जयपुर, जेएनएन। राजस्थान के रणथंभौर अभयारण्य में उपचार के दौरान बाघ टी 109 की मौत हो गई। शुक्रवार को बाघ का अंतिम संस्कार किया गया है। इलाके के लिए एक दूसरे बाघ टी 42 के साथ हुए संघर्ष में यह बाघ घायल हो गया था और 30 सितंबर से ही उपचार के लिए पिंजरे में बंद था। इसके शरीर पर 50 घाव थे, जिनमें संक्रमण हो गया था। उपचार के दौरान इसने गुरुवार की शाम दम तोड़ दिया।

ढ़ाई साल के इस बाध को वीरू के नाम से जाना जाता था। इसे बाघिन टी 8 ने जन्म दिया था। इसका पिता टी 34 था। इसके साथ जन्मे दूसरे नर बाघ का नाम जय है। इस तरह यह शोले के जय वीरू जैसी जोड़ी थी। वीरू मां के साथ कुंडाल वन क्षेत्र में आ गया था और अब अपने लिए अलग इलाके की तलाश में भटक रहा था। जंगल की सीमा पर जगह की तलाश मे इसका मुकाबला भैरूपुरा इलाके में बाघ टी 42 से हो गया। इसकी उम्र करीब 11 साल है। दोनों के बीच संघर्ष हुआ, लेकिन वीरू घायल हो गया और दौलतपुरा के पास एक आंवला के फार्म में घुस गया।

वन विभाग ने इसे वहां से रेस्क्यू किया और एनक्लोजर में रख कर इसका उपचार शुरू किया गया। यह उपाचर तीस सितंबर से चल रहा था। इस दौरान इसे एक बार पहले ट्रेक्युलाइज किया गया और फिर दोेबारा गुरुवार को ट्रेक्युलाइज किया गया। इसी दौरान इसकी मौत हो गई।

गौरतलब है कि इससे पहले जयपुर के नाहरगढ़ बोयोलॉजिकल पार्क में गत गुरुवार को सफेद बाघिन सीता की मौत हो गई थी। इस पार्क में पिछले सात दिनों में तीन बाघिनों की मौत हुई है। वन्यजीव विशेषज्ञों ने मौत का कारण कैनाइन डिस्पेंटर वायरस बताया है। अब पार्क में पांच बाघ बचे हैं। यहां सबसे पहले बाघिन सुजैन की मौत हुई थी। उसके बाद 21 सितंबर को 10 महीने की बाघिन रिद्धी की मौत हो गई थी और गुरुवार को सीता की मौत हुई। बाघिन की मौत की जानकारी मिलने के बाद वनमंत्री सुखराम विश्नोई ने वन विभाग से मामले की जानकारी मांगी है। उन्होंने अधिकारियों को वायरस से बचाव के लिए निर्देश दिए हैं।

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