विजय गुप्ता, सैक्रामेंटो वैली (कैलिफोर्निया)। बादाम और अखरोट के बागानों से लहलहाते कैलिफोर्निया की खुशहाली की दास्तां पंजाबियों के पसीने से लिखी जा रही है। जोखिम उठाने और मेहनत से कुछ भी हासिल करने का जज्बा ही है कि पंजाबी मूल के कई लोग यहां न सिर्फ कृषि कर अच्छी जिंदगी जी रहे हैं, बल्कि बड़े-बड़े बागानों के मालिक बन दूसरों को रोजगार भी दे रहे हैं। पश्चिमी अमेरिका केइस कैलिफोर्निया प्रांत की पहचान आइटी के अलावा यहां की कृषि से भी है। इसमें पंजाबियों का सबसे ज्यादा योगदान है। अमेरिकियों को भी उन पर मान है, क्योंकि कैलिफोर्निया ने आज बागवानी के क्षेत्र में दुनिया में इस मुल्क का झंडा बुलंद किया है।

पंजाब से गए, अब तीसरी पीढ़ी बागवानी में

अमेरिका के 90 फीसद अखरोट का उत्पादन करने वाली इस वैली में पंजाबी कई दशक से बागवानी कर रहे हैं। 1966 में जालंधर के जंडियाला गांव से सैक्रामेंटो वैली में आए सरब जौहल आज अपने 1200 एकड़ के अखरोट के बाग के साथ-साथ प्रोसेसिंग यूनिट भी चला रहे हैं। 1963 में उनके पिता यहां आए थे और आज तीसरी पीढ़ी बागवानी में है। उनकी बेटी किरण अपनी ही नहीं बल्कि सैक्रामेंटो वालनट ग्रोवर्स की मार्केटिंग का जिम्मा संभाले है, जबकि दामाद कैमरन ऑपरेशन का काम देखते हैं।

20 फीसद अखरोट बागान के मालिक पंजाबी है

सरब जौहल बताते हैं कि यहां करीब 20 फीसद अखरोट बागान के मालिक पंजाबी हैं, जबकि पीच यानी आड़ू के तो 75 फीसद बागान पंजाबियों के हैं और वे ही उन्हें चला रहे हैं। इसी तरह पंजाब के वडाला माही के समरा परिवार की भी तीसरी पीढ़ी टरलॉक में अखरोट के अलावा पिस्ता और बादाम की बागवानी कर रही है। 1975 में परविंदर समरा के पिता यहां आए थे। आज परविंदर के पास करीब 300 एकड़ के बाग हैं। उनके दोनों बेटे गुरताज और सुखराज समरा भी बागवानी में उनका हाथ बंटा रहे हैं। भविष्य में ये अपना प्रोसेसिंग पैकेजिंग यूनिट लगाने की योजना बना रहे हैं। सरब जौहल और परविंदर की तरह कई अन्य पंजाबी यहां सफलता की कहानी लिख रहे हैं।

पंजाबियों का अहम योगदान

पामेला ग्रेविएट कैलिफोर्निया वालनट कमीशन की सीनियर मार्केटिंग डायरेक्टर पामेला ग्रेविएट कहती हैं, ‘पंजाब के बागवान बहुत मेहनती हैं। यहां के प्रत्येक अखरोट उत्पादक को कमीशन से जुड़ना जरूरी है। कुल 4800 के आसपास बागवान कमीशन से जुड़े हैं। इनमें कितने पंजाबी हैं इसका सही आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि उनका बहुत बड़ा योगदान है।’

दिल पंजाब में, पर रहना यहीं चाहते हैं

सरब जौहल और परविंदर कहते हैं कि उन्होंने यहां मेहनत से बहुत कुछ हासिल किया है। अब तो यहीं रहना है। अनेक रिश्तेदार भी यहीं हैं। अगली पीढ़ी तो अमेरिकी ही हो गई है। फिर भी पंजाब जाने का बहुत मन करता है। परविंदर अपनी मां से मिलने वडाला जाते रहते हैं। सरब जौहल का कहना है कि कई पंजाबियों की तरह उनकी भी गुरु नानक जी के 550वें प्रकाश पर्व पर भारत आने की इच्छा है और वह जरूर आएंगे। पंजाबी बागवानों की यह धारणा बन चुकी है कि पंजाब की अपेक्षा वे यहां कम मेहनत करके ज्यादा पैसे कमा सकते हैं और अच्छी जिंदगी जी सकते हैं। वह कहते हैं, ‘यहां काम और व्यापार करने के हालात उन्हें भारत से कहीं अच्छे लगते हैं।’

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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