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पंजाब BJP में शामिल हुए AAP विधायकों की सदस्यता पर फैसला अब स्पीकर के हाथ में, दलबदल कानून का शिकंजा; क्या होगा आगे?

Published: Mon, 02 Nov 2026 05:22 PM (IST)

आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए तीन विधायकों की सदस्यता पर अब विधानसभा अध्यक्ष फैसला लेंगे। आप की चीफ व्हिप ने अयोग्यता याचिका दायर की है।

पंजाब BJP में शामिल हुए AAP के तीन विधायक। फोटो जागरण

पंजाब BJP में शामिल हुए AAP के तीन विधायक। फोटो जागरण

HighLights

  1. आप के तीन विधायक भाजपा में शामिल हुए।

  2. स्पीकर कुलतार सिंह संधवां करेंगे सदस्यता पर फैसला।

  3. अयोग्यता याचिका और इस्तीफे के कानूनी पहलू।

रोहित कुमार, चंडीगढ़। आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए तीन विधायकों की विधानसभा सदस्यता पर अब कानूनी फैसला होना है। आप की चीफ व्हिप बलजिंदर कौर ने हरमीत सिंह पठानमाजरा और चेतन सिंह जौड़ामाजरा समेत तीनों विधायकों की सदस्यता समाप्त करने की मांग करते हुए विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां को अयोग्यता याचिका सौंप दी है।

दूसरी ओर, पठानमाजरा का इस्तीफा विधानसभा सचिवालय पहुंच चुका है और उस पर प्रक्रिया शुरू हो गई है, जबकि जौड़ामाजरा का इस्तीफा खबर लिखे जाने तक सचिवालय नहीं पहुंचा था। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल है कि क्या इन विधायकों की सदस्यता इस्तीफे से समाप्त होगी या दलबदल के आधार पर स्पीकर उन्हें अयोग्य घोषित करेंगे?

सदस्यता को दी गई चुनौती

इस मामले में तीनों विधायकों के भाजपा में शामिल होने से उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। ये विधायक आम आदमी पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव जीतकर पहुंचे थे। अब दूसरी पार्टी में शामिल होने के बाद उनकी सदस्यता को चुनौती दी गई है।

नियमों के मुताबिक, किसी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतने वाला विधायक दूसरी पार्टी में शामिल होता है तो उसकी सदस्यता समाप्त करने का आधार बन सकता है। इसके लिए पार्टी से औपचारिक इस्तीफा देना जरूरी नहीं है। विधायक का दूसरी पार्टी में शामिल होना भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

दो-तिहाई विधायकों का समर्थन जरूरी

विधायकों के पास सदस्यता बचाने का रास्ता भी आसान नहीं है। नियमों में दूसरी पार्टी में शामिल होने पर छूट तभी मिल सकती है, जब मूल राजनीतिक दल का किसी दूसरी पार्टी में विलय हो और संबंधित विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य इस फैसले के समर्थन में हों। केवल तीन विधायकों के भाजपा में शामिल होने से उन्हें यह छूट नहीं मिल सकती। ऐसे में अब उनकी ओर से स्पीकर के सामने क्या दलील दी जाती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

अब स्पीकर के सामने क्या होगा?

अयोग्यता याचिका मिलने के बाद विधानसभा अध्यक्ष पहले यह देखेंगे कि शिकायत नियमों के मुताबिक है या नहीं। इसके बाद संबंधित विधायकों को नोटिस देकर जवाब मांगा जा सकता है। उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा।

दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेज देखने के बाद स्पीकर फैसला करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में ऐसी याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर निर्णय किया जाना चाहिए। हालांकि, इस प्रक्रिया में इस्तीफे की स्थिति भी महत्वपूर्ण रहेगी।

शीतल अंगुराल का मामला बन सकता है नजीर

इससे पहले 2024 में जालंधर पश्चिम के तत्कालीन आप विधायक शीतल अंगुराल भाजपा में शामिल हुए थे। उन्होंने 28 मार्च को विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफा सौंपा, लेकिन बाद में इसे वापस लेने की मांग कर दी। उनका तर्क था कि उपचुनाव कराने से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

हालांकि, स्पीकर ने 30 मई को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया और 31 मई को सीट रिक्त होने की अधिसूचना जारी कर दी। इसके बाद उपचुनाव का रास्ता साफ हुआ। मौजूदा मामले में भी पठानमाजरा के इस्तीफे की स्वैच्छिकता और उसे स्वीकार करने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

पेंशन पर क्या पड़ेगा असर?

इस पूरे घटनाक्रम में विधायकों की पेंशन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पंजाब में एक विधायक, एक पेंशन का नियम लागू है। इसके तहत पूर्व विधायक को 60 हजार रुपये मासिक पेंशन और सरकारी पेंशनरों के लिए लागू महंगाई भत्ता मिलता है।

इसके लिए साढ़े चार साल का कार्यकाल पूरा करना जरूरी नहीं है। केवल अयोग्यता याचिका दायर होने से पेंशन बंद नहीं होती। इस्तीफा देने और अयोग्य घोषित होने के कानूनी परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं। हालांकि, विधानसभा की सदस्यता समाप्त होने के बाद विधायक के रूप में मिलने वाला वेतन और भत्ते बंद हो जाते हैं। अयोग्यता की स्थिति में पेंशन पर भी संबंधित कानून के प्रावधान लागू होंगे।

अब निगाहें विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि पठानमाजरा का इस्तीफा स्वीकार होता है या नहीं, जौड़ामाजरा अपना इस्तीफा सौंपते हैं या अयोग्यता याचिका का सामना करते हैं और भाजपा में शामिल हुए तीनों विधायकों की सदस्यता बचती है या उन्हें विधानसभा से बाहर होना पड़ता है।

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