मनीष शर्मा, जालंधर। दृढ़ इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और नेक इरादे हों तो कुछ भी असंभव नहीं हो सकता। पैदा हुए तो डॉक्टर के मुंह से निकल पड़ा कि अफसोस यह कुछ नहीं कर सकता। यह तो शारीरिक और मानसिक तौर पर दिव्यांग है। आज वही विवेक जोशी समाज के लिए प्रेरणास्नोत बनकर उभरे हैं। वह दूसरों का जीवन संवार रहे हैं। पंजाब के जालंधर में रामा मंडी के बसंत हिल्स निवासी विवेक जोशी बताते हैं, ‘जन्म लेते ही संघर्ष शुरू हो गया। शुरुआत में मैं न बोल पाता था और न लिख और पढ़ पाता था। लोग दया भरी निगाहों से देखते, लेकिन परिवार का साथ मिला। पढ़ाई का शौक था। जिद की तो पिता ने स्कूल में दाखिला करा दिया। सोचा कि दसवीं कर लेगा तो कहीं नौकरी मिल जाएगी और मन लगा रहेगा। दसवीं के बाद मैंने तय किया कि अभी पढ़ना है। फिर जो सिलसिला शुरू हुआ तो बारहवीं, बीए, एलएलबी, एलएलएम, एमबीए व एमएसडब्ल्यू के बाद अब तक नहीं थमा। फिलहाल डिसेबिलिटी मैनेजमेंट पर पीएचडी कर रहा हूं।’

माता-पिता पढ़कर सुनाते तो करते थे याद

विवेक बताते है, ‘बीए तक तो मैं पढ़-लिख नहीं पाता था। माता-पिता पढ़कर सुनाते, मैं उसे याद करता और परीक्षा में जो सहायक मिलता, उससे लिखवाता। इसी बीच 2014 में माधव सेवा सोसायटी बनाई। फिर जरूरतमंद व इच्छुक बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। मेरी कक्षा में दिव्यांग व सामान्य सब एक साथ बैठते हैं। लगभग 400 बच्चे पढ़ चुके हैं। कई लोगों को प्रेरित किया।’ विवेक बताते हैं कि नौकरी न मिलने से कुंठाग्रस्त तीन युवक मिले। काउंसिलिंग की तो वे कनाडा चले गए। एक लड़की रिजल्ट से इतनी डरी थी कि बारहवीं की परीक्षा ही नहीं देना चाहती थी। उसे समझाया और पढ़ाया। आखिर वह 86 फीसद अंकों के साथ उत्तीर्ण

हुई। एलएलबी और एलएलएम के बाद जरूरतमंदों और दिव्यांगों के केस मुफ्त लड़ते हैं। कभी दिव्यांगों की सुविधाओं की बात आई, तो आरटीआइ से सरकार व अफसरों का पीछा करते रहे।

अध्यापक बनना ही पसंद

विवेक कहते हैं कि मुझे अध्यापक बनना ही पसंद है। कम से कम अगली पीढ़ी को कुछ दे तो सकते हैं। जब अब्दुल कलाम राष्ट्रपति थे, तब हैदराबाद में सेरेब्रल पाल्सी पर इंटरनेशनल कांफ्रेंस में उनसे मिले। उन्हें पता चला कि एलएलएम कर रखी है तो उन्होंने सिर पर हाथ रख बधाई दी और कहा कि अपने ज्ञान को पूरी दुनिया में फैलाओ। उन्होंने विवेक की किताब लफ्ज-लफ्ज मासूम रिलीज की थी।

नाउम्मीदी को जिंदगी की डिक्शनरी से निकाल दो

विवेक कहते हैं कि पहले खुद के लिए संघर्ष किया, अब दूसरों के लिए कर रहा हूं। दो बातें ध्यान रहें। मां-बाप को भगवान समझो। नाउम्मीदी को जिंदगी की डिक्शनरी से निकाल दो। जुगनू भी अंधेरे को चुनौती देता है तो हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं।

चलते-चलते विवेक गुनगुनाने लगे

जिंदगी तुझसे प्यार है.. मैं मजे में हूं।

बस तेरा इंतजार है .. मैं मजे में हूं।।

बस तुझपे ही एतबार है.. मैं मजे में हूं।

कहना हर बार है... मैं मजे में हूं।।

दिव्यांग नहीं, ये खास हैं

तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी के हाथों सम्मानित विवेक की कामयाबी में अतुलनीय योगदान के लिए उनकी मां कौशल्या जोशी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने सम्मानित किया है। वह कहती हैं कि लोग सोचते हैं कि दिव्यांग कुछ नहीं कर सकता, लेकिन यह बच्चे खास हैं। पिता सुभाष जोशी बताते हैं कि ब्रिटेन से आए लॉर्ड स्वराज पॉल विवेक को बीए की डिग्री दे रहे थे तो कहा था कि एक दिन आप इसके नाम से जाने जाएंगे। यकीनन वही हो रहा है।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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