जागरण संवाददाता, संगरूर : जैन साधू-साध्वियां भी सूर्य-चांद-धरती की तरह चलते रहते हैं, लेकिन इन दिनों चार महीने साधु-साध्वियां एक जगह पर ही ठहरते हैं। ये चार महीने ही क्यों, इस पर चर्चा करते हुए महासाध्वी समर्थ महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि इन दिनों में वर्षाऋतु शुरू होने के कारण जीव जंतु की उत्पति ज्यादा हो जाती है। इन दिनों ऐसे जीव निकलते हैं जो हमें आखों से दिखाई भी नहीं देते। उन जीवों की हत्या न हो इसलिए संत चार महीने (वर्षाकाल के) बाहर नहीं निकलते। भगवान महावीर का संदेश जीयो और जीने दो'-अहिंसा परमोधर्म की पालना करने व इस प्रवासकाल के दौरान ज्यादा से ज्यादा धर्म ध्यान करने की प्रेरणा देते हैं व स्वयं भी इनका पालन करते हैं। उन्होंने कहा कि चातुर्मास के प्रवास काल में पाप करने से हम बच जाते हैं। चातुर्मास काल में संत व्यापारी बनकर हम सभी को पाप कर्मो से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं, यह हम पर निर्भर करता है कि हमने उनसे कितना लेना है। महासाध्वी संबुद्ध महाराज ने कहा कि जहां आज चातुर्मास प्रारंभ होने जा रहा है, वहीं आज गुरु पूर्णिमा भी है। हमें आज अपने अपने गुरु की पूजा करनी चाहिए व उनका धन्यवाद करना चाहिए। वैसे तो साल भर में तीन पखी आती है, लेकिन उन तीनों में यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण है। साध्वी जी ने कहा कि गुरु हमारे जीवन का निर्माण करते हैं, यदि किसी कारणवश भगवान हमसे रूठ जाएं तो गुरु हमारी रक्षा करते हैं, लेकिन अगर गुरु रूठ जाए तो उन्हें भगवान भी नहीं मना सकते। जैसे दीपक को तेल, शरीर को भोजन की जरूरत पड़ती है, उसी तरह हमें अपने जीवन को चलाने के लिए गुरु की जरूरत होती है। साध्वी समर्थ महाराज ने फरमाया कि हमें रात्रि भोजन त्याग, रोजाना संत दर्शन, देखभाल कर चलना, घर की सफाई रखना, जरूरत के अनुसार ही रात्रि को लाइट का प्रयोग कम से कम करना, धर्म ध्यान करना, स्वाध्याय करना चाहिए। गुरु आज्ञा ही धर्म की पालना है। सहमंत्री सत भूषण जैन ने कहा कि आज से चातुर्मास प्रारंभ हो गया है। हमें इस अवसर पर ज्यादा से ज्यादा लाभ लेना होगा।

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