जयपुर, मनीष गोधा। राजस्‍थान में नेता प्रतिपक्ष के चुनाव से दो दिन पहले राजस्‍थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति को राजस्थान भाजपा में बडे बदलावों की शुरूआत माना जा रहा है। पार्टी में एक बडा वर्ग इस नियुक्ति को राजस्थान से राजे की विदाई के रूप में देख रहा है और अब नए नेतृत्व की चर्चा होने लगी है, हा पर अभी तक राजे की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

राजस्थान में 13 जनवरी को नेता प्रतिपक्ष का चुनाव होना है और उसके दो दिन पहले पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा राजे को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। ऐसे में उनकी नेता प्रतिपक्ष के रूप में नियुक्ति की सम्भावना लगभग समाप्त मानी जा रही है और पार्टी सूत्रों की मानें तो अब संगठन में भी राजे का दखल समाप्त हो जाएगा और पार्टी नए स्वरूप में दिखेगी। हालांकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अपनी नियुक्ति पर राजे की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है और उनका अब तक का इतिहास यह रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्णय को उन्होंने आसानी से स्वीकार नहीं किया है।

पार्टी ने इस बार के चुनाव में हार के बावजूद उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया, यही कारण था कि चुनाव परिणाम के बाद से राजे की भूमिका को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। राजे की ओर से किसी तरह के संकेत भी नहीं थे कि वे किस भूमिका में रहने वाली है, हालांकि पार्टी में यह चर्चा लगातार बनी हुई थी कि इस बार उन्हें नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाया जाएगा और अब पार्टी नए चेहरे और टीम के साथ आगे बढेगी।

इसका बडा कारण पार्टी की हार और प्रदेश अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को लेकर 73 दिन तक चली खींचतान को बताया जा रहा था। अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में राजे की नियुक्ति के बाद पार्टी आलाकमान ने यह मंशा जाहिर कर दी है कि पार्टी यहां किसी नए चेहरे को लाना चाहती है।

हालांकि यह नया चेहरा लोकसभा चुनाव से पहले आएगा या बाद में इसे लेकर असमंजस की स्थिति है। पार्टी सूत्रोंं की मानें तो जिन दो नामों गजेन्द्र सिंह शेखावत और अर्जुन मेघवाल की पार्टी प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति की सबसे ज्यादा चर्चा है वे दोनों ही फिर से लोकसभा के टिकट के बडे दावेदार है। ऐसे में लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना मुश्किल है। इतना जरूर है कि इनमें से जिसे भी चुना जाता है, उसे चुनाव अभियान समिति के संयोजक पद जैसी कोई बडी जिम्मेदारी दी जा सकती है। विधानसभा चुनाव में गजेन्द्र सिंह शेखावत यह जिम्मेदारी सम्भाल चुके है। लोकसभा चुनाव के बाद संगठन में पूरा बदलाव हो सकता है।

15 वर्ष तक राजे का रहा राज-

राजस्थान में वसुंधरा राजे हालांकि विधायक और सांसद के रूप में पहले भी सक्रिय थी, लेकिन बड़े नेता के रूप में उनका आगमन नवम्बर 2002 में हुआ। पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व ने राजस्थान में भाजपा का पर्याय माने जाने वाले भैंरों सिंह शेखावत को उपराष्ट्रपति पद के लिए दिल्ली बुला लिया और वसुंधरा राजे यहां प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्त की गई।

इसके बाद से अब तक राजस्थान भाजपा में वसुंधरा राजे का एकछत्र राज रहा है। संगठन और सरकार दोनों ही उन्होने अपने हिसाब से चलाए है। वे दो बार मुख्यमंत्री, दो बार प्रदेश अध्यक्ष और एक बार नेता प्रतिपक्ष रहीं। उनके मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे ही लोग प्रदेश अध्यक्ष रहे जिन्हें वे चाहती थी। ऐसे में संगठन पर भी उनकी ही पकड रही, हालाकि पहले कार्यकाल में उन्हें जसवंत सिंह, घनश्याम तिवाडी, ललित किशोर चतुर्वेदी जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और संघ परिवार से जुडे नेताओं की नाराजगी का सामना भी करना पडा, लेकिन पार्टी पर उनकी पकड ढीली नही हुई, क्योकि हार के बावजूद पार्टी 2008 में 78 और 2018 में 73 सीटों का सम्मानजनक आंकडा हासिल कर गई।

 

Posted By: Preeti jha