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पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप घोटाले पर हाई कोर्ट की फटकार, FIR में देरी पर पंजाब सरकार से मांगा जवाब

Published: Wed, 29 Apr 2026 06:07 AM (IST)

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एससी छात्रों की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप घोटाले में एफआईआर दर्ज करने में छह साल की ...और पढ़ें

पंजाब सरकार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से कड़ी फटकार झेलनी पड़ी। फाइल फोटो

पंजाब सरकार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से कड़ी फटकार झेलनी पड़ी। फाइल फोटो

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने पंजाब सरकार को देरी पर फटकारा।

  2. छह साल बाद स्कॉलरशिप घोटाले में दो एफआईआर।

  3. मुख्य सचिव को व्यक्तिगत स्पष्टीकरण देने का निर्देश।

दयानंद शर्मा, चंडीगढ़। अनुसूचित जाति विद्यार्थियों की पोस्ट-मैट्रिक स्कॉलरशिप योजना में सामने आए करोड़ों रुपये के कथित घोटाले पर पंजाब सरकार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से कड़ी फटकार झेलनी पड़ी।

वर्ष 2020 से लंबित जनहित याचिका में लगातार न्यायिक सख्ती के बाद आखिरकार पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने लगभग छह वर्ष की देरी के बाद 15 अप्रैल 2026 को दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज कीं, लेकिन अदालत ने इस विलंब को गंभीर प्रशासनिक विफलता मानते हुए पंजाब के मुख्य सचिव को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत स्तर पर स्पष्ट जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

कोर्ट ने पूछा, FIR दर्ज करने में इतनी देरी क्यों

हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह अत्यंत हैरानी की बात है कि इतने बड़े वित्तीय घोटाले के आरोप सामने आने, ऑडिट, विभागीय जांच और कैबिनेट स्तर के निर्णयों के बावजूद वर्षों तक केवल जांच चलती रही, पर आपराधिक मामला दर्ज करने की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति राशि के दुरुपयोग के आरोप थे तो एफआईआर दर्ज करने में इतनी देरी क्यों हुई, यह राज्य को बताना होगा।

हाई कोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसर पहली एफआईआर मोहाली विजिलेंस ब्यूरो द्वारा तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर परमिंदर सिंह गिल, सीनियर असिस्टेंट बलदेव सिंह, राकेश अरोड़ा, सेक्शन ऑफिसर मुकेश कुमार, परमजीत सिंह (डीसीएफए) तथा बठिंडा स्थित एक पॉलिटेक्निक संस्थान के चेयरमैन/प्रिंसिपल के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज की गई।

दूसरी एफआईआर लुधियाना की आर्थिक अपराध शाखा में फिरोजपुर स्थित शहीद भगत सिंह टेक कैंप इंजीनियरिंग विंग के चेयरमैन/प्रिंसिपल के खिलाफ दर्ज हुई। जनहित याचिका में चंडीगढ़ निवासी सतबीर सिंह वालिया ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार द्वारा मार्च 2019 में जारी 303.92 करोड़ रुपये की राशि में भारी अनियमितताएं हुईं।

ट्रेजरी एक्सपेंडिचर रिपोर्ट के अनुसार 248.11 करोड़ रुपये निकाले गए, जबकि लगभग 39 करोड़ रुपये के भुगतान संबंधी रिकॉर्ड और दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं थे। आरोप है कि बाद में शेष राशि को वर्ष 2015-16 और 2016-17 के छात्रों के मेंटेनेंस अलाउंस के नाम पर निकाला गया।आरोप यह भी रहा कि रकम संदिग्ध या अज्ञात संस्थानों तक पहुंची।

2020 में मुख्यमंत्री ने ऑडिट रिव्यू के दिए थे आदेश

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि जनवरी 2020 में मुख्यमंत्री ने ऑडिट रिव्यू के आदेश दिए थे, जबकि मई 2020 की कैबिनेट बैठक में अवैध दावों पर 9 प्रतिशत दंडात्मक ब्याज और 50 लाख रुपये या उससे अधिक की आपत्तिजनक राशि वाले मामलों में आपराधिक कार्रवाई का निर्णय लिया गया था। इसके बावजूद वर्षों तक एफआईआर दर्ज नहीं होना अदालत की चिंता का कारण बना।

केंद्र सरकार पहले ही वर्ष 2022 में हाई कोर्ट को बता चुकी थी कि योजना केंद्र प्रायोजित है और उसका वित्तीय हिस्सा राज्य को जारी किया जा चुका था, लेकिन घोटाले संबंधी रिपोर्ट पंजाब सरकार ने केंद्र को अब तक नहीं भेजी थी।

यही तथ्य अदालत के लिए और अधिक चिंताजनक रहा।हाई कोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव से जवाब तलब करते हुए पूछा है कि इतने वर्षों तक मामला दर्ज क्यों नहीं किया गया और इस असाधारण देरी के लिए कौन जिम्मेदार है।

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