चंडीगढ़, इंद्रप्रीत सिंह। Punjab Election 2022 पंजाब के विधानसभा चुनाव होने में अब हाथों पर गिने जा सकने वाले दिन ही बचे हैं। ऐसे में चुनावी जमीन पर फसली बटेर न आएं, ऐसा कैसे हो सकता है। अभी बीते शनिवार को 11 विभिन्न राजनीतिक दलों ने मिलकर लोक मुक्ति मोर्चा बनाया है और यह दावा किया है कि लोक मुक्ति मोर्चा पंजाब की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगा।

इस मोर्चा के पास खड़े करने के लिए 117 उम्मीदवार भी हैं, इस बारे में संदेह न जताते हुए अगर हम ऐसे ही अन्य राजनीतिक दलों की बात करें तो कुछ समय पहले ही रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट एस. आर. लद्दड़ ने भी किरती किसान शेरे पंजाब पार्टी बनाने का एलान किया था और पता चला है कि चुनाव से पहले ही पार्टी बिखरने लगी है।

बीते शनिवार को ही एक और पार्टी का उदय हुआ। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के कार्यकाल के दौरान उनके डिप्टी प्रिंसिपल सेक्रेटरी रहे राकेश अहीर ने भी एक राजनीतिक पार्टी बनाकर मैदान में कूदने का एलान कर दिया है। लेकिन इन सबके बीच अगर किसी नई राजनीतिक पार्टी के गठन होने की बात हो रही है तो वह कैप्टन अमरिंदर सिंह की पंजाब लोक कांग्रेस पार्टी है, जिसके मुख्यालय का सोमवार को खुद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उद्घाटन किया। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन करके विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान किया और ‘जीतेगा पंजाब’ का नारा दिया।

ऐसा भी नहीं है कि पंजाब में नई राजनीतिक पार्टी का प्रयोग पहली बार हो रहा है। हर बार चुनाव नजदीक आते ही नए-नए राजनीतिक दल सामने आते रहे हैं। खुद कैप्टन अमरिंदर सिंह दूसरी बार कांग्रेस को अलविदा कहकर यह प्रयोग कर रहे हैं। इससे पहले उन्होंने शिरोमणि अकाली दल पंथक बनाया था। वर्ष 1992 में चुनाव भी लड़ा। उस समय यह उम्मीद थी कि तत्कालीन केंद्र सरकार के सहयोग से वह सत्ता में आ सकते हैं, लेकिन पार्टी बुरी तरह से चुनाव हार गई। दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे खुद कैप्टन अमरिंदर सिंह एक सीट पर बुरी तरह से चुनाव हार गए, जबकि दूसरी सीट से वह निर्विरोध चुन लिए गए। वर्ष 2012 के चुनाव से पूर्व यही प्रयोग मनप्रीत बादल ने किया। शिरोमणि अकाली दल से अलग होने के बाद उन्होंने पीपल्स पार्टी आफ पंजाब का गठन किया, लेकिन एक भी सीट पर उन्हें सफलता नहीं मिली। खुद मनप्रीत बादल दोनों सीटों पर चुनाव हार गए।

वर्ष 2017 में यही प्रयोग आम आदमी पार्टी ने भी किया। वर्ष 2014 के संसदीय चुनावों में आम आदमी को राज्य में कुछ हद तक मिली सफलता और पंजाब के लोगों के उस समय के तेवरों को देखते हुए लगा था कि 2017 में आम आदमी पार्टी पंजाब में भी झाड़ू फेर देगी, लेकिन पार्टी मात्र 20 सीटों पर ही अटक कर रह गई। इसी पार्टी के विपक्ष के नेता पद से उतारे गए सुखपाल सिंह खैहरा ने कुछ विधायकों के साथ मिलकर पार्टी के खिलाफ बगावत की और पंजाब एकता पार्टी का गठन करके एक बार फिर 2019 के संसदीय चुनाव में कूद गए। सभी सीटों पर उनकी पार्टी की जमानत जब्त हो गई। ऐसा नहीं है कि जब ये लोग पार्टी का गठन करके लोगों के पास जाते हैं तो उन्हें समर्थन नहीं मिलता। पीपीपी की रैलियों में लोगों के मिल रहे समर्थन को देखकर लगता था कि मनप्रीत बादल एक नया इतिहास लिखने जा रहे हैं। यही हाल पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की रैलियों और नुक्कड़ चर्चाओं आदि को देखकर लगता था कि पार्टी 80 से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल कर सकती है, पर ऐसा संभव नहीं हुआ।

आखिर गफलत कहां होती है? इतना लंबा सियासी अनुभव रखने वाले ये राजनेता मतदाताओं की नब्ज को पहचान पाने में चूक कैसे जाते हैं? दरअसल ये सभी राजनीतिक पार्टियां जहां मार खाती हैं वह है चुनाव से ठीक पहले पार्टी का गठन करना, बिना संगठन बनाए, कोई रोडमैप लोगों को बताए, बिना लोगों का भरोसा जीते सीधे चुनाव में उतर जाना। नेताओं को लगता है कि वोटर बिना कुछ सोचे समङो, उनके द्वारा दिखाए सपनों पर भरोसा करके वोटिंग मशीन का बटन दबा देंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं है।

कांग्रेस हो या शिरोमणि अकाली दल या फिर भारतीय जनता पार्टी, ये सभी पुरानी पार्टियां हैं जिनके पास बूथ स्तर तक संगठन बना हुआ है और वे निरंतर उसे सशक्त करने में जुटी रहती हैं। गांव-गांव में उनके धड़े बने हुए हैं जो कोई भी चुनाव हो, अपने नेताजी की एक आवाज पर अपने-अपने वोटरों को उनके हक में कर लेते हैं। नई पार्टियों के पास इस तरह का कोई आधार या संगठन नहीं होता और वे पूरी तरह से अपने पक्ष में चल रही हवा पर ही निर्भर होते हैं। अत: एक बार फिर पंजाब में नई पार्टियों के गठन और चुनाव मैदान में उतरने का प्रयोग कितना सफल होगा, यह देखने वाली बात होगी। अब ज्यादा दिन नहीं बचे हैं, तीन माह बाद सभी का भविष्य लिख दिया जाएगा।

[राज्य ब्यूरो प्रमुख, पंजाब]

Edited By: Sanjay Pokhriyal