पंजाब के इस गांव में दशहरे पर नहीं जलता रावण, लोग करते हैं लंकेश की पूजा; आखिर क्या है वजह?
लुधियाना के पायल कस्बे में करीब 190 साल पुराना रावण मंदिर है। यहां दहन की बजाय रावण की पूजा होती है, जिससे संतान प्राप्ति की मान्यता जुड़ी है।

गांव पायल में तैयार रावन की प्रतिमा।
HighLights
पायल में 190 साल से दशहरे पर रावण पूजा की परंपरा।
संतान प्राप्ति के लिए 25 फीट ऊंचे रावण बुत की पूजा।
श्रीलंका सरकार ने मंदिर को पर्यटन स्थल बनाने का प्रस्ताव दिया।
मुनीश शर्मा, पायल (लुधियाना)। दशहरा आते ही देशभर में रावण के पुतले जलाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, लेकिन पंजाब के लुधियाना जिले के पायल कस्बे के एक गांव में परंपरा इसके बिल्कुल उलट है। यहां रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि उसकी पूजा-अर्चना होती है। करीब 190 साल पुरानी इस परंपरा से जुड़ा 25 फीट ऊंचा रावण का पक्का बुत श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
मान्यता है कि यहां पूजा करने से संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है। इस मंदिर की खासियत केवल रावण की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी ऐतिहासिक कहानियां, अनूठी धार्मिक मान्यताएं और बुराई को समाप्त करने का संदेश भी इसे अलग पहचान देते हैं। मंदिर के कायाकल्प और धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने को लेकर श्रीलंका सरकार की ओर से प्रस्ताव दिए जाने की बात भी सामने आई है।
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मंदिर के बारे में जानकारी देते हुए जागरण संवाददाता मुनीश शर्मा।
दो शताब्दियों पुराना मंदिर
पायल के इस मंदिर का इतिहास करीब दो शताब्दियों पुराना बताया जाता है। मंदिर के पुजारी समर लाल के अनुसार हकीम बीरबल दास के दो विवाह हुए थे, लेकिन उन्हें संतान नहीं हुई। इससे दुखी होकर उन्होंने संन्यास ले लिया। इसी दौरान उनकी मुलाकात एक संत से हुई, जिन्होंने उन्हें श्रीरामलीला का आयोजन करने और पारिवारिक जीवन में लौटने के लिए प्रेरित किया।
संत की बात मानकर वह लौट आए और दशहरे के दिन उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। मान्यता के अनुसार उनके पुत्र ने बड़े होकर वर्ष 1833 में पायल में श्रीराम मंदिर का निर्माण करवाया। रावण के प्रति आस्था के चलते यहां उसकी करीब 25 फीट ऊंची पक्की प्रतिमा स्थापित करवाई गई, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस परंपरा को जीवित रख सकें।
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संतान प्राप्ति की कामना से पहुंचते हैं श्रद्धालु
इस मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, रावण की प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना करने से संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी होती है। इसी विश्वास के चलते श्रद्धालु यहां पहुंचकर माथा टेकते हैं और आशीर्वाद मांगते हैं। दशहरे पर भी यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है।
प्रतिमा परंपरा का स्थायी प्रतीक है। हर साल नया पुतला तैयार करने के बजाय पुराने पक्के बुत पर रंग-रोगन करके उसे सजाया जाता है। इस तरह यह प्रतिमा मंदिर के इतिहास और स्थानीय आस्था की पहचान बनी हुई है।
प्रतिमा पर चढ़ती है शराब और बकरे के खून
मंदिर में रावण की पूजा से जुड़ी कुछ ऐसी परंपराएं भी हैं, जो इसे अन्य धार्मिक स्थलों से अलग बनाती हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कुछ श्रद्धालु प्रतिमा पर सांकेतिक रूप से शराब और बकरे का खून चढ़ाते हैं। कुछ लोग अपनी मनोकामना पूरी होने की आस में उंगली से खून चढ़ाने की परंपरा भी निभाते हैं।
इन प्रथाओं को रावण की राक्षस वंश से जुड़ी मान्यताओं के साथ जोड़कर देखा जाता है। हालांकि ये स्थानीय धार्मिक परंपराएं हैं और सभी श्रद्धालु इन्हें एक समान तरीके से नहीं निभाते।
श्रीलंका सरकार भेज चुकी प्रस्ताव
पायल के इस ऐतिहासिक मंदिर को धार्मिक पर्यटन के नक्शे पर प्रमुख स्थान दिलाने की संभावनाओं को लेकर भी चर्चा है। श्रीलंका सरकार की ओर से मंदिर के नवीनीकरण और इसकी ऐतिहासिक प्रतिमा के संरक्षण के लिए तकनीकी और वित्तीय सहयोग का प्रस्ताव दिया गया है।
इसे रामायण सर्किट के तहत धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना से भी जोड़ा जा रहा है। यदि इस दिशा में औपचारिक पहल आगे बढ़ती है, तो मंदिर की ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित करने के साथ-साथ क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है।
इंसान को नहीं, बुराइयों को खत्म जरूरी
मंदिर प्रबंधन कमेटी के सदस्य गुरदीप सिंह काली का कहना है कि वह बचपन से इस मंदिर में आते रहे हैं। उनके अनुसार, यहां की परंपरा का उद्देश्य यह संदेश देना है कि किसी व्यक्ति को खत्म करने के बजाय उसकी बुराइयों को समाप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
उनका कहना है कि रावण विद्वान था और वेदों का ज्ञाता था, लेकिन उसके एक गलत कर्म ने उसकी पहचान को बदल दिया। इसलिए यहां रावण का दहन नहीं किया जाता। हालांकि, रामलीला के मंचन के माध्यम से लोगों को गलत कार्यों के परिणामों के प्रति जागरूक किया जाता है।
बुराइयों से दूर रहने का संदेश
श्रद्धालु यशपाल वैद्य के अनुसार, इस प्रतिमा के माध्यम से लोगों को बुराइयों का अंत करने और अच्छे कर्मों की राह पर आगे बढ़ने का संदेश दिया जाता है। उनका कहना है कि रावण विद्वान और पंडित था, लेकिन उसके एक कर्म के कारण उसे बुराई के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा।
वह कहते हैं कि पंडित होने के नाते वे रावण की आराधना करते हैं। उनके अनुसार, इस परंपरा का संदेश है कि किसी व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व को उसके एक गलत कार्य तक सीमित करने के बजाय उसके अच्छे गुणों को भी समझना चाहिए और अपनी गलतियों से सीख लेनी चाहिए।
