चंडीगढ़ [इन्द्रप्रीत सिंह]। शिरोमणि अकाली दल में इन दिनों काफी उठापटक चल रही है। अंदाजा लगाए जा रहे हैं कि सुखदेव सिंह ढींडसा के अलग दल बनाने और टकसाली नेताओं के एक बार फिर टूटने से शिअद पर क्या असर पड़ेगा? जितने मुंह उतनी बातें। इस सारी चर्चा के बीच ढींडसा वाले शिरोमणि अकाली दल के साथ एक शब्द आ रहा है डी। कोई डी का मतलब डॉन से न लगा ले। ढींडसा साहब काफी नफीस आदमी हैं। दरअसल, उन्होंने डी लगाने की बात इसलिए की है, ताकि शिरोमणि अकाली दल नाम अगर उन्हें नहीं मिलता है तो वह इसे डेमोक्रेटिक के रूप प्रचारित करेंगे। जानकारों का कहना है कि इससे उन्होंने अपना नाम शिअद में पिरो दिया है। डी से अगर डेमोक्रेटिक होता है तो डी से ढींडसा भी होता है। अब कोई ये न कहे कि नाम से क्या होता है, असल में नाम से ही सब कुछ होता है।

रोजे गले पड़ गए

फरीदकोट के आरटीए के खिलाफ दर्ज हुए केस से राज्य की पीसीएस लॉबी खासी नाराज बताई जा रही है। आरटीए पीसीएस अफसर हैं। इस नाराजगी को कैसे व्यक्त किया जाए, इसकी रणनीति बनाने के लिए और केस को वापस लेने के लिए अफसरों ने चंडीगढ़ के सरकारी होटल में मीटिंग रख ली। 40 अफसर विभिन्न शहरों से पहुंच गए। किसी को भी यह नहीं पता था कि उनमें तीन कोरोना पॉजिटिव हैं। सात जुलाई को जब इसका पता चला तो शामिल हुए सभी अफसरों की हवाइयां उड़ गईं। वे तो अपने साथी पर दर्ज हुए केस को वापस करवाने के लिए मीटिंग में शामिल हुए थे, लेकिन वहां तो कोरोना गले पड़ गया। एक सीनियर अधिकारी ने कहा, मुझे समझ में नहीं आता कि इन्होंने अपने कोरोना टेस्ट करवाए ही क्यों? खुद ही अपनेआप को क्वारंटाइन कर लेते, अब भुगतो सभी..। नमाज बख्शाने गए थे, रोजे गले पड़ गए।

गले नहीं उतर रही बात

पहले मध्य प्रदेश में सिंधिया घराने में सेंध लगाकर भाजपा सत्ता पर फिर से काबिज हो गई। आजकल इसी तरह की सरगोशियां गुलाबी नगरी जयपुर से भी आ रही हैं। अब पंजाब ही एक बड़ा राज्य रह गया जहां कांग्रेस सरकार को कोई खतरा नहीं है। पर सुनने में आ रहा है कि राज्यसभा सदस्य प्रताप सिंह बाजवा की जेड प्लस सुरक्षा को मोदी सरकार ने बरकरार रखा है। वह भी तब जब अपने परिवार में दो-दो लोगों की आतंकी हमले में मौत देख चुके गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा वापस ले ली गई। इस पर तो काफी समय से राजनीति हो ही रही है, लेकिन बाजवा की सुरक्षा में 25 जवानों वाली बात कांग्रेसियों के गले नहीं उतर रही है। वैसे उनके लिए इतना ही जान लेना काफी है कि यह फैसला गृहमंत्री अमित शाह के स्तर पर लिया गया है। शाह की नजर 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव पर है।

नई कार हमें क्यों नहीं

आम आदमी पार्टी के कई विधायक इस बात से नाराज हैं कि उन्हें सरकार नई गाड़ियां नहीं दे रही है। इन विधायकों को इनोवा गाड़ियां खरीदकर देने की बात थी, लेकिन मामला लटक गया है। आप विधायकों का गुस्सा कुछ दिन पहले तब ज्यादा बढ़ गया जब उन्हें पता चला कि प्रदेश सरकार ने अपने सात उच्चाधिकारियों को नई इनोवा गाड़ी खरीद कर दे दी है। उनका माथा गर्म होना लाजमी है। एक विधायक ने कहा कि जब हमारा दर्जा चीफ सेक्रेटरी से भी ऊंचा है तो हमें पहले गाड़ियां न देकर चीफ सेक्रेटरी के नीचे के अफसरों को प्रदेश सरकार ने कैसे दे दी? अब इनको कौन समझाए कि माननीय विधायकों को गाड़ियां भी केवल पंजाब में दी जा रही हैं। किसी और राज्य ने ऐसी मेहरबानी अपने विधायकों पर अब तक नहीं की है। हां, सभी राज्यों ने अफसरों को गाड़ियां जरूर दे रखी है।

Posted By: Kamlesh Bhatt

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