जालंधर, जेएनएन। वाल्मीकि गेट और नीलामहल गेट के बीच की दूरी बहुत कम है। पुराने नगर के बाहर का यह क्षेत्र बिल्कुल समतल मैदान था और आक्रमणकारियों से लोहा लेने के लिए इन्हीं गेटों से जालंधर के वीर योद्धा दुश्मन पर टूट पड़ा करते थे। जालंधर एक ऊंचे टीले पर बसा था। यहां से दुश्मन पर नजर रखना भी जरूरी समझा जाता था। चौदहवीं शताब्दी तक यह क्षेत्र कई छोटी-बड़ी लड़ाइयां देख चुका था। यवन आक्रमणकारी जब भी इस नगर को लूटने के लिए आते तो जालंधर के नगर रक्षक उन्हें भागने पर विवश कर देते थे। यहां बने महल की चारदीवारी को नीले रंग से रंग दिया गया था, इसी से इसका नाम नीलामहल हो गया। इस महल में बीस (20) के करीब शयन कक्ष थे। महल में बड़ा सा हॉल था, जिसमें बैठ कर नगर का मुखिया एवं अन्य नगर सेठ अपने मेहमानों से चर्चा कर लिया करते थे।

नीलामहल गेट की ऊंचाईं 14-15 फीट और चौड़ाई लगभग दस (10) फीट थी। यह गेट बीसवीं शताब्दी के आरंभिक काल के आसपास गिर गया था। इसका एक रास्ता जट्टपुरा नामक मोहल्ले से होता हुआ वाल्मीकि गेट और इमाम नासिर तक जाता है। इस गेट के अवशेष बहुत समय तक दिखाई देते रहे, जहां आजकल एक बेकरी की दुकान है। उसके पास मीनार हु्आ करता था, जिस पर से सुरक्षाकर्मी दूर-दूर तक नजर रखा करते थे। हर आने वाले की सूचना अपने अधिकारियों को पहुंचाया करते थे। आज से 40 वर्ष पूर्व तक वह मीनार मौजूद था। काश पुरातत्त्व विभाग उसे संभालने का दायित्व निभाता तो आने वाली पीढिय़ां एक ऐतिहासिक धरोहर के दर्शन कर लेती।

 

लाहौर से आने वालों के लिए बना था लाहौरी गेट

इस गेट की मौजूदगी कुछ लोग पुरानी सब्जी मंडी के स्थान पर मानते हैं। इसे लाहौरी गेट इसलिए कहा जाता था, क्योंकि लाहौर से आने वाले अधिकतर लोग इसी रास्ते से नगर में प्रवेश करते थे। कई नगर सेठ इसी द्वार के निकट ही रहना पसंद करते थे, क्योंकि इसके सामने का मार्ग बहुत खूबसूरत हुआ करता था। उस मार्ग के दोनों किनारों पर फलदार वृक्ष हुआ करते थे। जिनकी मनभावन सुगंध इस गेट के रास्ते से होकर नगर में प्रवेश करती थी। इस गेट का निर्माण 19वीं शताब्दी का आरंभिक काल माना जाता था। इसे बनाने में पत्थरों का प्रयोग भी किया गया था। इसके बिल्कुल ऊपर एक मचान भी बनाई गई थी। जिस पर से कर्मचारी दिन-रात पहरा देते थे।

लाहौरी गेट 1934 में गिर गया था । अंग्रेज शासकों को यह गेट फूटी आंख भी नहीं सुहाता था। जब क्वीन विक्टोरिया ने जालंधर को अपने अधीन कर लिया, तब यहां के रहने वाले सेठ साहूकारों ने अंग्रजों की खुशी में कोई भाग नहीं लिया था। कुछ लोग कहते हैं कि यहां के सेठों ने इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा था और इस गेट पर काला झंडा लगा दिया था। इसलिए उन्होंने इसे गिरवा दिया। आज लाहौरी गेट के निशान तक ढूंढने से नहीं मिलते हैं। 

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Posted By: Pankaj Dwivedi

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