जालंधर [मनोज त्रिपाठी]। Coronavirus prevention device: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) जालंधर ने फर्श से कोरोना वायरस (Coronavirus Covid19) की सफाई वाला पहला स्वदेशी उपकरण तैयार किया है। अल्ट्रावायलेट किरणों (Ultraviolet rays) के जरिये उपकरण फर्श से कोरोना सहित सभी वायरस व बैक्टीरिया को मार देता है। NIT के उपकरण की खूबियों को देखते हुए वड़ोदरा की कंपनी यूकोमैक्स ने NIT से करार करके सरफेस यूवीसी के नाम से इसे बाजार में लांच भी कर चुकी है।

इससे पहले कुछ अंतरराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निर्मित इस प्रकार का उपकरण ऑनलाइन बाजार में उपलब्ध हैं, लेकिन फर्श की सफाई के लिए वे कामयाब नहीं हैं। सभी में अल्ट्रावायलेट किरणों के जरिये ही रिजल्ट दिए जा रहे हैं। NIT का दावा है कि दुनिया में अभी तक अल्ट्रा वायलेट किरणों के जरिए कोरोना व अन्य प्रकार के वायरस व बैक्टीरिया को फर्श पर सौ फीसद मारने वाले किसी भी उपकरण का पेटेंट नहीं किया गया है।

यह पहला उपकरण है, जो फर्श पर सौ फीसद रिजल्ट देता है। इसका निर्माण NIT के डायरेक्टर डॉ. ललित कुमार अवस्थी व रैंचो के नाम से प्रसिद्ध इंस्ट्रूमेंटल व कंट्रोल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कुलदीप सिंह नागला ने किया है। डॉ. अवस्थी ने बताया कि यह उपकरण कोराना काल में वायरस व बैक्टीरिया को मारने में मील का पत्थर साबित होगा।

डॉ. नागला ने बताया कि डिवाइस का आइडिया डायरेक्टर डॉ. ललित कुमार को आया। फिर दोनों ने मिलकर दुनिया भर में अल्ट्रावायलेट किरणों का इस्तेमाल करके कोरोना को मारने को लेकर तैयार उपकरण के पेटेंट की रिसर्च की। इसके बाद सामने आया कि अभी तक स्पेशली फर्श व कारपेट को लेकर सौ फीसद सुरक्षित परिणाम देने वाली कोई भी उपकरण पेटेंट नहीं हुआ है। उसके बाद दो दिन में लोकल मार्केट से संबंधित सामग्री लेकर इसका निर्माण कर डाला। पहले NIT में इसका प्रशिक्षण किया। फिर पेटेंट के लिए भेजा। वहां से क्लीयर होने के बाद वडोदरा की कंपनी ने इससे संबंधित उत्पाद बनाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार दिया। इसकी कीमत 9500 से 15,000 रुपये है।

सी टाइप की अल्ट्रा वायलेट किरणें निकलने से ज्यादा असरदार

इस उपकरण से सी टाइप की अल्ट्रा वायलेट किरणें निकलती हैं। अन्य में ए व बी टाइप की निकलती हैं। अल्ट्रा वायलेट किरणें तीन तरह की होती है। ए में 315 से 400 नैनो मीटर तक वेब लेंथ होती है। यह ओजोन लेयर में समाती नहीं है। इसलिए हानिकारक होती है, लेकिन कुछ उत्पादों में इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। बी में 280 से 315 नेनौमीटर वेबलेंथ होती है। ज्यादा वेबलेंथ होने की वजह से यह भी हानिकारक होती है। सी में 100 से 280 नेनौमीटर वेबलेंथ होती है। कम वेब लेंथ होने की वजह से इसमें ए व बी की तुलना में कई गुना ज्यादा एनर्जी होती है। इसलिए यह सबसे ज्यादा तेज व असरदायक है। इसे जर्मी साइडर भी कहते हैं। अभी तक सी टाइप की किरणों का इस्तेमाल वायर प्यूरीफायर में किया जाता रहा है।

यहां कर सकते हैं इस्तेमाल

हर प्रकार के फर्श, एयरपोर्ट, रेलवे प्लेटफार्म, आइसोलेशन वार्ड, अस्पताल, कारपेट, रेलवे में बोगियों की फर्श व सीटों केपर, हवाई जहाजों के अंदर व सीटों पर इस्तेमाल किया जा सकता है। फैक्ट्री व घरों में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

उपकरण की खास बातें

  • इससे निकलने वाली किरणें केवल फर्श पर उपकरण की साइज में ही निकलती हैं। इसलिए यह सबसे सुरक्षित है।
  • बाकी उपकरणों से अल्ट्रा वायलेट किरणों की सीमा तय नहीं की है, जिसका नुकसान उसे चलाने वालों को हो सकता है।
  • अगर दूसरे उपकरणों से निकलने वाली किरणों को नंगी आंखों से देख लें तो आंखों को नुकसान पहुंचाती हैं।
  • दूसरे उपकरणों से निकलने वाली किरणें त्वचा को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
  • इसे कोई भी ऑपरेट कर सकता है। यह बैटरी व लाइट दोनों से चलता है।

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