विजय गुप्ता। एक माह से ज्यादा तक कानून हाथ में लेकर रेलवे ट्रैक रोकते किसान, टोल प्लाजा पर धरने देते किसान, पेट्रोल पंपों और मॉल्स के बाहर डटे किसान, बेखौफ होकर खेतों में पराली जलाते किसान और लाचार नजर आती राज्य सरकार। इन दिनों पंजाब का यही मंजर है। वोटों की सियासत में आम जन, उद्योगों, व्यापार जगत और यहां तक कि उसी किसान से भी खिलवाड़ ही होने लगा है, जिसके नाम पर यह सब हो रहा है। खुद को किसान का हितैषी साबित करने की कवायद में राज्य सरकार अपना भी नुकसान कर रही है।

कोविड के प्रकोप के कारण पटरी से उतरे उद्योग-व्यापार जगत को उम्मीद थी कि दिवाली कुछ संभाल लेगी, लेकिन मालगाड़ियां न चलने से उस पर भी पानी फिर गया है। उद्योग कराह रहे हैं। कोयले की आपूíत न होने से थर्मल प्लांट बंद पड़े हैं और बिजली का संकट पैदा होने लगा है। इसका असर देखिए कि किसानों को दी जाने वाली मुफ्त बिजली पर ही सबसे पहले कट लगने लगा है। मालगाड़ियां न आने से गेहूं की बिजाई के लिए डीएपी एवं यूरिया खाद उपलब्ध नहीं हो रहा है।

पंजाब में इतने लंबे समय तक ट्रेनें रद रहेंगी, शायद राज्य सरकार ने भी नहीं सोचा था। केंद्र सरकार की ओर से जैसे ही कृषि सुधार कानून लाए गए, उसने न केवल खुद विरोध किया, बल्कि किसानों को यह कहकर उकसाने का ही काम किया गया कि उन पर मामले दर्ज नहीं किए जाएंगे। आज जो स्थिति उत्पन्न है, यह उसी का दुष्परिणाम है।

किसानों के इस आंदोलन को लेकर पंजाब सरकार की स्थिति न खुदा मिला न विसाल-ए-सनम जैसी होने लगी है। जैसा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार ने जैसा सोचा था, उसके अनुरूप उसे सियासी फायदा मिलता नजर नहीं आ रहा। केंद्र के कानूनों के विरोध में उन्होंने पंजाब विधानसभा में चार कृषि बिल पारित तो कर दिए, लेकिन उनका हश्र सरकार के लिए झटके से कम नहीं है। किसानों ने तो वे बिल ठुकरा ही दिए, राज्यपाल ने भी उन्हें राष्ट्रपति को नहीं भेजा। भाजपा को छोड़कर अन्य जो दल सदन में बिल के समर्थन में थे, उन्होंने भी किनारा कर लिया है। बिल पारित होने वाले दिन मुख्यमंत्री ने किसानों से अपील की थी कि वे अब उनकी बात मान लें, पर किसी ने बात नहीं सुनी।

अब कैप्टन सरकार के गले की हड्डी बन गया है किसान आंदोलन। सरकार न इसे सख्ती से खत्म करवाने का जोखिम उठा सकती है, न यह चलते रहने दिया जा सकता है। किसानों को गांठने के चक्कर में उद्यमी, व्यापारी और आम जनता भी उसकी मुट्ठी से खिसकने लगी है। हालत यह है कि कभी खुद मुख्यमंत्री केंद्रीय मंत्रियों से मिल रहे हैं और कभी कांग्रेस के शीर्ष नेता, लेकिन कोई राह निकलती नजर नहीं आ रही। केवल मालगाड़ियों के लिए ट्रैक खोलने की बात से न केंद्र संतुष्ट है और न ही रेलवे सुरक्षा को लेकर आश्वस्त। किसान बेशक ट्रैक या प्लेटफॉर्म से हट गए हैं, लेकिन हैं कुछ ही दूर पर। सरकार कैसे यह आश्वस्त करा सकती है कि वे कहीं भड़के तो फिर ट्रैक तक नहीं पहुंचेंगे। किसानों के हठ, पंजाब सरकार की बेबसी के कारण केंद्र के साथ जो गतिरोध उत्पन्न हुआ है, वह दूर होता नजर नहीं आ रहा। केंद्र की किसानों से एक बार बातचीत असफल हो चुकी है। अब 13 नवंबर को किसानों को फिर बुलाया जा रहा है।

बहरहाल, विकराल होती जा रही स्थिति से राज्य सरकार की पेशानी पर भी बल दिखने लगे हैं, मगर किसानों को ट्रैक के नजदीक से हटाने में भी वह बेबस है। मुख्यमंत्री एक ओर यह तो स्वीकार करते हैं कि मालगाड़ियां न चलने से लेह-लद्दाख में तैनात सेना तक को मुश्किल हो सकती है, या फिर यात्री ट्रेनें न चलने से सेना में तैनात सैनिकों सहित करीब डेढ़ लाख लोग इस बार दिवाली पर अपने घर पंजाब आने में परेशानी ङोलेंगे, लेकिन इसके लिए केंद्र पर ही ठीकरा फोड़ते है। ट्रेनें न चलीं तो राज्य की पहले से खराब वित्तीय हालत पटरी से बुरी तरह उतरना निश्चित है।

यह सरकार को दिखाई तो दे रहा है, पर कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। राज्य में पहली बार किसानों को इस तरह आंदोलित देख सरकार ने पराली जलाने के मामले में भी ढील दिखाई है। नतीजा यह हुआ है कि इस बार अब तक पिछले साल से पराली जलाने के दो गुना ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं, लेकिन कार्रवाई बहुत कम पर हुई है। विभिन्न अध्ययनों के निष्कर्षो का सहारा लेकर सरकार इस तोहमत से बच भी जाए कि दिल्ली-एनसीआर में इन दिनों प्रदूषण पंजाब में जलने वाली पराली से नहीं होता, लेकिन राज्य की जनता की सेहत के प्रति अपनी जिम्मेदारी से वह कैसे विमुख हो सकती है? आखिर सरकार बताए कि हाल में पराली के धुएं से हुए सड़क हादसों में जो मौतें हुईं उनका कसूरवार कौन है? हकीकत यही है कि छोटे किसान तक अभी ऐसे विकल्प की राह नहीं बना सके हैं, जिनसे वे पराली न जलाएं।

[वरिष्ठ समाचार संपादक, पंजाब]

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