किशाऊ प्रोजेक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगा पंजाब, यमुना के पानी में ठोका दावा; 1994 के समझौते पर उठाए सवाल
पंजाब सरकार किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर केंद्र के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। राज्य ...और पढ़ें
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यमुना जल बंटवारे को गैर-कानूनी बता रही मान सरकार।
HighLights
पंजाब किशाऊ परियोजना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है
राज्य यमुना नदी के पानी में अपने हिस्से का दावा कर रहा है
पंजाब ने 1994 के यमुना जल बंटवारे समझौते पर सवाल उठाए हैं
रोहित कुमार जागरण चंडीगढ़। पंजाब सरकार किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर केंद्र के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में है। पंजाब का तर्क है कि यमुना बेसिन की इस परियोजना को राज्य को विश्वास में लिए बिना आगे बढ़ाया जा रहा है, जबकि पंजाब यमुना के पानी में अपने हिस्से का दावा करता है।
पंजाब जल संसाधन विभाग ने एडवोकेट जनरल कार्यालय से प्रस्तावित याचिका के मसौदे को मंजूरी देने को कहा है। मसौदे की जांच पंजाब के पूर्व एडवोकेट जनरल रह चुके एक वरिष्ठ अधिवक्ता कर चुके हैं।
यह कदम हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली द्वारा किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए समझौता करने के कुछ दिन बाद उठाया गया है। 422 मेगावाट की यह परियोजना यमुना की सहायक नदी टोंस पर प्रस्तावित है।
इसमें 1,562 मिलियन घन मीटर तक भंडारण क्षमता प्रस्तावित है। परियोजना का उद्देश्य सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक पानी उपलब्ध कराने के साथ बिजली उत्पादन करना है।
1994 के समझौते में पंजाब को शामिल नहीं किया गया
पंजाब का कहना है कि मौजूदा यमुना जल बंटवारे की व्यवस्था के आधार पर किशाऊ परियोजना को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता, क्योंकि 1994 में यमुना के सतही प्रवाह के बंटवारे को लेकर हुए समझौते में पंजाब शामिल नहीं था।
जल संसाधन विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, 1972 की सिंचाई आयोग की रिपोर्ट में पंजाब को यमुना बेसिन का हिस्सा बताया गया था। वर्ष 1992 से पंजाब केंद्र सरकार से यमुना जल आवंटन से जुड़ी सभी चर्चाओं में उसे शामिल करने की मांग करता रहा है।
12 मई 1994 को दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के बीच यमुना जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। पंजाब का कहना है कि इसमें उसे पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। राज्य का दावा है कि 1954 में पंजाब यमुना के दो-तिहाई पानी का हकदार था। 1994 का समझौता अंतिम व्यवस्था नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसके आठवें प्रविधान में वर्ष 2025 के बाद समीक्षा का प्रावधान है।
पुनर्गठन के बाद भी हक खत्म नहीं हुआ
पंजाब का बड़ा तर्क है कि रावी और ब्यास की तरह यमुना भी 1966 में पंजाब के पुनर्गठन से पहले अविभाजित पंजाब की नदी प्रणाली का हिस्सा थी। राज्य का कहना है कि यदि हरियाणा रावी और ब्यास का गैर-रिपेरियन राज्य होने के बावजूद उनके पानी में हिस्सा पा सकता है तो पंजाब को भी यमुना के पानी के लिए उत्तराधिकारी राज्य के तौर पर माना जाना चाहिए।
पंजाब सरकार पहले भी यह रुख दोहराती रही है कि यदि गैर-रिपेरियन राज्यों को पंजाब की नदियों का पानी दिया जा सकता है तो पंजाब भी यमुना के पानी का हकदार है।
केंद्र के समक्ष पहले ही रख चुका है दावा
पंजाब सरकार वर्ष 1954 में तत्कालीन पंजाब और उत्तर प्रदेश के बीच हुए समझौते का भी हवाला दे रही है। इसके तहत पंजाब को यमुना के दो-तिहाई पानी का हकदार बताया गया था। राज्य का तर्क है कि 1966 में पंजाब के पुनर्गठन से उसका यह अधिकार अपने आप समाप्त नहीं हो सकता।
पंजाब ने 25 अप्रैल 2025 को अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1957 की धारा 3 के तहत केंद्र के समक्ष शिकायत देकर यमुना जल विवाद के निपटारे के लिए न्यायाधिकरण गठित करने की मांग की थी। शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने के बाद अब राज्य न्यायिक हस्तक्षेप की तैयारी कर रहा है।
पंजाब सरकार का कहना है कि अंतरराज्यीय नदी जल बंटवारे में एक ही सिद्धांत लगातार लागू होना चाहिए। या तो रिपेरियन सिद्धांत अपनाया जाए या उत्तराधिकारी राज्य का सिद्धांत। पंजाब का तर्क है कि इन सिद्धांतों का चयनात्मक इस्तेमाल कर उसे यमुना के पानी में उसके दावे से वंचित नहीं किया जा सकता।
