चंडीगढ़, [मनोज त्रिपाठी]। पंजाब की सात हजार से ज्यादा एग्रीकल्चर कोआपरेटिव सोसायटियों सहित कोआपरेटिव के अन्य बड़े विभागों में तैनात राजनेताओं को बाहर करने की कवायद शुरू हो चुकी है। प्रदेश सरकार की तरफ से गठित पंजाब किसान व खेत मजदूर आयोग ने इस संबंध में तैयार की गई पॉलिसी में जोर दिया है कि सोसायटियों में केवल किसानों की तैनाती की जाए।

 सात हजार से ज्यादा सोसायटियों पर है नेताओं का कब्जा, किसानों को पदों पर तैनात करने की कवायद

पहले चरण में ऐसे नेताओं को हटाने की बात कही गई है कि जो सोसायटियों में अहम पदों पर कब्जा करके बैठे हैं, लेकिन काम कोई नहीं कर रहे हैं। दूसरे चरण में ऐसे सभी सदस्यों को हटाया जा सकता है जो किसी न किसी सियासी दल के साथ जुड़कर नेतागिरी चमका रहे हैं, लेकिन किसानों के लिए कुछ नहीं कर रहे।

प्रदेश में कांग्रेस सरकार ने किसानों की आत्महत्याओं को देखते हुए उन्हें खेती में ज्यादा से ज्यादा लाभ देने व खेती में सुधार के मकसद से पंजाब किसान आयोग का गठन किया था। आयोग को सरकार ने निर्देश दिया था कि किसानों की समस्याओं की विस्तार से स्टडी करके अपनी पॉलिसी तैयार करे। आयोग ने पॉलिसी ड्राफ्ट कर ली है। 30 जून तक किसानों से एतराज मांगे गए हैं। इसके बाद फाइनल पॉलिसी सरकार को सौंपी जाएगी। विधानसभा से पास होने के बाद यह पंजाब की अभी तक की पहली किसान पॉलिसी होगी।

आयोग ने अपनी स्टडी में पाया है कि ज्यादातर कोआपरेटिव सोसायटियों में सदस्यों से लेकर चेयरमैन तक के पदों पर नेताओं ने कब्जा कर रखा है। जिस भी पार्टी की सरकार सत्ता में होती है वह अपने चहेतों को खुश करने के लिए सोसायटियों में सदस्य या चेयरमैन बना देती है।

हालांकि इसके लिए बाकायदा चुनाव की व्यवस्था होती है, लेकिन जिसकी लाठी उसकी भैंस के आधार पर होने वाले चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी के चहेते पदों पर कब्जा कर लेते हैं। आयोग ने स्टडी में पाया है कि ज्यादातर सियासी लोग सोसायटियों में अहम पदों पर तैनात जरूर हैं, लेकिन निष्क्रिय हैं।

वे यह नहीं जानते हैं कि उन्हें कितनी अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। नतीजतन सूबे में किसानों के हितों की अनदेखी कई सालों से होती आ रही है। आयोग के चेयरमैन अजयवीर जाखड़ कहते हैं कि अगर सोसायटियों में शामिल निष्क्रिय लोगों या नेताओं को हटा कर उनके स्थान पर किसानों को उक्त पदों पक रखा जाए तो वह खेती व किसानी के लिए बेहतर परिणाम दे सकते हैं।

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नेताओं की तैनाती पर सरकार खर्च कर रही करोड़ों रुपये

कोआपरेटिव के अधीन आने वाले दस बड़े विभागों में चेयरमैनों और सदस्य के रूप में राजनेताओं को तैनात करने के बाद सरकार उन पर करोड़ों रुपये खर्च करती है। अकेले चेयरमैन की नियुक्ति पर भत्ते, कार तथा विभाग में उन पर खर्च की जाने वाली धनराशि को ही जोड़ लिया जाए तो एक मंत्री के बराबर सरकार उन पर खर्च कर देती है। अगर आयोग की सिफारिश सरकार ने मान ली तो सरकारी खजाने को लाभ होने से लेकर किसानों की भलाई की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।

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इन विभागों में सियासी नियुक्तियां

कृषि सोसायटियों के अलावा स्वतंत्र कार्य करने वाले कई बड़े विभाग हैैं जहां पर सियासी नियुक्तियां की गई हैैं--

पीएससीबी (पंजाब स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड)

पीएससीएबीडी (पंजाब स्टेट कोआपरेटिव एग्रीकल्चर डेवलपमेंट बैंक)

मिल्कफेड (पंजाब स्टेट कोआपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर फेडरेशन लिमिटेड)

मार्कफेड (पंजाब स्टेट कोआपरेटिव सप्लाई मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड)

शुगरफेड (पंजाब स्टेट फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव शुगर मिल्स फेडरेशन लिमिटेड)

हाउसफेड (पंजाब स्टेट फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव हाउस बिल्डिंग सोसायटीज)

पैनकोफेड (पंजाब स्टेट कोआपरेटिव डेवलपमेंट फेडरेशन लिमिटेड)

लेबरफेड (पंजाब स्टेट कोआपरेटिव लेबर एंड कांस्ट्रक्शन फेडरेशन लिमिटेड)

पीआईसीटी (द पंजाब इंस्टीट्यूट ऑफ कोआपरेटिव ट्रेनिंग)

पीयूसीबी (पंजाब अर्बन कोआपरेटिव बैंक)

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Posted By: Sunil Kumar Jha

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