जयपुर, नरेन्द्र शर्मा। उत्तरप्रदेश मंत्रिमंडल ने गैर कानूनी धर्म परिवर्तन अध्यादेश पर मुहर लगा दी। मध्यप्रदेश सरकार भी इसी तरह का कानून बनाने की तैयारी में जुटी हैं। लेकिन राजस्थान में पिछले 14 साल में इसी तरह का कानून बनाने को लेकर दो बार प्रयास हो चुके हैं। राज्य सरकार ने विधानसभा में विधेयक पारित करा कर दो बार तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास भेजा, लेकिन वहां से मंजूरी नहीं मिली।

ये विधेयक राष्ट्रपति भवन में अब भी लंबित है। 14 साल पहले तक धर्मपरिवर्तन के खिलाफ कानून बनाने की वकालात करने वाले राजस्थान के भाजपा नेता अब इस कानून को भूल गए हैं। ना तो तत्कालीन मुख्यमंत्री व मौजूदा भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुंधरा राजे और ना ही तत्कालीन गृहमंत्री एवं राज्य विधानसभा में वर्तमान विपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया ने विधेयक को राष्ट्रपति से मंजूरी दिलाने को लेकर कोई खास प्रयास करते नजर आए। दोनों नेताओं ने इस मुद्दे को लेकर एक बार भी वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से आग्रह नहीं किया।

दरअसल, जून 2006 में पहली बार वसुंधरा राजे की सरकार ने जबरन या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने के खिलाफ विधानसभा में विधेयक पारित कराया था। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार थी। कांग्रेस ने इस विधेयक को लेकर जोरदार ढंग से विरोध जताया था।

कांग्रेस विधायकों ने राज्यपाल व राष्ट्रपति को पत्र लिखे थे। भाजपा के नेताओं ने जयपुर से लेकर दिल्ली तक इस विधेयक की वकालात की थी। काफी जद्दोजहद के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कुछ संशोधन का सुझाव देकर विधेयक लौटा दिया था। इसके बाद फिर साल, 2008 में तत्कालीन वसुंधरा राजे सरकार पुराने विधेयक के स्थान पर नया धर्म स्वतंत्रता विधेयक पारित कराया था। यह विधेयक राज्यपाल के पास भेजा गया। लेकिन उस समय राज्यपाल एस.के.सिंह ने इस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया।

राज्य सरकार ने लगातार तीन बार विधेयक राज्यपाल के पास भेजा। ऐसे में आखिरकार राज्यपाल ने इस विधेयक को मंजूरी दी। इसके बाद विधेयक राष्ट्रपति भवन मंजूरी के लिए भेजा गया। लेकिन इस विधेयक को आज तक मंजूरी नहीं मिली। केंद्र में एनडीए सरकार और रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति होने के बावजूद अब तक इन विधेयकों को मंजूरी नहीं मिल सकी है।

वसुंधरा सरकार ने किए थे यह प्रावधान

वसुंधरा राजे सरकार के कार्यकाल में पारित विधेयक में प्रावधान किया गया था कि जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने के मामले में आरोपितों को एक से तीन साल तक की जेल और 25 हजार का जुर्माना देना होगा । विधेयक में प्रावधान किया गया था कि जिला कलेक्टर की अनुमति के बिना धर्म परिवर्तन नहीं हो सकेगा । हालांकि तक इस विधेयक को मंजूरी नहीं मिली है। 

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