जागरण संवाददाता, चंडीगढ़। आनलाइन गेम पब-जी, फ्री फायर, कार रेसिंग जैसी गेम्स की लत में चंडीगढ़ के दवा व्यापारी के नाबालिग बेटे ने घर से 17 लाख रुपये चुराने का मामला दिनभर चर्चा में रहा। वहीं, पुलिस ने मामले में पकड़े गए आरोपित सूरज के मोबाइल को सीएफएसएल जांच को भेजा है। पुलिस को संदेह है कि आनलाइन गेम्स की आइडी बेचने वाले सूरज के संपर्क में ट्राईसिटी के अन्य बच्चे भी हो सकते हैं। वहीं, रविवार को ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेशी के बाद सूरज को जेल भेज दिया गया है। जबकि, दवा व्यापारी के बेटे सहित चारों नाबालिगों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये पेश करने पर कोर्ट ने उनके पेरेंट्स से अंडरटेकिंग लेकर हवाले करने के निर्देश दे दिया है।

पुलिस ने मामले में दोनों नाबालिग दोस्तों के बैंक खातों को फ्रीज करने के लिए पत्र संबंधित बैंक अधिकारियों को पत्र लिखा है। सोमवार को दोनों के खातों को फ्री करवा दिया जाएगा। अब चोरी के बाकी बचे तकरीबन दो से ढ़ाई लाख रुपयों की रिकवरी दोनों के खातों से होगी। कुछ राशि दोनों ने अपने अपने बैंक खातों में जमा कराई थी। इससे पहले पुलिस ने 10 लाख 22 हजार 500 रुपये कैश, करीब ढाई लाख कीमत के तीन आइफोन मोबाइल, महंगे कपड़े, जूते, हवाई टिकट बरामद कर लिए हैं। कर लिया था।

एक्सपर्ट की सलाह

इन लक्षण से आनलाइन गेम्स की लत को पहचाने

रोजाना बच्चे के इंटरनेट पर समय बिताने पर सतर्क हो जाएं।

घर में बच्चा गुमसुम रहने लगेगा और व्यवहार में बदलाव आ जाएगा।

बच्चे का स्कूल में दिल न लगना और गुस्सैल-चिड़चिड़ा स्वभाव होना।

बच्चों को आनलाइन गेम्स की लत से ऐसे बचाएं

बच्चों को इंटरनेट का इस्तेमाल पढ़ाई संबंधी काम के लिए ही करने दें।

इंटरनेट पर बच्चे के गेम खेलने का समय निर्धारित करें और नजर भी रखें।

छोटे बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल पर कार्टून, गाने का सहारा न बनाएं।

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बच्चों की सभी गतिविधियों के बारे में माता-पिता को पता होना चाहिए। आज से समय पर माता-पिता और बच्चों के बीच ज्यादा दूरी होना भी इस तरह की घटनाओं की वजह है। बच्चे को आनलाइन गेम की लत लगने पर इंटरनेट की तरफ उनका रुझान ज्यादा बढ़ने लगता है। पढ़ाई के अलावा इंटरनेट के लिए बेवजह जिद, गुस्सा करने पर माता-पिता नजर रखें। इसकी लत को पहचाने, उससे बचाने के तरीके माता-पिता को अपनाना चाहिए। इसके बच्चों के मानसिक स्थिति के साथ स्वास्थ्य पर भी गलत असर पड़ता है।

                                   -डॉ. रोशल लाल, चेयरपर्सन डिपार्टमेंट ऑफ साइकोलाजी, पंजाब यूनिवर्सिटी

Edited By: Ankesh Thakur