अशोक कुमार, गुरदासपुर : करवा चौथ के दिन सौभाग्यशाली महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। यह त्योहार पंजाब में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इसदिन महिलाएं सज संवरकर चंद्रमा की पूजा करती हैं। करवा चौथ के दिन सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व होता है। करवा चौथ आज मनाया जा रहा है। कहा जाता है कि इस दिन महिलाओं को सोलह श्रृंगार करके ही पूजा में शामिल होना चाहिए। इनमें मेंहदी, चूडियां, मांग टीका के अलावा और भी चीजों को सोलह श्रृंगार में शामिल किया है। व्रत की कथा

एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी। सेठानी के सहित उसकी बहुओं और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा था। रात्रि को साहूकार के लड़के भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भोजन के लिए कहा। इस पर बहन ने बताया कि उसका आज व्रत है और वह खाना चंद्रमा को अ‌र्घ्य देकर ही खा सकती है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जा रही थी और वह दूर पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। जो ऐसा प्रतीत होता है जैसे चतुर्थी का चांद हो। उसे देख कर करवा उसे अ‌र्घ्य देकर खाना खाने बैठ जाती है। जैसे ही वह पहला निवाला मुंह में डालती है उसे छींक आ जाती है। दूसरा निवाला डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और तीसरा निवाला मुंह में डालती है तभी उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बेहद दुखी हो जाती है।

उसकी भाभी सच्चाई बताती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं। इस पर करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं करेगी और अपने अस्तित्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर चौथ का दिन आता है, तो वह व्रत रखती है और शाम को सुहागिनों से अनुरोध करती है कि 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' लेकिन हर कोई मना कर देती है। आखिर में एक सुहागिन उसकी बात मान लेती है। इस तरह से उसका व्रत पूरा होता है और उसके सुहाग को नए जीवन का आशिर्वाद मिलता है। इसी कथा को कुछ अलग तरह से सभी व्रत करने वाली महिलाएं पढ़ती और सुनती हैं। सोलह श्रृंगार में किन-किन श्रृंगार को शामिल किया जाए सिदूर: माथे पर सिदूर पति की लंबी उम्र की निशानी माना जाता है।

मंगलसूत्र: ये भी सुहागन होने का सूचक है।

मांग टीका: मांग टीका वैसे तो आभूषण है लेकिन इसे भी सोलह में शामिल किया गया है।

बिदिया: माथे पर लगी बिदिया भी सुहागन के सोलह श्रृंगार में शामिल है।

काजल: काजल काली नजरों से बचाने के लिए लगाया जाता है।

नथनी: नाक में पहनी जाने वाली नथनी भी सोलह श्रृंगार में शामिल है।

कर्णफूल : ईयर रिग भी सोलह श्रृंगार में गिने जाते हैं।

मेहंदी : करवा चाथ पर हाथों में मेहंदी जरूर लगानी चाहिए।

कंगन या चूड़ी : हाथों में लाल और हरी चूड़ियां भी सोलह श्रृंगार में शामिल हैं।

वस्त्र : लाल रंग के वस्त्र भी 16वां सबसे महत्वपूर्ण श्रृंगार में गिने जाते हैं।

बिछिया : दोनों पांवों की बीच की तीन उंगलियों में सुहागन स्त्रियां बिछिया पहनती हैं।

पायल : घर की लक्ष्मी के लिए पायल को बेहद शुभ माना जाता है.

कमरबंद या तगड़ी : सुहागन के सोलह श्रृंगार में शामिल है।

अंगूठी : अंगूठी को भी सुहाग के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

बाजूबंद : बाजूबंद वैसे तो आभूषण है लेकिन इसे भी सोलह में शामिल किया गया है।

गजरा : फूलों का महकता गजरा भी सोलह श्रृंगार में शामिल है।

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