चंडीगढ़ [दयानंद शर्मा]। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किशोर को जमानत न देने के फैसले के पीछे सक्षम प्राधिकारी के सामने कुछ ठोस आधार होना चाहिए, जिसके आधार पर यह माना जा सकता है कि किशोर की रिहाई अनुचित व कानूनन सही नहीं है। केवल संभावना के आधार पर फैसला नहीं दिया जा सकता।

हाई कोर्ट के जस्टिस तेजिंदर सिंह ढींडसा ने बठिंडा के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के प्रिंसिपल जज द्वारा एक किशोर अपराधी को जमानत देने से इंकार करने के खिलाफ एक अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।हाई कोर्ट ने कहा कि केवल प्रिंसिपल जज ने अपने आदेश में यह संभावना जताई है कि याची को जमानत मिली तो वह कुख्यात अपराधियों के संपर्क में आ सकता है। साथ ही जमानत से उसे नैतिक, शारीरिक व मनोवैज्ञानिक खतरा पैदा हो सकता है।

जस्टिस ढींडसा ने कहा कि जमानत न देने के पीछे इस तरह के अपवादी फैसले को लागू करने के लिए, सक्षम प्राधिकारी के सामने कुछ सामग्री होनी चाहिए, जिसके आधार पर यह माना जा सकता है कि वर्तमान मामले में किशोर की रिहाई उचित नहीं है। हाई कोर्ट ने बठिंडा के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के प्रिंसिपल जज के आदेश को रद करते हुए आरोपी किशोर को रिहा करने का भी आदेश दिया।

मामला बठिंडा के एक किशोर द्वारा दायर याचिका के मद्देनजर हाई कोर्ट के समक्ष पहुंचा था। उस पर बलात्कार, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्‍सो) अधिनियम और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत 31 जनवरी, 2020 को पुलिस स्टेशन संगत, जिला बठिंडा में मामला दर्ज किया गया था, जिसके बाद याचिकाकर्ता को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर मुख्य आरोप हैं कि उसने नाबालिग लड़की के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए।

चूंकि याचिकाकर्ता किशोर था, उसने जमानत पर रिहाई के लिए एक आवेदन दायर किया था, लेकिन प्रिंसिपल जज, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, बठिंडा ने जमानत देने से 17 मार्च को इन्कार कर दिया। प्रिंसिपल जज ने अपने फैसले में कहा था कि किशोर के खिलाफ आरोप गंभीर हैं और अगर उन्हें जमानत की छूट दी जाती है, जमानत से उसे नैतिक, शारीरिक व मनोवैज्ञानिक खतरा पैदा हो सकता है। इसके साथ ही उसे शिकायतकर्ता पक्ष से जान को खतरा होगा। प्रिंसिपल जज के आदेश के खिलाफ याची ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। जिस पर हाई कोर्ट ने किशोर को जमानत पर रिहा करने के आदेश जरी कर दिए।

 

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