बठिंडा, जागरण संवाददाता: मानसा सड़कों पर जरा-सी लापरवाही बड़ी दुर्घटना का कारण बन जाती है, लेकिन इनमें से ज्यादार हादसे लापरवाही के कारण ही होते हैं। यह लापरवाही तेज रफ्तार, रैष ड्राइविंग या किसी अन्य कारण भी सकती है। वहीं हादसे के बाद उन्हें जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाने और इलाज की सुविधा हो, इसके लिए राज्य सरकार व जिला प्रशासन की बड़ी भूमिका होती है।

प्रशासन की जिम्मेवारी होती है कि अगर कोई हादसा हो जाए तो मौके पर हर प्रकार की सुविधा मुहैया करवाई जाए, लेकिन बठिंडा व मानसा जिलों में ऐसा नहीं हो रहा है। यहां पर अगर कोई हादसा हो भी जाता है तो उसके बाद पीड़ित व्यक्ति की जान बचाने की जिम्मेवारी परिवार वालों की ही रह जाती है।

हालांकि समाजसेवी संस्थाएं अपनी एंबुलेंस के जरिए पीड़ितों को अस्पताल तो पहुंचा देती हैं, लेकिन प्रशासन द्वारा इस पर ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई जाती। नतीजा, किसी न किसी के घर का चिराग बुझ जाता है। वहीं इन हादसों पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जिला स्तरीय कमेटियों का गठन करने के आदेश जारी किए हैं। ऐसी ही कमेटी का गठन बठिंडा और मानसा में भी किया गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर इन कमेटियों की गतिविधियां अब तक शून्य ही हैं।

दरअसल, सड़क सुरक्षा को लेकर डीसी की अगुआई में गठित की गई कमेटी केवल मीटिंगों तक ही सीमित होकर रह गई है। मीटिंग भी इसलिए हो जाती है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष सभी राज्यों को जिला स्तर पर रोड सेफ्टी कमेटियों का गठन करने के आदेश देते हुए कहा था कि यह कमेटियां हर 15 दिन पर आनलाइन और एक माह में आपस में बैठक जरूरी करेंगी।

वहीं आदेश थे कि उनके जिले में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का डाटा आनलाइन अपलोड किया जाएगा। बड़ी दुर्घटनाओं की फारेंसिक जांच की व्यवस्था भी की जाएगी और अस्पताल और एंबुलेंस का समन्वय भी करना होगा, लेकिन दोनों जिलों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश सिर्फ मीटिंग तक ही सीमित है।

पुराने सिस्टम पर काम, न सड़कों का रख-रखाव और न ही कोई कार्रवाई बठिंडा के डीसी शौकत अहमद परे का दावा है कि रोड सेफ्टी कमेटी का गठन हुआ है और बैठकें भी हो रही हैं। अगर मान भी लिया जाए कि रोड सेफ्टी कमेटी की बैठकें हो रही हैं तो भी जमीनी स्तर पर सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए किए गए कोई भी प्रयास दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। सड़कें बदहाल हैं। जिले में स्पीड इंटरसेप्टर नहीं हैं।

ओवरस्पीड के चालान नहीं हो रहे। सड़कों पर स्कूलों के बाहर अधिकतर स्थानों पर स्पीड लिमिट के बोर्ड या स्पीड ब्रेकर नहीं हैं। तीखे मोड़ों और टूटे हुए पुलों के बताने के लिए साइन बोर्ड तक नहीं हैं। सड़क हादसों में घायलों के इलाज के लिए एक भी सरकारी ट्रामा सेंटर नहीं है। जिला स्तर पर कमेटी तो बनी है। मगर पुराने सिस्टम के अनुसार ही काम हो रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार बैठकें ज्यादा करनी होती हैं। करीब साल पहले तक बैठके रेगुलर होती थीं, लेकिन अब पिछले आठ महीने से जिलों में रेगुलर बैठकें भी नहीं हो रहीं। यहां तक कि जिले में न तो सड़क दुर्घटनाओं का डाटा आनलाइन अपलोड किया जा रहा है और न ही दुर्घटनाओं की कोई फारेंसिक जांच हो रही है।

मीटिंग में सड़क सुरक्षा नहीं

स्कूल बसों के चालान पर ही चर्चा जिला प्रशासन की ओर से बनाई गई कमेटी की बैठक तो की जाती है, लेकिन इसमें सुधार करने के बजाय हर बार स्कूली वैनों व बसों की जांच पर ही बात की जाती है। इसके बाद संबंधित सब डिवीजनों में जगह-जगह पर नाके लगाकर चेकिंग कर स्कूली बसों के चालान काट दिए जाते हैं।

इसमें संबंधित एसडीएम व आरटीए के अलावा ट्रैफिक पुलिस के अधिकारी शामिल हैं, लेकिन यह कमेटी सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए कैसे काम करना है, इस पर कोई चर्चा नहीं करती। नतीजा, आज भी यही है कि सड़कों पर होने वाले हादसों में हर रोज वृद्धि हो रही है। इसमें कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। अगर समाजसेवी संस्थाओं के आंकड़ों के अनुसार देखा जाए तो हर रोज तीन से चार हादसे हो रहे हैं, जिसमें कई लोग घायल होते हैं, लेकिन इन छोटे-मोटे हादसों को भी रोकने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जा रहा।

इनका कहना है 

रोड सेफ्टी कमेटी की बैठक नियमित हो रही है। पिछली बैठक में संबंधित विभागों को काम करने के लिए बोला गया है, जिन्होंने इस पर काम भी किया है। इसके अलावा बैठक में डीएसपी ट्रैफिक से भी कहा गया था कि तेज गति के चालान काटे जाएं, क्योंकि तेज गति से अधिकतर हादसे होते हैं। उनसे यह भी कहा गया था कि चाहे कितना भी महंगा हो, स्पीड इंटरसेप्टर खरीद लें। यह अलग बात है कि अब तक स्पीड इंटरसेप्टर नहीं आ सके। इस बैठक में सड़कों पर घूमने वाले बेसहारा पशुओं को लेकर भी बात हुई थी। शौकत अहमद परे, डीसी बठिंडा

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