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कंसल भाइयों को 16 नवंबर तक अंतरिम जमानत, मनी लांड्रिंग केस में ED की कार्रवाई पर पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट सख्त

Published: Sat, 03 Oct 2026 08:13 AM (IST)

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने रॉयल एस्टेट ग्रुप के प्रमोटर परवीन और नीरज कंसल को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 16 नवंबर तक अंतरिम जमानत दे दी है।

हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग आरोपों पर उठाए सवाल।

हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग आरोपों पर उठाए सवाल।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने कंसल भाइयों को अंतरिम जमानत दी।

  2. ईडी को 16 नवंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश।

  3. कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग आरोपों पर सवाल उठाए।

जागरण संवाददाता, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने रॉयल एस्टेट ग्रुप के प्रमोटर परवीन कंसल और नीरज कंसल को मनी लांड्रिंग मामले में अंतरिम जमानत दे दी है।

न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ की पीठ ने दोनों को 16 नवंबर तक राहत देते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को याचिकाकर्ताओं की ओर से उठाए गए सवालों पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

क्या है मामाल?

मामला जुलाई 2025 में फेज-8 थाने में दर्ज एफआइआर से जुड़ा है। इसमें बनूर स्थित चंडीगढ़ रॉयल सिटी प्रोजेक्ट के संबंध में ग्रेटर मोहाली एरिया डेवलपमेंट अथारिटी (गमाडा) को करीब 15 करोड़ रुपये की एक्सटर्नल डेवलपमेंट चार्ज (ईडीसी) और अन्य देनदारी का कथित भुगतान न करने का आरोप है। सितंबर 2025 की ईडी की ईसीआइआर में पंजाब विजिलेंस ब्यूरो और दिल्ली में दर्ज दो अन्य एफआइआर को भी शामिल किया गया था।

कंसल भाइयों की ओर से दलील दी गई कि गमाडा के साथ विवाद मूल रूप से संविदात्मक है और ईडीसी का कथित भुगतान न होना अपने आप में आपराधिक गतिविधि नहीं बनता। उन्होंने यह भी कहा कि वे 2016 से कंपनी के प्रबंधन में शामिल नहीं हैं और केवल अल्पांश शेयरधारक हैं।

याचिकाकर्ताओं ने मनी लांड्रिंग के आरोपों को भी चुनौती दी। उनका कहना था कि चंडीगढ़ रॉयल सिटी प्रोजेक्ट में प्लाट खरीदारों से प्राप्त राशि के कथित डायवर्जन का आरोप लगाया गया है, जबकि प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है, ग्राहकों को कब्जा दिया जा चुका है और उनके नाम रजिस्ट्रियां भी पूरी हो चुकी हैं।

कोर्ट ने पूछा- 15 करोड़ की राशि अपराध की आय कैसे?

सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह तथ्य भी रखा गया कि निवेशकों ने प्लाट, फ्लैट और मकानों के लिए करीब 15 करोड़ रुपये जमा किए थे। ब्याज जुड़ने के बाद यह रकम करीब 48 करोड़ रुपये हो गई और याचिकाकर्ताओं की कंपनी के खाते में जमा रही।

अदालत ने प्रथम दृष्टया यह सवाल उठाया कि यदि गमाडा को किसी कारण से भुगतान नहीं किया गया और किसी निवेशक ने इस संबंध में शिकायत भी नहीं की, तो कंपनी के पास जमा रकम को अपराध से अर्जित आय (Proceeds of Crime) मानने का आधार क्या होगा। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या गमाडा ने स्वयं एफआइआर दर्ज कराकर आपराधिक कार्रवाई शुरू की थी या बाद में दर्ज मामला ईडी की कार्रवाई का आधार बना।

कंसल भाइयों की दलील

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि वे 2016 से कंपनी के प्रबंधन में नहीं हैं। उनका कंपनी में केवल अल्पांश शेयर है। साथ ही, संबंधित एफआइआर में उन्हें न तो आरोपी बनाया गया था और न ही उस समय कंपनी का निदेशक बताया गया था।

ईडी के आरोपों का आधार

ईडी की कार्रवाई में प्लाट खरीदारों से प्राप्त धन के कथित डायवर्जन को मनी लांड्रिंग से जोड़ा गया है। ईसीआइआर में सितंबर 2025 तक तीन एफआइआर शामिल थीं। हाई कोर्ट ने फिलहाल 16 नवंबर तक अंतरिम जमानत देते हुए ईडी से मामले के कानूनी पहलुओं पर जवाब मांगा है।

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