संवाद सूत्र, भादसों : 'कारगिल दी लड़ाई विच्च जाण लग्गे मेरा पुत्त मैंनू कैह गया सी कि ओह हुण वापस नहीं आऊगा। उस वेले मैंनू लग्गा सी कि शायद ओ ओदां ही एह गल्ल कैह रिहा ए, पर पता नहीं सी कि उस वेले गए मेरे पुत्त दी पिड विच्च लाश ही वापस आउगी'। आंखों में आंसू लिए कारगिल युद्ध में साल 1999 में शहीद हुए 24 वर्षीय नायक गुरमेल सिंह के पिता मेहर सिंह ने अपने पुत्र के कहे अंतिम शब्दों को रुंधे हुए गले से कुछ यूं बयां किया।

रोते हुए मेहर सिंह ने बताया कि उनके चार बेटों में दो बेटे सेना में भर्ती हुए थे। कारगिल में शहीद हुआ गुरमेल सिंह तीसरे नंबर पर था। चौथा पुत्र जसवंत सिंह भी सेना में था, जो कारगिल में गुरमेल सिंह की शहादत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाया और सेना की नौकरी छोड़कर वापस गांव आ गया था। वह इन दिनों गांव में ही खेती करके गुजारा कर रहा है। जसवंत के सेना छोड़ने का उन्होंने दुख भी जताया। मेहर सिंह ने कहा कि उन्हें गुरमेल सिंह पर गर्व है कि उसने अपने देश पर कुर्बान होकर न केवल परिवार का सीना चौड़ा किया बल्कि पंजाबियों की बहादुरी की मिसाल भी दी है। गुरुद्वारे में हुआ था गुरमेल का अंतिम संस्कार

मेहर सिंह ने बताया कि गुरमेल सिंह की शहादत के बाद उसका पार्थिव शरीर जब गांव आया था तो गांव में मातम छाया हुआ था। गांव के किसी घर में चूल्हा नहीं जला था। गांव के गुरुद्वारा साहिब में उसका अंतिम संस्कार किया गया और उसकी याद को ताजा रखने के लिए गांव में उसकी प्रतिमा भी स्थापित की गई। उसके बाद गांव के प्रवेशद्वार पर एक गेट बनाया गया था, जिसकी हालत आजकल खस्ता है। उन्होंने कहा कि वह पंजाब सरकार से मांग करते हैं कि उक्त गेट की मरम्मत करवाकर उसे सुंदर बनाया जाए, ताकि गुरमेल की कुर्बानी हमेशा याद रहे।

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