जालंधर [मनीष शर्मा]। रिटायर्ड जज सत्येंद्र मोहन सिंह कई वर्ष पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं लेकिन शोषितों को अधिकार दिलाने की उनकी जंग आज भी जारी है। वह बाल भलाई कमेटी के जरिए बच्चों को उनका हक दिलाने में जुटे हैं। करीब 15 वर्ष पहले जज माहल पटियाला जिला अदालत से बतौर जिला एवं सेशन जज सेवामुक्त हुए थे। इतने वर्षों बाद भी वह अलग-अलग अथॉरिटी से जुड़कर जरूरतमंदों को इंसाफ दिला रहे हैं। वर्तमान में वह जालंधर की बाल भलाई कमेटी के चेयरपर्सन हैं।

रिटा. जस्टिस माहल कहते हैं कि सेवामुक्ति के बाद वह भी जिंदगी आराम से गुजार सकते थे लेकिन लोगों को इंसाफ दिलाने की ललक ने उन्हें कभी बैठने नहीं दिया। जहां मौका मिला, वहां उन्होंने इंसाफ की आवाज को बुलंद करना शुरू कर दिया। अब भी वह लोगों को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में जागरूक कर इंसाफ की लड़ाई लडऩे को प्रेरित करते रहते हैं।

पांच वर्ष तक की उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा

रिटा. जस्टिस माहल 2005 में पटियाला से सेवामुक्त हुए तो उसके बाद ज्यादा देर घर नहीं बैठे। वह जिला कंज्यूमर फोरम जालंधर के प्रेजिडेंट बन गए। पांच साल तक उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करते रहे। उपभोक्ताओं के अधिकारों को छीनने वालों को जुर्माना करते रहे। इसके बाद स्थाई लोक अदालत के चेयरमैन रहे। पांच साल यहां पर लोगों के वर्षों से लटकते मामलों का निपटारा करने में अहम योगदान दिया। इसके बाद वह न्याय विभाग के एडीआर सेंटर से जुड़ गए। यहां बतौर मध्यस्थ उन्होंने अदालत में चल रहे केसों को सुनवाई से बाहर ही निपटाने में अहम रोल अदा किया। अदालतों में पड़े केसों के भार काम कम करने में एडीआर सेंटर के मीडियेटर के तौर पर उन्होंने एक साल तक काम किया।

फिर, वह अदालत के फैमिली वेलफेयर सेल से जुड़े। जहां दहेज उत्पीडऩ व घरेलू हिंसा जैसे केसों को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने में अहम योगदान दिया। इसके बाद अगस्त 2018 में उन्हें जिला बाल भलाई कमेटी का चेयरपर्सन बनाया गया। यहां सामाजिक कार्यकर्ता अमरजीत सिंह आनंद, सेवामुक्त एसएमओ डॉ. रोशन लाल व सरिता अरोड़ा बतौर मेंबर जुड़े हैं। कमेटी जुवाइनल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड) एक्ट 2015 के तहत गुम हुए, अनाथ, त्यागे और मां-बाप के संभालने में असमर्थ बच्चों को इंसाफ दिलाती है।

हर महीने दस अनाथ बच्चों के मामले पहुंचते रिटा. जस्टिस माहल के पास

चेयरपर्सन माहल कहते हैं कि गुम हुए बच्चों को अस्थायी तौर पर मंजूरशुदा बच्चों की संस्थाओं में रखा जाता है और उनके अभिभावकों को ढूंढा जाता है ताकि बच्चे उन्हें सौंपे जा सकें। जो बच्चे अनाथ, त्यागे गए या फिर जिनके मां-बाप खुद उन्हें छोड़ जाते हैं, उन्हें कानूनी प्रक्रिया के हिसाब से गोद दिया जाता है। वर्तमान में कमेटी के पास हर महीने करीब 10 बच्चों के केस आते हैं, जो अलग-अलग परिस्थितियों का शिकार होते हैं। उन्होंने कहा कि वयस्क तो इंसाफ के लिए आवाज भी उठा सकते है।

इसके लिए पुलिस से लेकर कानून व्यवस्था का दरवाजा खटखटा सकते हैं लेकिन बच्चों के पास यह मौका नहीं होता। यही वजह है कि बाल भलाई कमेटी के जरिए उन बच्चों को पूरा इंसाफ दिलाया जा रहा है ताकि आगे चलकर वो समाज की मुख्य धारा में शामिल हो सकें। अपने पैरों पर खड़े होकर देश के सामाजिक व आर्थिक विकास में अपना भरपूर योगदान दे सकें।

 

 

 

 

 

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Posted By: Pankaj Dwivedi

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