जगजीत सुशांत, जालंधर। कृषि कानूनों की वापसी के बाद भाजपा के लिए पंजाब में स्थितियां एकदम बदल गई हैं। इसका असर पार्टी के बड़े नेताओं से लेकर बूथ स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं पर दिखाई दे रहा है। अब तक रक्षात्मक तरीके से चल रही भाजपा आक्रामक हो गई है। भाजपा नेताओं के भाषणों में भी तेवर दिख रहे हैं, जो आने वाले दिनों में और तीखे होंगे। बदल रहे माहौल में दूसरी पार्टियों के नेता भी भाजपा में शामिल हो रहे हैं। इनमें कांग्रेस, आप और शिअद के कई बड़े चेहरे हैं। सियासी उथल-पुथल के बीच भाजपा सीमांत राज्य में सुरक्षा, समानता और विकास का एजेंडा लेकर आगे बढ़ रही है। इन तमाम मुद्दों पर पंजाब में भाजपा के चुनाव प्रभारी गजेंद्र सिंह शेखावत के साथ हमारे वरिष्ठ संवाददाता ने विशेष बातचीत की। पेश हैं उसी के कुछ अंश...

कांग्रेस के कई मंत्रियों व विधायकों के भाजपा में शामिल होने की चर्चा है, इसमें कितनी सच्चाई है?

चर्चा हो रही है... ऐसा मत कहें। चर्चा तो पहले थी जो अब वास्तविकता में बदल चुकी है। विधायकों की तो बात ही छोड़ दें, अब तो मंत्री स्तर के नेताओं की भी लाइन लगी हुई है। कुछ पार्टियों के अध्यक्ष से लेकर नीचे तक के पदाधिकारी भी भाजपा में आने के इच्छुक हैं। जो माहौल इस समय बना है, उसमें भाजपा के साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़ रहे हैं। उन्हें भाजपा में ही पंजाब का भविष्य दिखाई दे रहा है। कांग्रेस में असली लड़ाई तो टिकटों की घोषणा के बाद होगी। आज तक कांग्रेस में जो नहीं हुआ वह इस बार होगा। लंबवत विभाजन होने वाला है, इसका अंदेशा तो राहुल गांधी को भी हो गया है। इसी कारण राहुल ने अपनी पूर्व निर्धारित तीन जनवरी की रैली रद कर 'सेफ एग्जिट' ले लिया। रही बात आम आदमी पार्टी की तो बस देखते जाएं, बहुत जल्द बड़ा विस्फोट होने वाला है। ऐसा विस्फोट जिसे पार्टी नेता लाख कोशिश के बावजूद रोक नहीं सकेंगे।

लेकिन कृषि कानूनों के कारण तो भाजपा का विरोध और नुकसान हुआ है।

कृषि कानूनों के कारण भाजपा को नुकसान नहीं बल्कि फायदा हुआ है। भाजपा पंजाब में उभरकर सामने आई है। भाजपा का कैडर ही नहीं बल्कि जनाधार भी जबरदस्त ढंग से बढ़ा है। भाजपा को पंजाब में लंबे समय तक दबाया जाता रहा है, लेकिन अब मौका मिला है तो जबरदस्त उछाल मिला है। भाजपा के साथ लोग तेजी से जुड़ रहे हैं।

कहीं यह स्ट्रेटजी पश्चिम बंगाल जैसी तो नहीं है कि बस हाइप ही बन रही है?

चलो, बात 2016 से करते हैं। हमने 2016 में जो स्ट्रेटजी पश्चिम बंगाल में अपनाई उसका लाभ हमें वहां 2019 के लोकसभा चुनाव में हुआ। तब भाजपा वहां भी माइनस पर थी, परंतु अब आज की स्थिति देख लीजिए कि वहां हमने कितने मुद्दे उठाए, संघर्ष किया और आज वहां पर दूसरे दलों से आगे है। भाजपा ने अपने दम पर एक नई पहचान खड़ी की है। ऐसा ही पंजाब में होने जा रहा है। एक साल में ही हालात बदल रहे हैैं। भाजपा के कार्यकर्ता घर से बाहर तक नहीं निकल पा रहे थे। आफिस खोलने के लिए कोई तैयार नहीं था, पार्टी का झंडा उठाने वाले डरे हुए थे। आज भाजपा का जगह-जगह स्वागत हो रहा है, बड़ा बदलाव आ रहा है। पंजाब में अब बदल रही स्थिति 2024 में भी फायदा देगी।

विधानसभा चुनाव के बाद क्या भाजपा फिर से शिअद के साथ गठबंधन करेगी?

आज की स्थिति को देखते हुए तो इसकी संभावना रत्ती भर भी नहीं है। गठबंधन टूटते हैैं तो एक मर्यादा भी बनी रहती है ताकि दोबारा जुड़ने की संभावना रहे, परंतु गठबंधन टूटने के बाद सुखबीर बादल और हरसिमरत कौर बादल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए जैसी शब्दावली का इस्तेमाल किया, उस स्थिति में ऐसी कोई संभावना नहीं है। यह अलग बात है कि राजनीति में असंभव के संभव और संभव के असंभव होने में समय नहीं लगता।

ऐसी क्या मजबूरी थी कि भाजपा ने पंजाब में कभी अकेले चुनाव नहीं लड़ा?

पंजाब में भाजपा ने कभी सत्ता में आने के लिए समझौता नहीं किया। पंजाब सीमांत राज्य है। 1947 में बंटवारे के बाद की बात हो या फिर हिंदू-सिख एकता को तोडऩे की कोशिश करने की या आतंकवाद का दौर, भाजपा ने हमेशा ही सत्ता को किनारे रखकर पंजाब में सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए काम किया है। अकाली दल से हमने नाता ही इसलिए जोड़ा था कि हिंदू-सिख एकता को कोई तोड़ न सके और हम इसमें कामयाब भी रहे। पार्टी का राजनीतिक भविष्य भी दाव पर लगाकर हमने इस एकता को कायम रखा। अकाली दल ने भाजपा को खूब दबाया और एक रणनीति के तहत अकाली दल ने हमारी पार्टी के ही पांच-छह नेताओं को हमेशा पार्टी का चेहरा बनकर पेश किया। भाजपा नेतृत्व को उभरने तक नहीं दिया। यही कारण है कि आज अकाली दल से नाता टूटते ही ऐसे-ऐसे लोग, नेता और संस्थाएं हमसे जुड़ रही हैं जिनके भाजपा से हाथ मिलाने के बारे में किसी ने भी कभी सोचा नहीं होगा।

आगामी चुनाव में कांग्रेस और शिअद को कैसे देखते हैैं?

कांग्रेस ने राज्य में लीडरशिप बदल कर लोगों को साथ लेने की जो योजना बनाई थी, वह उसमें सफल नहीं हुए। कांग्रेस ने जनता में विश्वास खो दिया है। अब लोगों को भाजपा से उम्मीद है और समर्थन भी हासिल हो रहा है। जहां तक शिरोमणि अकाली दल की बात है तो लोग अब भी पांच साल पुरानी बातें नहीं भूल पा रहे हैं। अकाली दल को लोग पांच साल बाद भी स्वीकार नहीं कर पा रहे। लोगों के पास पहले कोई विकल्प नहीं था। अब भाजपा में उन्हें विकल्प दिखाई दे रहा है।

सभी पार्टियां मुफ्त की राजनीति पर जोर दे रही हैं, क्या भाजपा भी ऐसा ही करेगी?

मुफ्त की राजनीति ज्यादा देर नहीं चलती। लोगों को काबिल बनाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस पर संतुलित नीति अपनाई है। यही कारण है कि दुनिया में जब कई देश जब मुफ्त के चक्कर में अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर बैैठे, वहीं इस संकट के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से वापस पटरी पर लौट रही है। हम ऐसी नीतियां लाएंगे कि लोग सशक्त हो जाएंगे तो मुफ्त वाली योजनाओं की जरूरत नहीं पड़ेगी।

कर्ज माफी अब भी पंजाब में एक बड़ा मुद्दा है, इस पर क्या कहेंगे?

जब केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होगी तो डबल इंजन सिस्टम काम करेगा और जीडीपी बढ़ेगी। फिर कर्ज माफी की जरूरत ही नहीं रहेगी।

कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ गठबंधन का किसे ज्यादा फायदा होगा, कैप्टन को या भाजपा को?

जब गठबंधन होता है, तो चाहे वह सामाजिक स्तर पर हो या पारिवारिक स्तर पर, यह एक संयोजन होता है। अगर आपके बेटे की शादी होगी, घर में बहू लेकर आएंगे तो यह सवाल कहां होगा कि इससे किसको फायदा होगा। यह एक उद्देश्य, एक लक्ष्य एक साथ लेकर आगे बढऩे की बात होती है। जब एक साथ आगे बढ़ते हैं तो बाकी चीजें गौण हो जाती हैं।

Edited By: Kamlesh Bhatt