जालंधर, जेएनएन। राज्य सरकार का 2025 तक पंजाब को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य है। सेहत विभाग विभाग भले ही टीबी के इलाज मुफ्त कर रहा है, लेकिन मरीजों को दवाइयों के लिए तरसना पड़ रहा है। विभाग के अधिकारी मामले को अनदेखा कर रहे हैं, जो मरीजों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। जिले में करीब 6140 टीबी मरीजों का इलाज चल रहा है। इनमें तकरीबन 4170 मरीजों का सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों और शेष का निजी डॉक्टर के पास इलाज हो रहा है। टीबी विभाग के जिला टीबी अफसर का पद पिछले करीब ढाई साल से खाली है। दवाइयों की सप्लाई को लेकर स्टाफ की मनमानी से मरीज परेशान हैं। नीतियों के मुताबिक टीबी के मरीजों को उनके घर के नजदीक मुफ्त दवाइयां मुहैया करवाना है, लेकिन मरीज अस्पताल आ रहे हैं और उन्हें निराश लौटना पड़ रहा हैं।

दवा मिल नहीं रही, डॉक्टर कह रहे रोज खानी

अमन नगर निवासी मुलख राज का कहना है कि तीन माह पहले उनका इलाज शुरू हुआ था। आधी दवा खा चुके हैं और शेष दवा लेने के लिए सिविल अस्पताल के चक्कर काट रहे हैं। यहां स्टाफ दवाइयां न होने का हवाला देते हैं। तीन बार अस्पताल के चक्कर काट चुके हैं, परंतु दवा नहीं मिली। वहीं, डॉक्टरों का कहना है कि दवा रोजाना खानी है। वरना टीबी का खतरा बढ़ सकता है।

सिविल सर्जन के समक्ष रखी समस्या

जिला टीबी अधिकारी डॉ. राजीव शर्मा का कहना है कि फार्मासिस्ट की ड्यूटी दूसरे जिले में लगी है और दवाई के लिए मरीजों को समस्या झेलनी पड़ रही है। इसे सिविल सर्जन के समक्ष रखा गया है। उन्होंने जल्द ही समाधान का आश्वासन दिया है।

स्टाफ की कमी से आई समस्या पेश, अब भिजवा दी गई हैं दवाएं

सिविल सर्जन डॉ. गुरिंदर कौर चावला ने बताया कि मल्टी ड्रग रजिस्टेंस (एमडीआर) मरीजों की दवा में हर बार कुछ बदलाव होते हैं। फार्मेसी अफसर की बाढ़ में ड्यूटी लगने से कुछ दिन समस्या थी। स्टाफ की कमी भी चल रही है। अब सभी जगह पर मरीजों की दवा भिजवा दी है। उन्होंने कहा कि संबंधित फार्मासिस्ट को दवाइयों का स्टॉक मंगवा कर मरीजों को मुहैया करवाने की हिदायत दी है। इसके बाद स्थाई रूप से समस्या का समाधान किया जाएगा।

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