जागरण संवाददाता, जालंधर : छह साल पहले जमीन विवाद को लेकर हुए बहुचर्चित शिगारा चंद हत्याकांड मामले में एडिशनल सेशन जज सरबजीत सिंह धालीवाल की कोर्ट ने कुलबीर सिंह बड़ापिंड समेत नौ लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कुलबीर सिंह पर एक लाख और बाकियों पर बीस हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। जुर्माना नहीं भरने की सूरत में सभी को एक साल का अतिरिक्त कारावास काटना होगा। मंगलवार को कोर्ट ने नौ आरोपितों को दोषी करार दिया था। सजा सुनाए जाने के बाद हिरासत में लिए गए कमलजीत सिंह, हरीराम, पाल राम, सुरिदर सिंह, मोती राम निवासी बड़ा पिड को जेल भेज दिया गया। कुलबीर सिंह बड़ापिड, सुखविदर सिंह, मनोहर सिंह निवासी बड़ापिड और गुरमेल सिंह पहले से ही मामले में जेल में बंद हैं। मामले में कुल 12 लोगों को आरोपित बनाया गया था। सुनवाई के दौरान दो आरोपितों महिंदर और ठाकुर दास की मौत हो चुकी है। रेशम लाल जमानत पर आने के बाद इंग्लैंड भाग गया था। सुप्रीम कोर्ट से जमानत रद हो जाने के बाद जब उसने आत्मसमर्पण नहीं किया तो पुलिस ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया था। मनोहर सिंह की लाइसेंसी रिवाल्वर से मारी गयी थी गोली

घटना 5 नवंबर 2015 की है। देर शाम जमीन विवाद में किसान शिगारा चंद को गोली मार दी गई थी। कुलबीर सिंह बड़ापिड पर आरोप लगा था कि उसने मनोहर लाल की लाइसेंसी रिवाल्वर से शिगारा चंद को गोली मारी थी। इस घटना का वीडियो मृतक शिगारा की बेटी ने बनाया था जिसके बाद आरोपित पक्ष ने मृतक की बेटी समेत पांच लोगों पर धारदार हथियार से हमला करने का आरोप लगा क्रास पर्चा भी दर्ज कराया था। क्रास पर्चे में मृतक की बेटी और सभी आरोपितों को पहले ही बरी किया जा चुका है। सुनवाई के दौरान सामने आया कि पीड़ित पक्ष पर दबाव बनाने के लिए आरोपितों ने फर्जी केस दर्ज करवाया था। कौन है कुलबीर बड़ापिंड : पूर्वमंत्री दर्शन सिंह केपी पर गोली चलाने का था आरोप

पूर्व मंत्री मोहिदर सिंह केपी के पिता व पूर्व कैबिनेट मंत्री दर्शन सिंह केपी गोलीकांड से कुलबीर सिंह बड़ापिड का नाम चर्चा में आया था। कुलबीर पर उनको गोली मारने के आरोप लगे थे। हालांकि इस मामले में सुनवाई के दौरान सबूतों के अभाव में उसे बरी कर दिया गया था। आतंकवाद के दौर में भी कुलबीर सिंह खासी चर्चा में रहा था। उसके ऊपर कई मुकदमे दर्ज होने के बाद वह अमेरिका फरार हो गया था। साल 2006 में हुई प्रत्यर्पण संधि के बाद अमेरिका ने कुलबीर को भारत को सौंपा था। कुलबीर पर आतंकवाद के दौर के तीन और भी मामले दर्ज थे। कई लोगों की जान गयी थी लेकिन इन मामलों में भी कुलबीर को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था।

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