लुधियाना, [अश्विनी पाहवा]। बच्चे को जब पीड़ा हो तो मां को भी तकलीफ होती है। अगर बच्चा खुश है तो मां के चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है। मां उसे हमेशा दुख व पीड़ा से बचाती है। लुधियाना के सिविल अस्पताल की स्टाफ नर्स पूजा जब आइसोलेशन वार्ड में ड्यूटी के दौरान कोरोना पाजिटिव हो गईं तो उन्होंने अपने चार साल के बेटे अंगद को सुरक्षित रखने के लिए बीस दिन खुद से दूर रखा। पूजा कहती हैं कि 15 सितंबर को उन्हें बुखार हुआ और शरीर में दर्द रहने लगा। कोविड टेस्ट की रिपोर्ट पाजिटिव आई।

दस दिन वे अस्पताल में भर्ती रहीं। परिवार में बुजुर्ग सास, पति और चार साल का बेटा अंगद है। कोविड वार्ड में किसी को आने की इजाजत नहीं थी। ऐसे में रोज वीडियो काॅल कर बेेटे से बात करती थी। दस दिन बाद जब घर पहुंची तो बेटा गले लगने के लिए दौड़कर आया लेकिन मैंने उसे दूर ही रोक दिया। मेरी ममता उसे सीने से लगाने के लिए कहती रही लेकिन बेटे को कोरोना से बचाने के लिए मैं ऐसा नहीं कर सकती थी।

दस दिन घर पर भी खुद को एकांतवास में रखा। बेटे को शीशे के दरवाजे से देखती थी। कई बार बेटा इशारों में मुझे अपने प्यार का अहसास करवाता। मैं भी उसे इशारों में यही बताती कि जल्द ही उसे गले लगाऊंगी। इन सावधानियों से परिवार सुरक्षित रहा।

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मां हूं, बेटियों के साथ रहने का मन तो करता है

 सिविल अस्पताल के कोविड सेंटर में हर शख्स जाने से परहेज करता है। उन्हें डर लगता है कि कहीं उन्हें भी कोरोना न हो जाए, लेकिन इस सेंटर में लगातार पिछले एक साल से ड्यूटी दे रही स्टाफ नर्स प्रभजोत कौर के जज्बे को सलाम है। दो बेटियों की मां हैं लेकिन महामारी के दौर में उनके लिए फर्ज भी जरूरी है। जिम्मेदारी बढ़ गई है। संक्रमण से बचाव के लिए परिवार की चिंता भी लगी रहती है। प्रभजोत कहती हैं कि हमारा पेशा ही मरीजों की सेवा करना है। मरीज जब तंदरुस्त हो जाता है तो इससे खुद को शांति मिलती है। कभी-कभी दोनों बेटियों की चिंता सताती है। एक बेटी छह और दूसरी बारह साल की है। हालांकि अब काफी समझदार हैं और अपनी मां की जिम्मेदारियों को समझ लेती हैं।

बेटियों के साथ समय बिताने का करता है मन

मां हूं... बेटियों के साथ रहने उनके साथ समय बिताने का मन करता है। कई बार वक्त ऐसा होता है जब मां की ममता को दबाना पड़ता है। कोरोना मरीजों की ड्यूटी के कारण प्रभजोत घर पहुंचने के बाद भी काफी समय बच्चों से दूर रहती हैं। खुद को अच्छी तरह सैनिटाइज करने के बाद ही बेटियों से मिलती हैं। उन्हें ही कोरोना संक्रमित मरीजों की दवाई,  फाइल वर्क और रिपोर्ट इकट्ठा करती होती है। कोविड सेंटर में मरीजों के बीच रहते हुए एक बार वह खुद भी संक्रमित हो चुकी हैं। ऐसे समय में एक मां का बच्चों से दूर रहना बहुत मुश्किल था। हिम्मत नहीं हारी। कोरोना को हराया और फिर से अपने फर्ज को निभाने के लिए तैयार हो गईं।

Edited By: Vipin Kumar