जालंधर, [अंकित शर्मा]। चाहे कहीं भी चुनाव करवाने हों, जनगणना करवानी हो, आपदा प्रबंधन सहित अन्य सेवाओं के लिए मैन पॉवर की जरूरत हो, सबसे पहले शिक्षकों की ही ड्यूटी लगती है। शिक्षक भी हर जगह ड्यूटी के आदी हो चुके हैं। इन दिनों कोविड-19 महामारी के कारण सरकारी दफ्तर बंद थे और कारोबार भी। ऐसे में श्रमिकों को उनके गृह राज्यों को भेजा जाना था, मगर हजारों एकी तादाद में श्रमिकों का डाटा इकट्ठा करना, प्रत्येक श्रमिक तक पहुंच बनानी अनिवार्य थी। ऐसे में शिक्षकों की ड्यूटियां मेडिकल स्क्रीनिंग केंद्रों में लगा दी गई।

मुश्किल की इस घड़ी में टीचर्स वहां भी सेवाएं देने से पीछे नहीं हटे। हाल ही में फैक्ट्रियां खोल दी गईं तो शराब की फैक्ट्रियों में उत्पादन का सारा रिकॉर्ड रखने के लिए शिक्षकों की ड्यूटी लगा दी। शिक्षक वर्ग के लिए यह ड्यूटी उचित नहीं थी। शर्मिंदा होकर आखिरकार सरकार को अपना आदेश वापस लेना पड़ा।

कृष्ण कुमार की चुप्पी पर सवाल

अध्यापकों की ड्यूटियों को लेकर यूं तो शिक्षा सचिव निरंतर आदेश पर आदेश निकालते रहते हैं कि बाकी विभागों के समानांतर ही शिक्षकों की ड्यूटियां लगाई जाएं। क्योंकि अध्यापकों का पहला कार्य बच्चों की पढ़ाना और अच्छा इंसान बनाना है। इसके लिए वह सरकार के अलावा कोर्ट में भी जाने से पीछे नहीं हटते। उनका तर्क है कि टीचर्स की ड्यूटी दूसरे काम में लग जाने से हालात यह बन जाते हैं कि स्कूल खाली हो जाते हैं। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। लेकिन कोविड-19 महामारी में जब सभी विभागों को भूल सरकार ने टीचर्स की ड्यूटी श्रमिकों की स्क्रीनिंग के लिए लगाई तो वे चुप्पी साध गए। वह भी तब जब बिना पीपीई किट के डॉक्टर भी लोगों के पास नहीं जाते और अध्यापकों को केवल मास्क लगाकर भीड़ में उतार दिया गया। शिक्षा सचिव कृष्ण कुमार की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।

कोविड-19 ने डाले रखा पर्दा

शिक्षा विभाग ने सरकारी स्कूलों को खोला ताकि पेंडिंग कार्यों को पूरा किया जा सके। ऐसे में आदेश यह थे कि 33 फीसद नॉन टीचिंग स्टाफ को बुलाया जा सकता है। लेकिन एजुकेशन बोर्ड ने सभी नियम को दरकिनार कर अध्यापकों को स्कूलों में पहुंचने का फरमान जारी कर दिया। मकसद मात्र एक था कि किसी तरह बच्चों की पढ़ाई खराब ना हो और उन्‍हें किताबें मुहैया करवाई जा सकें। अध्यापक भी स्कूलों की तरफ दौड़े, लेकिन उनकी इस दौड़ का कोई खास फायदा नहीं हुआ। कारण यह था कि विभाग ने नई किताबें तो छपवाई नहीं और जो पुराने स्टॉक में पड़ी थीं वही स्कूलों तक पहुंचा दीं। ऐसे में बच्चों के हाथ मात्र एक-दो किताबें ही आईं। अप्रैल से शुरू होने वाले सेशन के लिए किताबें पहले नहीं छपवाई गईं इसका किसी को पता तक नहीं चला। अधिकारियों की इस लापरवाही पर कोविड 19 ने भी दो महीने पर्दा डाले रखा।

कोरोना ने सिखाई ऑनलाइन पढ़ाई

सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों ने कभी सोचा भी ना था कि वे बच्चों के साथ ऑनलाइन भी जुड़ेंगे। यही हाल इन स्कूलों में पढऩे वाले अधिकतर विद्यार्थियों के थे। ऑनलाइन टेक्नॉलाजी के बारे में उन्होंने सुना तो बहुत था, लेकिन न तो कभी शिक्षकों और न ही बच्चों ने कभी इसका इस्तेमाल किया था। जूम एप के जरिये लेक्चर देना, अपना खुद का यूट्यूब पेज बनाना, ऑडियो वीडियो लेक्चर देना सब कुछ नया था। शिक्षकों का मानना है कि खराब समय जब भी आता है तो वह कुछ न कुछ नई सीख अवश्य देकर जाता है। ऐसा ही कोविड-19 के समय में हुआ है। पहले वे केवल कक्षाओं तक ही बच्चों के साथ जुड़े हुए थे। कभी उनके साथ ऑनलाइन हुए ही नहीं। अब बच्चों के साथ-साथ वे खुद भी घरों में हैं। ऐसे में पढ़ाई का नया साधन मिला है। इसका बच्चों को भी बेहद लाभ मिला है। 

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Posted By: Sat Paul

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