुमारी चौहान, प्रसाद-निराला जैसे कवियों में हुआ। देश पर गांधी चिंतन की घटा छायी हुई है और तमाम विरोधी स्वरों का आर्केस्ट्रा बज रहा है। गांधी जी से सुभाष टकराये और नवीन चेतना का प्रकाश पैदा हुआ। एक धारा गांधी-नेहरू समन्वय में है तो कम्युनिस्ट धारा राष्ट्रीय आंदोलन की निरर्थकता के विश्वास पर खडी है। लेकिन सोशलिस्टों का चिंतन गांधी के निकट आया। इस आरंभिक द्वंद्वात्मक चिंतन में क्रांति की तीव्रता है और शक्तिबाणों के छूटने की ध्वनि। खडी बोली स्वाधीनता संग्राम की तगडी भाषा है और देश का मानस मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, बच्चन, निराला में एक अपराजेय संकल्प से भरी गति का अनुभव कर रहा है। बच्चन का अग्निपथ, अग्निपथ वाला स्वर, निराला का जागो फिर एक बार का जागरण गान, माखनलाल चतुर्वेदी का मुझे तोड लेना वनमाली का बलिदानीसंकल्प तथा प्रसाद जी का स्वयं प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती की आवाज का एक नया संदेश लिए है। कवियों की रोमांटिक मनोभूमि अपराजेय संकल्प से भरी हुई है। इस समय गांधी का नेतृत्व क्रांतिकारी ही नहीं विस्मयकारी है। इसी से प्रेरणा पाकर माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, भगवतीचरण वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, बच्चन, नवीन जवानी की कविता लिखते हैं। यह जवानी की कविता कोरी भावुकता नहीं है, इसमें युग का यर्थाथ हीरे के क्रिस्टल की तरह कठोर और चमकदार है। जो तरंग मैथिलीशरण गुप्त की भारत भारती से उठी वो उसे आगे की राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक कविता एक सृजनशील अर्थ में बदल देती है।

पर प्रश्न उठता रहा है कि वे राष्ट्रकवि क्यों कहे गए? अन्य राष्ट्रीय कवियों को राष्ट्रकवि क्यों नहीं कहा गया? आज इस जिज्ञासामूलक प्रश्न का उत्तर यह है कि गुप्त जी को 1936 में मैथिली मान ग्रंथ भेंट करते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने राष्ट्रकवि की उपाधि से संबोधित किया। अध्यक्ष पद से गांधी जी ने मैथिली मान ग्रंथ भेंट करने के अवसर पर अतिशय विनोद भाव से कहा- मैं भी बनिया हूं, गुप्त जी भी बनिए हैं। राष्ट्र ने मुझे महात्मा बनाया है और वे राष्ट्रकवि हैं। सन् 1936 में काशी में यह अभिनंदनग्रंथ भेंट करने का समारोह हुआ था। इस अवसर पर काका साहेब कालेलकर ने गुप्त जी की अगवानी की थी। क्यों न करते? गुप्त जी वैदिक काल में जाकर नहुष लिखते हैं- बौद्ध काल में जाकर यशोधरा, रामायण-महाभारत काल में उनका मन रमता है जयद्रथ वधहो या जयभारत, पंचवटी हो या साकेत में। भक्तिकाल की चेतना में जाते हैं तो विष्णुप्रिया और सिखों के गुरुओं पर गुरुकुल, मुहम्मद साहब पर काबा-कर्बला,कार्ल मा‌र्क्स की पत्‍‌नी जैली पर लम्बी कविता राजपूत काल पर सिद्धराज तथा वर्तमान काल पर भारत-भारती, हिंदू आदि।

ऐसा कोई काल भारतीय साहित्य का नहीं है जिस पर गुप्त जी की कलम न उठी हो। उनमें बुंदेलखंड के आल्हा खंड की लय भी उठती है और भारत का मुक्ति-आंदोलन भी तरंगायित है। इस तरह वे हमारी जातीय स्मृति, जातीय अस्मिता के वर्तमान में सबसे बडे कवि हैं। ऐसा कवि ही राष्ट्रकवि हो सकता है जिसमें कोई एक प्रदेश न बोलकर पूरा देश बोलता है। यही कारण है कि गुप्त जी भारत के प्रथम और अंतिम राष्ट्रकवि थे। उनके लिए आज भी राष्ट्रकवि की अवधारणा सार्थक है क्योंकि हमारे कवियों की पीढियां उनके कंधे पर चढकर आगे बढी हैं।

आज गुप्तजी की कृतियों के इस उत्तर-आधुनिक समय में अन्त:पाठ की जरूरत है ताकि उन्हें डी-कान्स्ट्रक्ट या विनिर्मित किया जा सके। आज पश्चिमवाद का हमला हमारी जातीय-स्मृति को मिटाने पर आमादा है। इस कठिन समय में गुप्त जी ही हमें अपनी जडों की तलाश की ओर प्रवृत्त करते हैं। गुप्त जी के कृतित्व का सबसे बडा मूल्य है स्वाधीनता, स्वाधीन राष्ट्र और स्वाधीन चिंतन। इसी मूल्य के आकर्षण ने विद्रोही कवि अज्ञेय को उनका मानस शिष्य बनने पर विवश किया था।

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