जालंधर [जगदीश कुमार]। दीवाली की रात पटाखों की आड़ में किसानों ने खेतों में पराली को आग लगाई। इसके अलावा शहवासियों द्वारा फोड़े गए पटाखों के कारण आसमान में स्मॉग की चादर छाई है। इससे शहर की हवा प्रदूषित हो गई है। स्मॉग के कारण आंखों में जलन, गले में खराश के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। स्मॉग से राहत पाने को लोगों को अभी थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। बारिश ही इन सब परेशानियों से राहत दिला सकती है।

मौसम विभाग के अनुसार अभी एक सप्ताह बारिश होने के आसार नहीं हैं। दूसरी ओर पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड व मौसम विभाग इसे स्मॉग नहीं फॉग बता रहा है। मंगलवार को पूरा दिन शहर स्मॉग की चादर में लिपटा रहा। तेज हवाएं, बारिश या फिर ओस पड़ने से समस्या हल हो सकती है।

पीपीसीबी ने स्माग से झाड़ा पल्ला

पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के एक्सईएन अरुण कक्कड़ का कहना है कि स्मॉग नहीं फॉग की वजह से समस्या है। पिछले दो दिन से पराली जलने के काफी मामले सामने आए हैं। दीवाली की रात जिले में पराली जलाने के 136 मामले आए थे इनकी संख्या 171 तक पहुंच गई है। दीवाली की रात एयर क्वालिटी इंडेक्स 228 से 357 तक पहुंच गया है। तापमान में गिरावट की वजह से ठंडी हवाएं समान्य हवा से भारी होने से डस्ट पार्टिकल इसमें अटक जाते हैं। बारिश ही समस्या से मुक्ति दिला सकती है।

तापमान में गिरावट से जमीन और हवा हुई ठंडी

दोआबा कॉलेज के मौसम विशेषज्ञ प्रो. दलजीत सिंह का कहना है कि दीवाली में पटाखे चलने, पराली जलाने व बढ़ते वाहनों से निकले वाला धुआं स्मॉग का मुख्य कारण है। तापमान में गिरावट से जमीन ठंडी होने के साथ आसपास की हवाएं भी ठंडी हो गई हैं। गैसें व पार्टिकुलेट मैटर हलका होने से हवा में अटक चुके हैं। इसकी कारण हवा का गुबार बना हुआ है। बारिश होने पर सभी जहरीला गैसें व कण जमीन पर गिरेंगे और तभी शहर के लोगों को राहत मिल पाएगी।

जानें कौन-कौन से स्वास्थ्य के दुश्मन प्रदूषण में छिपे 

(माइक्रोबायोलालिस्ट डॉ. एलफर्ड, सिविल अस्पताल जालंधर)

अमोनिया गैस : इससे आंखों में जलन होती है और पानी निकलता है। इसके साथ इंफेक्शन होने का खतरा है। फेफड़ों और पूरी श्वास प्रणाली के लिए ये नुकसानदायक है।

कार्बन मोनोऑक्साइड गैस : ये गाड़ियों व खेतों से आग लगने से होती है। ज्यादा समय दिमाग में जाने से मौत का खतरा है। दमे के मरीजों को बेहद बचकर रहना चाहिए। इसकी वजह से शरीर में आक्सीजन की क्षमता कम हो जाती है। फेफड़ों को घातक नुकसान पहुंचाता है।

नाइट्रोजन ऑक्साइड : वाहनों के धुएं में पाई जाती है।

सल्फर डाइऑक्ससाइड गैस : गाड़ियों और कारखानों से निकलने वाले धुएं से निकलकर यह फेफड़ों के लिए नुकसानदायक है।

लेड या सीसा : ये गाड़ियों से निकलने वाले धुएं के अलावा मेटल इंडस्ट्री से निकलता है और सेहत के लिए नुकसानदायक है।

ओजोन गैस : दमे के मरीज और बच्चों के लिए बहुत खतरनाक है।

पार्टिकुलेट मैटर यानी हवा में मौजूद धूल, धुआं, नमी, गंदगी आदि जैसे 10 माइक्रोमीटर तक के पार्टिकुलेट मैटर दिल के मरीजों व 2.5 माइक्रोमीटर पार्टिकुलेट मैटर अस्थमा व आम लोगों के लिए नुकसानदायक हैं।

बचाव ही सबसे बेहतर उपाय

(डॉ. सतीश कुमार, जिला एपीडिमोलॉजिस्ट, सेहत विभाग)

  • अस्थमा और टीबी रोगी स्मॉग में बाहर न निकलें।
  • मास्क लगाकर बाहर निकलें।
  • सुबह की बजाय धूप निकलने के बाद तकरीबन आठ बजे वॉक पर जाएं।
  • घर से बाहर निकलते वक्त भी पानी पीएं। इससे शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई सही बनी रहेगी और वातावरण में मौजूद जहरीली गैसें ब्लड तक पहुंच भी गई तो कम नुकसान पहुंचाएंगी।
  • नाक के भीतर के बाल हवा में मौजूद बड़े डस्ट पार्टिकुलेट को शरीर में जाने से रोकते हैं। इसलिए बालों को पूरी तरह से ट्रिम न करें।
  • बाहर से आने के बाद गुनगुने पानी से मुंह, आंखें और नाक साफ करें।
  • दिन में दो बार स्टीम लें।
  • अस्थमा और दिल के मरीज नियमित दवा लें। इमरजेंसी के लिए इन्हेलर पास रखें।
  • साइकिल व पैदल चलने वाले लोग मास्क और दो पहिया वाहन चालक हेलमेट लगाएं।

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