चंडीगढ़ [दयानंद शर्मा]। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा कानून में पुरुषों के साथ भेदभाव पर चिंता जताते हुए सवाल उठाया है कि किसी महिला द्वारा शिकायत करने पर पुरुष को तुरंत ही क्यों दोषी मान लिया जाता है। हाई कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा की शिकायत मिलते ही ट्रायल कोर्ट भी आरोपित को अपराधी समझने लगता है। अक्सर शुरुआती दौर में ही गिरफ्तारी के लिए वारंट तक जारी कर दिया जाता है। यह स्थिति ठीक नहीं है।

जस्टिस फतेहदीप सिंह की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि जज को ऐसे मामलों में यह प्रयास करना चाहिए कि किसी प्रकार विवाद का निपटारा हो जाए और प्रतिवादी को भी न्याय मिल सके। पीठ ने आदेश की प्रति हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ के सभी न्यायिक अधिकारियों को भी सौंपने के निर्देश दिए हैैं, जिससे विचारण न्यायालय फैसलों के दौरान इस बिंदु को ध्यान में रखें।

घरेलू हिंसा कानून को पुरुषों के साथ भेदभाव वाला बताते हुए पीठ ने समानता के अधिकार के प्राविधानों को लागू करने की की प्रदेश सरकार को सलाह दी है। इस फैसले के साथ ही पीठ ने घरेलू हिंसा के हरियाणा, पंजाब व चंडीगढ़ के कई याचिकाओं का निपटारा कर दिया।

पीठ ने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि एक ही समस्या के लिए कई विकल्प देना कहां तक जायज है? महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने का संकल्प 1981 में इस आशय के साथ लिया गया था कि सभी प्रदेश इस दिशा में काम करेंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

पीठ ने पूछा 21 प्रोटेक्शन ऑफिसर, इनमें एक भी पुरुष नहीं, क्यों?

पीठ ने कहा कि हरियाणा में 21 प्रोटेक्शन ऑफिसर है और उनमें एक भी पुरुष नहीं है। पंजाब में 154 प्रोटेक्शन ऑफिसर हैं जिनमें 30 पुरुष और बाकी 124 महिलाएं है। चंडीगढ़ में केवल पांच प्रोटेक्शन ऑफिसर हैं । पीठ ने कहा कि घरेलू हिंसा कानून के तहत मदद के लिए एक तो कम अधिकारी हैंं और जो हैं भी, उनको अतिरिक्त कार्यभार दिया गया है। इस स्थिति में घरेलू हिंसा कानून को प्रभावी तरीके से कैसे लागू किया जा सकेगा।

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Posted By: Kamlesh Bhatt

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