जालंधर, जेएनएन। पुरानी रेलवे रोड और नई रेलवे रोड के मध्य के क्षेत्र में जो जलाशय था, उसे कुछ इतिहासकार धन्य सरोवर भी कहते हैं। बाग करमबख्श के तीनों तरफ यह विशाल सरोवर हुआ करता था। इतिहासकार कहते हैं कि यह सरोवर ढाई-तीन सौ वर्ष पूर्व निर्मित हुआ था। सांझ ढले नगर सेठ अपने परिवार के साथ इसमें नौका विहार के लिए आया करते थे। जब ब्रिटिश राज की शातिर चालों ने जालंधर के धार्मिक संतुलन को बिगाड़ने का मन बनाया, तब जालंधर के इस क्षेत्र में बस्तियों से लाकर मुस्लिम समुदाय को बसाना आरंभ कर दिया। हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए इस सरोवर में उन लोगों ने अपने घर का गंदा पानी डालना आरंभ कर दिया और धन्य सरोवर एक गंदे जौहड़ (तालाब) में बदल गया। नगर की जो आबादी आकर बसी थी, उसका कारण कुछ भी रहा हो, उसने इसको गंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आजकल यह सरोवर लगभग समाप्त है। इसकी जगह पर चारदीवारी में बंद मैदान बना दिए गए हैं।

जौहड़ के किनारे कभी होता था कुआं 

कभी इस जौहड़ के किनारे पर एक कुआं हुआ करता था, जिसमें जोहड़ का गंदा पानी जाता था। इससे बाग करमबख्श के स्थान पर कुछ लोग सब्ज़ी उगाने का धंधा करते थे। अब बाग की जगह पर एक नई कॉलोनी बना दी गई है। धन्य सरोवर अब इतिहास के पन्नों में भी नहीं मिलता। काश पुरातत्व विभाग ऐसे सरोवरों की खोज-खबर लेता रहता तो हो सकता था कि आने वाली पीढिय़ों को एक बार फिर धन्य सरोवर के दर्शन हो जाते।

कुछ लोग कहते हैं कि एक मुस्लिम फकीर इसके एक कोने पर अपने मुरीदों के साथ रहने लगा था। वह धन्य शब्द बोलने के बजाय इसे ढन्न सरोवर कहने लगा और यही नाम प्रचलित हो गया। क्योंकि उसके आसपास सारी आबादी मुस्लिम थी। धन्य सरोवर के में एक बात तो सर्वमान्य है कि ब्रिटिश राज के समय पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर एलैग्जेंडर कनिंघम ने भी जालंधर के 12 सरोवरों का उल्लेख करते हुए इस सरोवर का भी जिक्र किया था। इसकी खूबसूरती और वातावरण की उसने प्रशंसा भी की थी। हालांकि इसका अस्तित्व कायम रखने के लिए ब्रिटिश राज ने कोई प्रयास नहीं किए। इससे अच्छा-भला सुंदर सरोवर बदबूदार जोहड़ में बदल गया। उसके साथ लगती चार गलियां धन्य के स्थान पर ढन्न मोहल्ला कहलाने लगीं।

(प्रस्तुतिः दीपक जालंधर- लेखक शहर की जानी-मानी शख्सियत और जानकार हैं)

 

 

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Posted By: Pankaj Dwivedi

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