संवाद सूत्र, कोटकपूरा

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा मोगा रोड स्थित स्थानीय आश्रम में एक दिवसीय सत्संग समागम का आयोजन किया गया। इसमें सर्वश्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी हरिदर भारती ने कहा कि अपने जीवन संग्राम की प्रत्येक विपरीत परिस्थिति के विरोध में एक मनुष्य तब ही गांडीव उठा सकता है। जब उसके भीतर मोह वृत्तियों का नाश हो जाए और इसके लिए तत्ववेता श्री कृष्ण सदृश सतगुरु का होना अनिवार्य है। दलदल में फंसे किसी व्यक्ति को वहीं बाहर निकाल सकता है जो स्वयं उस दलदल के बाहर हो और पीड़ित व्यक्ति को खींच निकालने का जिसके पास साम‌र्थ्य हो। संसार की माया भी एक दलदल ही है और श्री कृष्ण मायापति होने के कारण माया से सर्वथा निर्लिप्त हैं।

यही कारण था कि वे ब्रह्म ज्ञान द्वारा अर्जुन को मोह व अज्ञान रुपी दलदल से बाहर निकाल लाए। दूसरी ओर कृपाचार्य, द्रोणाचार्य आदि पारंगत गुरु व सेना नायकों का साथ पाकर भी दुर्योधन पतन के दलदल में धंसता ही चला गया। ब्रह्माशास्त्र व शस्त्र विद्या में निपुण ये शिक्षक दुर्योधन को बाहरी लक्ष्य भेदना तो सिखा पाए परन्तु आत्मज्ञान रूपी तीर द्वारा उस परम लक्ष्य 'परब्रह्म' को भेदना नहीं। महादानी कर्ण, ब्रह्मस्त्र ज्ञाता अश्वथामा, भीषण प्रतिज्ञाधारी भीष्म भी मिलकर दुर्योधन की रक्षा नहीं कर पाए। जबकि ब्रह्मवेत्ता श्री कृष्ण के निशस्त्र होने पर भी अर्जुन उनके सानिध्य में अंतत: विजयी हुआ।

इन सभी तथ्यों से संसार की किसी भी विद्या के मुकाबले ब्रह्मविद्या की श्रेष्ठता उजागर होती है। यदि हमें अपने परम लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त करना है तो बाह्य साधनों तप, दान, हठयोग, शास्त्रों का पठन पाठन इत्यादि की अपेक्षा आंतरिक ज्ञान को पाना होगा।

शंकराचार्य जी भी इसी बात पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि न योगेन न सांख्येन सिध्यति नान्यथा अर्थात न सांख्य योग से, न कर्म से, न अष्टांग योग और न विद्या से से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। इसके लिए तो एक ब्रह्मवेता गुरु की आवश्यकता है जो घट के भीतर ही ब्रह्म का साक्षात्कार करा दें। मोक्ष प्राप्ति के लिए अन्य कोई साधन नहीं है। इसीलिए अगर हम भी अर्जुन की भांति इस जीवन युद्ध को जीतना चाहते हैं तो हमें भगवान श्रीकृष्ण जैसे गुरु की खोज करनी होगी। जो हमारी रथ का सारथी बन हमें विजयश्री की ओर ले चले।

Edited By: Jagran