बठिंडा/मानसा, जागरण टीम: सड़कों पर आए दिन हादसे हो रहे हैं। इनमें कई घरों के चिराग बुझ रहे हैं। सहारा छिन रहा है। हादसे के तुरंत बाद अगर गंभीर घायलों को समय पर किसी की मदद मिल आए और उसे अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो हादसों में होने वाली मौतों के कुछ कम किया जा सकता है।

इसके लिए जरूरी है कि आसपास मौजूद लोग घायलों की मदद करें, लेकिन किसी कानून अड़चन में फंसने के डर से लोग मदद के लिए जल्द आगे नहीं आते। हालांकि कुछ लोग घायलों की मदद के लिए तुरंत आगे आते हैं और किसी घर के बुझ रहे चिराग को फिर से रोशन करते हैं। ऐसे लोगों को प्रोत्साहित किया जाना बेहद जरूरी है, लेकिन जिले में सड़क दुर्घटना के पीड़ितों की मदद के लिए अलग से कोई राहत कोष नहीं रखा गया है।

आम लोगों को सड़क हादसों के पीड़ित लोगों की मदद के लिए प्रेरित करने के लिए राज्य या जिला स्तर पर किसी तरह का कोष शुरू नहीं किया गया। यही कारण है कि आमतौर पर सड़क दुर्घटनाओं में घायल पीड़ित मदद के लिए तड़पते रहते हैं, लेकिन बहुत कम लोग आगे आते हैं। मदद करने वालों से लेकर आर्थिक सहायता करने वालों की उदासीनता ही इसका प्रमुख कारण है।

हालांकि मौजूदा पंजाब सरकार ने अपने पहले बजट में दिल्ली की तर्ज पर फरिश्ते योजना का ऐलान तो किया था, लेकिन इसको आज तक लागू नहीं किया गया। वहीं डीसी शौकत अहमद परे सुलेक्षम स्कीम तथा अदालत में केस जाने के बाद सुनाए जाते फैसले के आधार पर डीएलएसए (डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसिस अथारिटी) के माध्यम से अनुदान दिए जाने का दावा करते है, लेकिन जानकारी के अभाव में लोग इस स्कीम के तहत आवेदन ही नहीं करते।

राज्य सरकार की फरिश्ते स्कीम का इंतजार राज्य में सड़क हादसों के पीड़ितों की मदद करने वालों के लिए सरकार की ओर से कोई योजना नहीं है। हालांकि राज्य की आप सरकार ने दिल्ली सरकार की तर्ज पर फरिश्ते योजना चालू करने की घोषणा की है, परंतु अभी तक इसकी नोटिफिकेशन जारी नहीं हुई।

सड़क हादसों में जख्मियों की मदद करने से अधिकतर लोग पुलिस की पूछताछ और अदालत के चक्करों के चलते गुरेज करते हैं। अस्पताल में दाखिल कराने के दौरान घायल परिवार का कोई सदस्य मौजूद न होने के कारण मदद करने वाले को दवाओं पर खर्च भी खुद ही करना पड़ता है और दवाओं के लिए भाग दौड़ भी करनी पड़ती है।

कई बार तो ऐसा भी होता है कि जख्मी व्यक्ति के परिवार के लोग अस्पताल में दाखिल कराने वाले को ही आरोपित मान लेते हैं। सुलेक्षम फंड के लिए भी करनी पड़ती है मशक्कत केंद्रीय मोटरयान अधिनियम के तहत दिए जाने वाले मुआवजे के लिए लोगों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है, जबकि हादसे के छह महीने के भीतर मुआवजा जारी करने का प्रावधान होने के बाद भी 2-2 साल तक लोग दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हो गए हैं। इसके बाद तब जाकर मरने वालों के परिवार को मुआवजा मिलता है।

हालांकि केंद्र सरकार की ओर से एक अप्रैल से नियम में बदलाव करते हुए मरने वाले के परिवार को 25,000 के बजाय दो लाख व जख्मी के परिवार को 12,500 की जगह 50 हजार रुपये का मुआवजा देने का ऐलान किया गया है। यह मुआवजा लेने के लिए कागजी कार्रवाई इतनी ज्यादा है कि लोग अप्लाई ही नहीं करते या फिर जो अप्लाई करता है, वह अपनी फाइल कागजात पूरे न होने पर वापस ले लेते हैं। इसके अलावा जागरूकता की कमी के कारण भी लोग अप्लाई नहीं कर रहे हैं।

बठिंडा में बीते सात साल के दौरान कुल 53 लोग ही इसका लाभ ले पाए हैं। मगर अधिकारी रिपोर्ट में देरी होने का तर्क देकर मुआवजा देरी से आने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। वहीं मानसा में बीते दो सालों से किसी ने अप्लाई नहीं किया। केवल एंबुलेंस 108 के भरोसे रहते हैं गंभीर घायल सड़क दुर्घटना के दौरान पीड़ितों की मदद लोग चाहकर भी नहीं कर पाते। ऐसे में वे एंबुलेंस 108 को फोन कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर देते हैं। वहीं गंभीर हालत में पड़े घायल लोग एंबुलेंस आने का इंतजार करते रहते हैं।

घायलों की मदद करने वालों के लिए किसी तरह का अलग से कोष न होने के बीच पुलिस द्वारा घायलों की मदद के लिए किए जाते प्रयास नाकाफी हैं। सड़क दुर्घटना के दौरान 108 एंबुलेंस में पीड़ितों को सिविल अस्पताल पहुंचाने के बाद घटना की रिपोर्ट तैयार करने तक सीमित पुलिस द्वारा भी पीड़ित की मदद के लिए व्यापक प्रबंध नहीं किए जाते हैं।

लोगों को प्रेरित करने के लिए नहीं किए कोई प्रयास - जिला प्रशासन हादसों के बाद पीड़ितों की मदद करने या उनकी मदद के लिए लोगों को प्रेरित करने के बजाय मीटिंगों तक सीमित होकर रह गया है, लेकिन इसमें भी केवल औपचारिकता पूरी की जाती है।

सड़क दुर्घटना के पीड़ितों के लिए कोई चर्चा नहीं की जाती। न ही उनकी मदद करने वालों के लिए कोई फंड बनाने पर चर्चा होती है, जबकि अगर इन मीटिंगों में ऐसे मुद्दों पर विचार को तो पीड़ितों की मदद के लिए लोग जरूर आगे आएंगे।

सुपर स्पेशलिस्ट अस्पतालों का पैनल तैयार करने की जरूरत - सड़क दुर्घटना के दौरान पीड़ितों को तुरंत उपचार दिए जाने की जरूरत है। ऐसे में सरकार व जिला प्रशासन को हर जिले में सुपर स्पेशलिस्ट अस्पतालों का पैनल तैयार करके उन्हें ऐसे मरीजों के उपचार के निर्देश देने चाहिए। सड़क दुर्घटना के पीड़ितों के उपचार का खर्च करने के लिए अलग से कोष की जरूरत है ताकि उनकी मदद में आर्थिक सहायता करने वालों को भी रिफंड मिल सके।

हादसे में पीड़ितों की मदद करने वालों के लिए कोई फंड नहीं

डीसी डीसी शौकत अहमद परे के मुताबिक सड़क हादसों में पीड़ितों के लिए राज्य सरकार की कोई योजना नहीं है, लेकिन केंद्रीय मोटरयान अधिनियम के तहत मरने वाले के परिवार को दो लाख व जख्मी को 50 हजार रुपये का मुआवजा मिलता है। वहीं हादसे के दौरान पीड़ितों की मदद करने वालों के लिए कोई फंड नहीं बनाया गया है।

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