जालंधर, जेएनएन। माई हीरां गेट के साथ लगते भैरों बाजार में भैरों मंदिर के सामने ही एक दुकान है जो अपनी कचौरियों के स्वाद के कारण दूर-दूर तक मशहूर है। आज से 198 साल पहले गोखामन ग्रोवर ने यहां कचौरियों का काम शुरू किया था। तब उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा कि उनकी कचौरियों का स्वाद सदियों चलने वाला है। पांच पीढ़ियों से तो जालंधरियों की जुबां पर यह चढ़ा ही है और आने वाले समय में भी बरकरार रहने की उम्मीद है।

सुबह ही लग जाता है तांता 

मंदिर के सामने होने के कारण यहां सुबह ही रौनक होती है। सुबह छह बजे से दोपहर 12 बजे तक कचौरियों के लिए लोगों की खूब भीड़ रहती है। यह उतनी ही सामग्री तैयार करते हैं जितना कि 12 बजे तक खत्म हो जाए, हर रोज ताजा सामग्री ही तैयार की जाती है। शनिवार व रविवार को तो लाइन लगाकर कचौरियां लेनी पड़ती हैं। कचौरियों की बिक्री खत्म होने के बाद पकोड़े का और नमकीन के लिए ग्राहक आने लगते हैं।
 

पांचवी पीढ़ी तक का सफर 

गोखामन ग्रोवर के बाद मोहनलाल और फिर अगली पीढी के माधोराम ने कचौरियों का यह काम संभाला। इनके बाद इनके पुत्र धनपत ने कारोबार आगे बढ़ाया। उन्होंने कचौरियों के साथ आलू व चने की सब्जी के अलावा खट्टी चटनी तथा अचार के स्रस में डूबे प्याज भी परोसने शुरू किये। इसे लोगों और भी पसंद किया। तब से इनकी कचौरियां ‘धन्ने की कचौरियों’ के नाम से पहचानी जाने लगी। धनपत को सब प्यार से ‘धन्ना’ कहकर बुलाते थे। तब धनपत ग्रोवर ने इस दुकान का नाम पक्के तौर पर ‘धन्ने दी हट्टी’ ही रख दिया, जो आज भी चल रहा है।

छोटी सी दुकान अब थोड़ी बड़ी हो चुकी है और लोगों के बैठने के लिए भी थोड़ी सी जगह बना ली गई है, लेकिन कचौरी का स्वाद पुराना ही है। आज परिवार की पांचवी पीढ़ी के गगन ग्रोवर 15 साल से इसे संभाल रहे हैं। उनका कहना है कि पूर्वजों की इस दुकान को मैं हमेशा इसी तरह व इसी नाम से चलाना चाहता हूं।

मैं बचपन से यहां की कचौरियां खा रहा हूूं

मैं पांच साल की उम्र से ही यहां की कचौरियां खा रहे हैं। अब अन्य किसी दुकान की कचौरी अच्छी नहीं लगती है। पहले पिता जी यहां से कचौरियां लेकर घर आते थे। अब मैं लेकर जाता हूं।
- हनी, दूसरी पीढ़ी के ग्राहक

कचौरियां के स्वाद में जादू है


धन्ने की कचौरियों के स्वाद में जादू है। 15 साल से यहां की कचौरियां खा रहे हैं और एक बार भी स्वाद में फरक नहीं महसूस हुआ। यही वजह है कि जब भी कचौरियां खाने का मन करता है तो सीधा यहीं आता हूं।
-ओम प्रकाश, ग्राहक


पूरा परिवार है कचौरियों का दीवाना


हम पिछले 35 साल से यहां की कचौरियां खाते आये हैं। मेरा पूरा परिवार इन कचौरियों का दीवाना है। रविवार का नाश्ता इन्हीं कचौरियों से होता है।
- प्रवीन, ग्राहक

 

 

 

 

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Posted By: Pankaj Dwivedi

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